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कविता

हुई कुल्हाड़ी लाल
राम सेंगर


चबूतरा बढ़ई टोले का
जुड़ी हुई चौपाल।

राम मनोहर मुसका बुनते
बटे जेबरी चन्ना
बजा रहा पीपनी निरंजन
मटकें भग्गा-नन्ना
गुड़गुड़ा रहे हुक्का लहुरे
कौंधे नहीं सवाल।

ओमा, चंद्रपाल, गिद्धारी
मुँहफट तीन तिलंगे।
हाँक रहे हैं इधर-उधर की
खिखियाते हुड़दंगे
डालचंद्र की सुने न कोई
पीट रहे हैं गाल।

खेत मजूरी चौका चूल्हा
किचिर-पिचिर का शोर
बात अहम सब, मिले न लेकिन
किसी बात का छोर
कह-सुन कर काटे आपस की
चिंताओं का जाल।

मथुरावाली मजे तमाखू
पान बनाए अंची
जीसुखराम लतीफा झाड़े
            रजुआ खेले कंची
पकड़ धूप का नुक्कड़
अंगूरी सुखा रही बाल।

लीलाधर का चले वसूला
यादराम का रंदा
बजे निहाई पर धन, खुरपी
ढाल रहा खरबंदा
पंखी चले, कोयले दहकें
हुई कुल्हाड़ी लाल।
 


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