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कविता

इस दहलीज पर
राम सेंगर


चलो, छोड़ो कुर्सियों को
यहीं,
इस दहलीज पर ही बैठ कर
            दो बात करते हैं।

सड़क-बगिया-खेल का मैदान
बच्चे-खिसलपट्टी
चाय पीने का इधर
आनंद ही कुछ और
हमीं देखें, हमें कोई भी न देखे,
यही सुख है
हमारे एकांत का यह
पसंदीदा ठौर।
पेड़-पौधे-फूल-बच्चे-सड़क
नजरों में रहें तो
तुम्हें छूना या न छूना भूल जाते
यही भावों-विचारों में
रंग भरते हैं।

चलो, छोड़ो कुर्सियों को
यहीं,
इस दहलीज पर ही बैठ कर
            दो बात करते हैं।
 


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