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कहानी

सिलसिला
से.रा. यात्री


रात को वह देर तक जागता रहा। पता नहीं कब आंखें लगीं। पर वह आश्‍वस्‍त था कि अगली सुबह बच्‍चों से मुंह नहीं छिपाना पड़ेगा। वह एक मित्र से बीस रुपये उधार लेने में सफल हो गया था। हालांकि इन रुपयों को लेते समय बीस तरह के रोने और पचास किस्‍म के झूठ बोले गये थे। रुपये जेब में डालकर जब वह सड़क पर चल रहा था तो उसे आज की सुबह फिर याद आ गई थी। विमला ने उसके हाथ में '‍टिफिन बॉक्‍स‍' देते हुए बहुत डूबे हुए स्‍वर में कहा था, ''आपने चार दिन पहले रद्दी न बिकवा दी होती तो कल बच्‍चों को फुलझड़ी और चार पटाखे जरूर मिल जाते।''

उसने विमला की बात का जो उत्तर दिया था वह बहुत कटखना था, ''काम करता हूं, बेरोजगार नहीं हूं। सुबह होते ही नौकरी पर जाने की तैयारी शुरू कर देता हूं पर फिर भी सब भिखारी नजर आते हो तो क्‍या सिर फोड़ लूं या डाके डालने लगूं?'' विमला ने उसके आक्रोश पर कोई प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त नहीं की थी। वह‍ उसकी चुप्‍पी से और भी अधिक आहत हो उठा था। घर से निकलने के बाद एक अजीब पश्‍चात्ताप उसके साथ पूरे वक्‍त रहा था। उसने स्‍वयं से पूछा था, 'ऐसा क्‍यों हो रहा है' पर जैसे अंधी गुफा में चलते-चलते दृष्टि नहीं रह जाती उसी तरह चीजों के समझने का तर्क उसका साथ छोड़ बैठा था। उसे तंत्र की असलियत का कहीं सुराग नहीं मिलता था।

अगली सुबह बच्‍चे बहुत जल्‍दी जाग गये, पता नहीं तीज-त्‍योहार के दिन ही ऐसा क्‍यों होता है? बच्‍चे और दिन कई-कई बार जगाने से भी करवटें नहीं बदलते।

अलस्‍सुबह उठकर उसने पत्‍नी के साथ लगकर सारे घर की सफाई करवायी और बच्‍चों को इस ताकीद के साथ नहाने-धोने के लिए प्रेरित किया कि ''जल्‍दी नहा-धो डालो। हम लोग जितनी जल्‍दी बाजार जायेंगे, भीड़ उतनी ही कम होगी। हम लोग सामान लेकर जल्‍दी लौट आयेंगे। कंदील तुम लोग घर में ही बनाना। मैं भी कुछ मदद कर दूंगा।''

इस प्ररेणा का प्रभाव यह हुआ कि कई बच्‍चे एक साथ हुड़दंग मचाते गुसलखाने में दाखिल हो गये।

पता नहीं कितने समय से उसने अपने बदन पर मालिश नहीं की थी। जाड़ा आने को था इसलिए देह पर खुश्‍की के लक्षण उभरने लगे थे। उसने सोचा, जितनी देर में बच्‍चे नहा-धोकर फारिग हों, वह हाथ-पैरों पर तेल ही चुपड़ ले। अब तक सहन में धूप फैलने लगी थी। वह तेल की शीशी लेकर बैठ गया। बेसुरेपन से गुनगुनाने की कोशिश करते हुए हाथ-पांव और पीठ पर उसने तेल लगाया ही था कि दरवाजे पर थपथपाहट होने लगी। वह परम निश्चिंत-सा हो गया था। एक बच्‍चे से दरवाजा खोलने को कहकर पीठ और गर्दन पर घिस्‍से मारने लगा।

