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कविता

इस बसंतोत्सव से पहले
राम सेंगर


आँख बंद हो
इससे पहले
            अटकी बात निकल कर आए।

जुगत-जतन की होंस भरोसे
क्या कुछ नहीं कहा है हमने
तने रहे हैं अपने ऊपर
नहीं दिया दधि मुँह में जनमे
कोशिश थी तो पार पकड़ ली
            कठिन समय के नाज उठाए।

झुठवचनी में जीभ जलेगी
सच का पक्ष पनप यों पाया
सामाजिकता में रंध-भूँज कर
स्वर का मर्म समझ में आया
दच्चे-गच्चे लहर-बहर के
            सब खाते, हमने भी खाए।

इंद्रिय निग्रह के गुर साधे
क्यों परांगमुख हों जीवन के
मनोभूमि के खलल लाँघ कर
खड़े हुए सम्मुख दर्पण के
छवि के भरम न मन में कोई
            थे भी तो कबके दफनाए।

और सुर्खरू होकर उभरें
इस बसंत-उत्सव से पहले
पट जाए पीढ़ी का अंतर
हों कि न हों, नहले पर दहले
मथें-बिलोएँ मानुस सच को
            बिन बौराए, बिन भहराए।
 


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