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कविता

पेड़ का क्या हो भला अब ?
यश मालवीय


दाँत काटे की जहाँ रोटी रही हो
उन्हीं डालों में परस्पर असहमति है
पेड़ का क्या हो भला अब ?

पत्तियों में है अजब-सी सुगबुगाहट है
जड़ों तक पहुँचा हुआ विद्रोह है
सिरफिरी सी हवाओं के हवाले अब
हरेपन का सघनतम व्यामोह है
फटे कागज तारीखे हैं पात पीले

पतझरों के हाथ लंबे
फँस रहा है फिर गला अब।

हर तने में दिख रही है गुफा जैसी
हर गुफा में एक आदमखोर हैं
सूर्य का मुख लाल तपते तवे जैसा
रक्त में आकंठ डूबी भोर है
गिलहरी भी फूँककर अब पग धरे

कौन पत्ती, कौन चिनगारी यहाँ
आह! किसका घर जला अब ?
 


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