दरवाजा खुलते ही जो आदमी भीतर घुसा उसे देखकर वह सिटपिटा गया। एक लकड़ी के शहतीर जैसा लंबा सूखा-सा आदमी बहुत बुरे हुलिये में मलबूस उसकी तरफ आ रहा था। चिथड़ों पर नरमे की मोटी चादर लपेटे हुए वह दहकानी ठीक उसके सामने आकर खड़ा हो गया। उसके गाल एकदम पिचके हुए थे। उनपर कम से कम हफ्ते-दस दिन की दाढ़ी सेही के कांटों की मानिंद उभरी हुई थी। गड्ढों में धंसी हुई पीली बीमार आंखों को देखकर कोई भी सहम सकता था। सिर के अधिकांश बाल सफेद थे और दाढ़ी में तो शायद ढूंढ़ने पर भी एक काला बाल नहीं मिल सकता था। रक्‍तहीन कलाइयों पर नसों के जाल फैले हुए थे। उस व्‍यक्ति ने हंसने की कोशिश करते हुए कहा, ''तुमने मुझे पहचाना नहीं?''

पहचानने का कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता था। उसने बच्‍चे से मोढ़े पर पड़ा तौलिया हटाने को कहा। ज्‍यों ही तौलिया हटा, वह आदमी मोढ़े पर बैठते हुए बोला, ''हम दोनों करीब तीस साल बाद मिल रहे हैं।''

''तीस साल?''

यह तीस साल उसके मस्तिष्‍क में इस तरह टकराये जैसे पहाड़ की चोटी से कोई वजनी चट्टान घाटी की ओर लुढ़कती आ रही हो। आगंतुक की ओर देखते हुए उसे भयमिश्रित संकोच हो रहा था। वह स्‍वयं एक विचित्र स्थिति में था। पूरे बदन पर मात्र एक जांघिया पहने वह तेल मालिश कर रहा था और तीस बरस पहले का अंतरंग सखा सामने मोढ़े पर बैठा था।

आखिर उसने सामने बैठे आदमी को ध्‍यान से देखा। उसके लटके हुए होंठों से साफ दिखलाई पड़ रहा था कि उसके दांत टूट चुके थे। उसे शुबहा हुआ कि वह होंठों में तंबाखू रखे हुए है। उसका यह शक थोड़ी देर बाद सही निकला। वह शख्‍स उठा और आगे बढ़कर उसने नाली पर पिच्‍च से थूक दिया। इस क्रिया को उसने लगातार कई बार दोहराया।

उसे वह आदमी विस्‍मयपूर्ण और रहस्‍यात्‍मक लगा। उसने सोचा कि यह किस तरह संभव हुआ होगा कि तीस बरस बाद भी यह उसका सही पता-ठिकाना खोजकर चला आया। इतने बरसों में उसने न जाने कितने पापड़ बेले थे और न जाने कितने शहरों की खाक छानी थी। कम से कम आठ नौकरियां की थीं और इस शहर में भी सात बार मकान बदल चुका था।

अपने बालसखा से वह भीतर ही भीतर बहुत घबरा उठा। उसे छेड़ने में उसे भारी जोखिम लगी। पता नहीं वह कहां से छेड़ बैठे और अपने घाव कहां से दिखाने लगे। सामान से बेतरह अंटी हुई कोठरी का दृश्‍य उसकी आंखों में आ गया। पता नहीं, खोलते ही कितनी अजीबो-गरीब चीजें अड़ड़ धम्‍म सिर पर आकर गिरने लगें।

लेकिन नंगी स्थितियों को कितनी देर तक टाला जा सकता है? इधर वह स्‍वयं शरीर से नंगा बैठा है, रुपये-पैसे के लिहाज से भी कोई बेहतर हालात नहीं हैं। इधर सामने वाला आदमी भी लगभग नग्‍नावस्‍था में है। उसने दूर तक किनारा खोजने की कोशिश की पर हाथ-पैर मारना व्‍यर्थ रहा। इस क्षण आश्‍वासनों से भरपूर तो सिर्फ इस घर के बच्‍चे थे जिन्‍हें बाजार जाकर खरीदारी करने की जल्‍दी थी और वे नहाने-धोने में जुटे हुए थे।

