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कविता

जिंदगी में मुस्कुनराना चाहती हूँ
अलका विजय


जिंदगी में मुस्‍कुराना चाहती हूँ।
हर खुशी अपना बनाना चाहती हूँ।

तन भी तेरा मन भी तेरा
प्राणों की हर साँस तेरी
नयन तेरे अश्रु तेरा
अधरों पर मुस्‍कान तेरी
मैं बताना चाहती हूँ
जिंदगी में मुस्‍कुराना चाहती हूँ।
हर खुशी अपना बनाना चाहती हूँ।

साँस की लयबद्ध गति का
है सकल संगीत तेरा
प्रीत में अनुरक्‍त धड़कन
का निरंतर लय भी तेरा
धड़कनों पर मैं थिरकना चाहती हूँ
जिंदगी में मुस्‍कुराना चाहती हूँ।
हर खुशी अपना बनाना चाहती हूँ।

ताप सूरज का तुम्‍हारा
चाँदनी भी है तुम्‍हारी
भोर का चंदा तुम्‍हारा
रात का हर इक सितारा
हर प्रहर दिनमान रहना चाहती हूँ
जिंदगी में मुस्‍कुराना चाहती हूँ।
हर खुशी अपना बनाना चाहती हूँ।

जिंदगी की चाल तेरी
चाल का हर पल तुम्‍हारा
डगर तेरी चाह तेरी
और मुसाफिर भी तुम्‍हारा
घर सितारों पर बनाना चाहती हूँ
जिंदगी में मुस्‍कुराना चाहती हूँ।
हर खुशी अपना बनाना चाहती हूँ।

पास का एहसास तेरा
दूर की यादें तुम्‍हारी
विरह के हर भाव तेरे
मिलन का हर क्षण तुम्‍हारा
गुलमोहर बन कर दहकना चाहती हूँ
जिंदगी में मुस्‍कुराना चाहती हूँ।
हर खुशी अपना बनाना चाहती हूँ।
 


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