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कविता

श्रांत मन का एक कोना
मानोशी चटर्जी


श्रांत मन का एक कोना
शांत मधुवन-छाँव माँगे।

सरल मन की देहरी पर
हुए पाहुन सजल सपने,
प्रीति सुंदर रूप धरती,
दोस्त-दुश्मन सभी अपने,
भ्रमित है मन, झूठ-जग में
सहज पथ के गाँव माँगे।

कई मौसम, रंग देखे
घटा, सावन, धूप, छाया,
कड़ी दुपहर, कृष्ण-रातें,
दुख-घनेरे, भोग, माया।
क्लांत है जीवन-पथिक यह,
राह तरुवर-छाँव माँगे।

भोर का यह आस-पंछी
सांझ होते खो न जाए,
किलकता जीवन कहीं फिर
रैन-शैया सो न जाए।
घेर लेती जब निराशा
हृदय व्याकुल ठाँव माँगे।

श्रांत मन का एक कोना
शांत मधुबन-छाँव माँगे।
 


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