उसके भीतर बेचैनी की लहरें उठने लगीं। सामने वाला मुस्‍करा रहा था। उसकी मुस्‍कान इतनी मैली और मरी हुई थी कि उसने अपनी आंखें दूसरी ओर फेर लीं। बालमित्र का अप्रत्‍याशित बुढ़ापा उसे दुख देने लगा। एक तरफ अपने शरीर को चुस्‍त-दुरूस्‍त बनाये रखने के लिए तेल मालिश कर रहा है, दूसरी तरफ बैठा आदमी लगभग किनारे जा लगा है।

जो बच्‍चा नहा-धोकर गुसलखाने से निकल रहा था, उसको आवाज देकर उसने आगंतुक के लिए चाय लाने के लिए कहा। बच्‍चा सिर्फ कच्‍छे में गुसलखाने से निकला था इसलिए शरमाकर दीवार की ओट में चला गया और पूछने लगा, ''कितने प्‍याले चाय बनेगी, पापा जी?''

''बस्‍स एक प्‍याला। मैं तो नहाने जा रहा हूं। इन्‍हें पिलाओ।'' यह कहकर उसने अकारण मुस्‍कराते हुए अतिथि की ओर उंगली उठा दी। अनजान के लिए एकमात्र संबोधन 'अंकल जी' ही हो सकता था लेकिन उसने बच्‍चे से आगंतुक का परिचय अंकल जी के लिए चाय लाओ' कहकर नहीं कराया। वह किसी भी तरह घनिष्‍ठता के दावों से बचकर निकल जाना चाहता था। संबंधसूचक दावे कड़की की परिस्थितियों में बहुत दुखदायी हो ही जाते हैं।

''तुमने मुझे पहचाना नहीं दोस्‍त?'' जैसे किसी खाली कुएं से कोई आवाज निकाली।

''पहचान तो रहा हूं लेकिन आपको देखे हुए लंबा अर्सा हो गया। इधर मैंने नजर का चश्‍मा भी ले लिया है।'' उसने जान बचाने का उपाय निकाला।

आगंतुक ने नजर के चश्‍मे वाली बात पर हंसने की कोशिश की और मासूमियत से बोला, ''यों तो पोढ़े लगते हो। तुमपर तो उमर का कतई असर नहीं पड़ा।'' यह कहते-कहते उसके होंठ इतने फैल गये कि दांतों की काली जड़ें दिखलाई पड़ने लगीं। वह उसकी हंसी से आतंकित हो उठा, 'हे भगवान! यह कौन हो सकता है?'

पहेली बुझाना छोड़कर वह व्‍यक्ति बोला, ''तुम 'युवराज' को भूल गये? मैं तुम्‍हारे साथ तहसीली मदरसे में छठी जमात में था। हम दोनों में जमकर लड़ाई होती थी। लेकिन उससे क्‍या? मैं तुम्‍हें चाहता भी तो बहुत था।''

आने वाले की बातें सुनते हुए वह अपनी याददाशत को भरपूर टटोलता रहा पर इस उजड़ी शक्‍ल का कोई 'युवराज' उसे तीस बरस क्‍या शताब्दियों पीछे लौटने पर भी नहीं मिला।

पर 'युवराज' नाम बताने वाला कतई हताश नहीं हुआ। वह बीते वक्‍त को लौटाते हुए बोला, ''तुम्‍हें शायद याद हो, एक दफा मैंने तुम्‍हें धक्‍का दिया था तो तुम्‍हारा घुटना छिल गया था।''

उसकी बात सुनकर यकायक उसका हाथ अपने तेल-सने घुटने पर चला गया लेकिन उसने वहां से अपना हाथ तत्‍काल हटा लिया। उसे डर लगने लगा कि कहीं युवराज उसे वह छिली हुई जगह न दिखला दे।

