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कविता

सुनो तो जरा
कुमार रवींद्र


सुनो तो जरा
पेड़ हवाओं से क्या कहते।

बिरछ-ज्ञान है बड़ा पुराना
ऋषि-मुनियों ने इसको साधा
मंत्र रचे थे इसी ज्ञान से
जिनने मेटी हर भवबाधा

पाप-ताप
सबके भी, साधो
बिरछ-गाछ हँसकर हैं सहते।

पेड़ों ने छाया दी सबको
फूल-फलों से हमें नवाजा
फर्क नहीं करते वे कोई
होवे रंक या कि हो राजा

रची आग जो
सभ्य समय ने
उसमें भी ये चुप-चुप दहते।

समझो इनकी बोली-बानी
युग के संकट को पहचानो
अब तक इनकी जड़ में पानी
तब तक साँसें - यह भी जानो

साँस-साँस
बर्फीली होती
तब भी बिरवे जिंदा रहते।
 


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