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कविता

चुभता रहा दिन
राजेंद्र गौतम


आज भी चुभता रहा दिन भर
शोर किरचों-सा
पर नहीं टूटी उदासी की साँवली पर्तें।

तहा कर संबोधनों को था
रख दिया कब का
फिर कहाँ से आ खड़ी है यह
याद सिरहाने
अध-लिखे खत जो किताबों में
थे कभी छूटे
मिटे सब आखर लगे उनके
अर्थ पियराने
खुली आँखों में नहीं हैं अब
नींद या सपने
एक खालीपन रखेगा फिर से वही शर्तें।

वक्त है या जाल कोई
दूर तक फैला
साँझ की हिरणी विवश
जिसमें कसमसाती है
झेल ले वह यातना
शायद शिकंजों की
देख शूली पर चढ़े दिन को
आँख उसकी डबडबाती हैं
लाँघ कितने ढूह-टीलों को
यह जिंदगी आई
क्या पता है और कितनी अब भी बचीं गर्तें।
 


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