लड़का चाय का प्‍याला ले आया तो युवराज ने प्‍लेट-प्‍याले को संभालते हुए कहा, ''तुम भी बनवा लेते अपनी खातिर। मैं अकेला चाय पीता क्‍या अच्‍छा लगूंगा?'' युवराज ने चाय का प्‍याला तीन-चार बार प्‍लेट में उंडेला और 'सुड़-सुड़' करके डेढ़-दो मिनट में चाय गटक गया।

खाली प्‍लेट-प्‍याला फर्श पर टिकाने के बाद वह बोलने लगा, ''उसी जमाने में एक-दो बार मैंने तुम्‍हें बतलाया था कि मेरे पिता ने दो शादियां की थीं। तुम्‍हें याद होगा, मैं चिमनलाल होस्‍टल के एक्‍स्‍ट्रीम लेफ्ट वाले सिंगल रूम में रहता था।''

अपने मित्र की आंखों में इतने पर भी खालीपन देखकर आगंतुक ने अपने पक्ष में एक प्रबल तर्क दिया, ''अच्‍छा तुम यों समझो, अगर मैं तुम्‍हें न जानता होता तो यहां कैसे चला आता? तुम्‍हें शायद मालूम हो मैं बार मैनेजर था। बड़ी अच्‍छी तनखा थी। बी. ए. में फिलासफी भी मेरा एक सबजेक्‍ट था। 'निरूलाज' में कई साल सर्विस की। अच्‍छी-खासी आमदनी थी। रोज फरीदाबाद चला जाता था। मेरी अपनी फैमिली वहीं थी। फिर क्‍या हुआ, मैं 'आल आफ ए सडन' बीमार पड़ गया...''

उसने अपनी बातचीत बीच में छोड़कर अपनी जेबों की तलाशी शुरू कर दी और किसी जेब से मुड़ी-तुड़ी पुडिया निकालकर उसमें से तम्‍बाकू निकालने लगा। हथेली पर तंबाकू रखकर वह तन्‍मयता से उसे अंगुठे से रगड़ते हुए बातों का टूटा सिलसिला जोड़ने लगा - ''छह महीने किसी तरह नौकरी चली, लेकिन फिर छूट गयी। तुम समझो प्राइवेट नौकरी और वह भी होटल की। आखिर कितने दिन बीमार आदमी के लिए खाली पड़ी रहती?''

युवराज ने मसला हुआ तंबाकू अपने होंठों में रखा और क्षण-भर के लिए चुप्‍पी साधकर बैठ गया। वह मन ही मन पस्‍त पड़ रहा था। उसकी समझ में यह बात साफ ढंग से नहीं उभर पा रही थी कि इस शख्‍त ने उसे इतने सबेरे क्‍यों घेरा है। मात्र स्‍नेहभाव तो उसका प्रयोजन हो ही नहीं सकता। आगंतुक ने मोढ़े से उठकर पीक नाली पर थूककर खड़े-खड़े ही कहानी आरंभ कर दी, ''अब एक बरस से पूरी तरह बेकार-बेरोजगार हूं। भूखमरी की नौबत आ गयी है। चार बच्‍चे हैं। बड़ा इंटर कर चुका है। बी. ए. में दाखिला दिलवाया है। देख रहा हूं। तुम्‍हारे बच्‍चे तो अभी काफी छोटे हैं। क्‍या लेट मैरिज की है?''

आगंतुक अजीब-से आवेश में लग रहा था। वह अनाप-सनाप तारतम्‍य-हीन कुछ भी बोले जा रहा था, गोया वह अपने मित्र को घनिष्‍ठता के दायरे में खींचकर विश्‍वस्‍त होना चाहता हो। वह फिर शुरू हो गया, ''पिता मरे तो उन्‍होंने फूटी कौड़ी नहीं छोड़ी। गांव की सारी जायदाद तो चौपट कर ही गये। पांच-सात हजार का कर्जा भी मेरे सिर डाल गये। दोनों माताएं मेरे पास हैं।''

