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कविता

खूँटियों पर टँगे दिन
अनूप अशेष


खूँटियों पर टँगे दिन
फटती कमीजों से रहे

धूल पीती साँस
टूटे घरों का संत्रास,
आँवे के नीचे
रहे ज्यों
किसी का रहवास
मोटे लिबासों बीच
पतली समीजों-से रहे।

बड़े घर की ओट आधे
बसे थे सपने,
पहाड़ों सी पीर
बाँधे हाथ
खून में अपने सने
साँस लेते हुए भी हम
यहाँ चीजों-से रहे।

चिटकते से रहे आँखों
आग के दाने,
अकेले की
आँच का
कोई नहीं माने
आँधियों के बीच उड़ते
पके बीजों से रहे।
 


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