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कविता

सोने की चिड़िया के बच्चे
ओमप्रकाश तिवारी


सोने की चिड़िया के बच्चे।
 
संसद से निकला परवाना,
मुफ्त मिलेगा सबको खाना;
कामकाज की करो न चिंता,
पड़े हाथ न पाँव हिलाना
 सोचो हम हैं कितने अच्छे।
 
गरज नहीं पढ़ने-लिखने की,
गरज नहीं कुछ भी सिखने की;
प्रतियोगी दुनिया में हमको,
गरज नहीं बिल्कुल टिकने की
 गढ़ें सिर्फ बातों के लच्छे।
 
दे सकता है जो आश्वासन,
वही करेगा हम पर शासन;
लेकर वोट भले ही हमसे,
करवाए हमको शीर्षासन
गुणा-भाग में बिल्कुल कच्चे।
 
भरे हुए भंडार सभी हैं,
कागज पर अधिकार सभी हैं;
किंतु निकम्मों की बस्ती में,
लगते ये बेकार सभी हैं।
 बार-बार खाते हैं गच्चे।
 
 


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