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कविता

गंग-जमुन का इसमें पानी
कुमार रवींद्र


संतों, तुमने
सुनी गीत की बोली-बानी।

जलपाखी की कूज
बसी वंशी की धुन है
परबतिया के पायल की
मीठी रुनझुन है
हमने इससे ही
बसंत की सुनी कहानी।

तान अभी ली मछुए ने
उसके भी सुर हैं
गूँजी बीन जहाँ
हिरदय के अंतःपुर हैं
नेह-छोह की
प्रथा इसी से हमने जानी।

तुलसी-सूर-कबीरा की
देता यह साखी
दोहराती है बोल इसी के
वह मधुमाखी
सुनो, बह रहा
गंग-जमुन का इसमें पानी।
 


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