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कविता

राजा-रानी इतिहास हुए
कुमार रवींद्र


युग यह परजा का
कहते सब
राजा-रानी इतिहास हुए।

दिन रामराज के बीत चुके
सूरज-भी, सुना, नया आया
है पूजनीय देवा थुलथुल
सब हाट-लाट की है माया
बस जात-पात के
झगड़े ही
अपनी बस्ती में खास हुए।

गुन-अवगुन की बातें छूछी
हैं अंधे युग की घटनाएँ
हो गए गुणीजन व्यापारी
रच रहे नई नित इच्छाएँ
जो आम्रकुंज थे
वे भी अब
लाक्षागृह की बू-बास हुए।
हो रही मुनादी है सपनों की
सभागार में, बंधु, सुनो
कंचनमृग को साधो रथ में
नकली सोने का जाल बुनो
है अवधपुरी भी चकित
देख जो
नंदिग्राम में रास हुए।
 


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