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कविता

पीपल बिछोह में
ओम प्रकाश नौटियाल


खोया कहीं बचपन
तरुणाई के मोह में
छोड़ दिया गाँव तभी
जीविका की टोह में
आकुल अनाथ मन
पीपल  बिछोह में !                   

पीपल  चौंतरे पर,
छुटपन के पैंतरे थे
पातों के छातों पर,
और और  छाते थे                          
पीपल की छाँव तले,
कितने अरमान पले                         
छनती हुई धूप में,
पर्ण पर्ण पवन झले
दूर कहीं इठलाती
मधुवन की जोह में
आकुल अनाथ मन
पीपल  बिछोह में ! 

देववृक्ष अश्वत्थ के,
देवतुल्य प्रभाव से
अनुष्ठान पूर्ण हुए,
कई अपने गाँव के
हो राम कथा वाचन,
सत्संग और प्रवचन
चले हों नवदंपती,
महकाने निज उपवन
बैठना पीपल तले
जब भी उहापोह में
आकुल अनाथ मन
पीपल  बिछोह में !       

याद रहा पीपल को,
गाँव का अतीत सभी
थक कर जो बंद हुई,
तब की वो रीत सभी
पीपल की मूल फैली,
खेतों औ’ बागों में
पवन को दिए सुर,
कितने ही रागों के
संगी  सदा गाँव के
आरोह अवरोह में
आकुल अनाथ मन
पीपल  बिछोह में !
 


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