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कविता

खुले खेत की हवा
शांति सुमन


खुले खेत की हवा सरीखे
मन दौड़े-भागे
फैला दी चिड़िया ने बाँहें
मेड़ों के आगे।

जब-तब निकल पड़ी उड़ान पर
संग फूल को ले
राह खुशबुओं ने दिखलाई
रंग धूप को दे
कुमकुम बिखरा है परबत पर
भरी माँग लागे।

बहुत नाचने लगती है वह
रोम-रोम खिलते
कई पेड़ हों हरसिंगार के
फूलों से भरते
पानी-रेत, शंख-सीपी हैं
सब भीतर जागे।

ऐसा घर कोई बस्ती में
कबसे मिला नहीं
मिटती जहाँ थकान पैर की
कोंपल नाच रही
फटी हुई चूनर को उसने
फिर से कल तागे।
 


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