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कविता

पान कुँअरि
अनूप अशेष


कैसी हैं पान कुँअरि
कैसे परबत्ते जी।

पींजरा तो वही होगा
पलंग भी अटारी का,
पान रचा
ओंठों का
कत्थई सुपारी का
बेल और जामुन में
आए होंगे पत्ते जी।

पाँव ठुमकते होंगे
गली के मोहल्ले के,
हवा झुरुकती होगी
ऊपर
दो तल्ले के
यह रितु तो बैरी की
बैरी हर रस्ते जी।

चीजें दालान की
नीचे उतरी होंगी,
पंख से
तितलियों के
गदेलियाँ भरी होंगी
सूँघ, वन करौंदे की
गंध वहाँ हँसते जी।

नदी साथ में होगी
नदी की रूमाल भी,
दीपदान की
आँखों
मंदिर का ताल भी
आँगन ओसारे को
बोलना नमस्ते जी।
 


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