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कविता

फोन पर आवाज सुनकर
यश मालवीय


फोन पर आवाज सुनकर
तुम्हें थोड़ी देर गुनकर
जिंदगी से भेंट जैसे हो गई
डायरी में खिल उठे पन्ने कई
समय अक्टूबर हुआ भूला मई।

गीत वो दालान वाले
धान वाले पान वाले
दिए रखने लगे मन में
नयन वो वरदान वाले

शब्द वाले फूल चुनकर
रोशनी की रुई धुनकर
जिंदगी से भेंट जैसे हो गई
आज पहनी सुबह ने साड़ी नई
रास्ते सज उठे काही-कत्थई।

ओस में भीगे दुशाले
फूल पर ठहरे उजाले
गहन अलसाए पहर में
नींद से जागे शिवाले

स्वेटरों-सा स्वप्न बुनकर
‘उर्वशी’ लिख उठे दिनकर
जिंदगी से भेंट जैसे हो गई
‘कनुप्रिया’ समझी, बिहारी सतसई
सुरमई सच हुआ सहसा चंपई।
 


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