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कविता

मध्य में हूँ, कहाँ जाऊँ
ओमप्रकाश तिवारी


मध्य में हूँ
कहाँ जाऊँ ?

पेट खाली,
पर जुगाली
अब यही दस्तूर है,
दिन के संग-संग
रात पाली
किंतु दिल्ली दूर है।
क्या निचोड़ूँ
क्या नहाऊँ ?

माह में बस
एक दिन के लिए
हम सुल्तान हैं,
शेष उंतिस दिन तड़पते
जेब में
अरमान हैं।
कैसे खाऊँ
क्या बचाऊँ ?

कंपनी के सेठ जी
हरदम लगे
नाराज हैं,
और घर पे
कामवाली बाइयों के
नाज हैं।
किस तरह
सबको मनाऊँ ?

कर्ज लेकर
फ्लैट-बंगला, कर्ज से ही
कार है,
जो बचे वो
कर समझकर
काटती सरकार है।
किस तरह
सपने सजाऊँ ?
 


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