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कविता

जो भी था
अनूप अशेष


जो भी था
अपने भीतर का होना था।

भीतर से
बाहर के आँधी
पानी में,
चलना हुआ अकेले
खींचातानी में
कुछ दाने अँकुरे
अपना ही बोना था।

फूटे जो फोड़ों-से
उनमें चेहरे थे,
चेहरों में
सोच के
द्वीप इकहरे थे
लंबी थी जल-राशि
नाव का ढोना था।

मीलों का चलना था
छोटे पाँवों का,
आँखों से
मन तक था
कहर हवाओं का
अपने मूँगे-मोती
लड़ी पिरोना था।
 


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