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कविता

विकट हैं दिन
कुमार रवींद्र


विकट हैं दिन
यह हमारा गीत कैसे जिएगा - सोचते हम।

फूल की पगडंडियों पर
राख बरसी रात भर कल
उड़ रहा है घाट पर
देखो किसी का फटा आँचल
भीड़ है दुःशासनों की
कौन इसको सिएगा - सोचते हम।

देख घटनाएँ हुई गुमसुम
आरती-होती हवाएँ
बाँचता है पेड़ बूढ़ा जो उधर
हादसों की ही कथाएँ
समय अंधा
कौन उसको दृष्टि देगा - सोचते हम।

साँस लेना हुआ मुश्किल
हुईं जहरीली हवाएँ
राग जो भीतर हमारे
हम उन्हें कैसे बचाएँ
हिमशिखर पर देवता
क्या फिर हलाहल पिएगा - सोचते हम।
 


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