आगंतुक ने यहां आकर उसकी ओर फिर देखा और एक लंबी सांस लेकर शायद अपने मित्र को तौलने लगा। 'जो होगा देखा जायेगा' के भाव से उसने अभिव्‍‍यक्ति की चरम पीड़ा खोलकर रख ही दो, ''बहुत बुरी हालत में हूं दोस्‍त।''

हालांकि उस आदमी की बुरी हालत कुछ कहने की मुंतजिर नहीं थी लेकिन वह स्‍वयं भी अवर्णनीय स्थिति में बैठा था। उधर बच्‍चे नहा-धोकर बाजार जाने के लिए 'राजकुमार' बने खड़े थे, इधर वह 'युवराज' नाम के चक्रव्‍यूह में फंस गया था।

चाय का प्‍याला अभी फर्श पर ही रखा था, अजीब-से-प्रश्‍नों की कुहेलिका से उबरने में अक्षम होकर उसने बड़े बेटे का नाम पुकारा और कुछ तेज स्‍वर में बोला, ''बीनू, यह प्‍याला उठाओ यहां से।''

उसकी तेज आवाज से आगंतुक में भी हरकत हुई और उसने अपना मोढ़ा जरा-सा और आगे करके फुसफुसाहट के लहजे में कहना शुरू किया, ''मैं अब ज्‍यादा धीरज नहीं रख सकता। तुम बचपन के संगी हो। बेलिहाज होकर अपनी बात कह रहा हूं। मुझे इसी वक्‍त दो सौ रुपये की सख्‍त जरूरत है।'' आगंतुक ने भावावेश में उसके हाथों को अपनी हथेलियों में लेकर कहा, ''मुझे मना मत करना मेरे दोस्‍त!''

वह युवराज की याचना सुनकर अवाक् रह गया। बोलने के लिए उसे खोजने पर भी शब्‍द नहीं मिले। उसकी पत्‍नी विमला इस दौरान रसोई की जाली से एक-दो बार ताक-झांक कर चुकी थी। बच्‍चे भी अपनी मां से सरगोशी में पूछ रहे थे कि यह कौन आदमी है जो पापा को सबेरे से घेरे बैठा है?

वह अतिथि को वहीं छोड़कर नहाने की घोषणा करते हुए कमरे में चला गया। उसने दहशत से इधर-उधर देखा और कुर्ते की जेब से बीस रुपये का नोट निकाल लिया। उसके आसपास कहीं कोई नहीं था पर फिर भी हड़बोंग में वह नोट को छिपाने की योजनाएं बनाने लगा। उसे कहानी में पढ़े हुए 'कोहनूर' को छिपाने की घटना याद आ गयी, उसे लगा कि बाहर बैठे ऊबड़-खाबड़ आदमी को इस नोट की बाबत सब कुछ साफ-साफ मालूम है।

जब उसे कोई ढंग की जगह नोट छिपाने के लिए नहीं मिली तो नोट को पतलून की चोर जेब में रखकर वह फिर सहन में निकल आया। उसका बालबंधु अभी मोढ़े पर ही डटा हुआ था। गुसलखाने की दिशा में जाने के बजाय वह युवराज की तरफ बढ़ गया और अपने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए बोला, ''भाई...मेरे पास आपकी सहायता के लिए कुछ नहीं है। मैं बहुत मजबूर हूं...''

उसने शब्‍दों को अपने गले में गोले की तरह अटकते हुए अनुभव किया लेकिन फिर भी उसने बोलने की कोशिश की, ''आप तो अपनी परिस्थितियां बतला भी गये पर मैं तो यह भी करने की स्थिति में नहीं हूं। मुझे हार्दिक खुशी होती अगर मैं इस समय आपकी मदद कर सका होता।''

कहने को वह कह तो गया लेकिन उसे अपने शब्‍द बहुत फुसफुसे और कमजोर लगे। जैसे उसकी पूरी अभिव्‍यक्ति के पीछे रटा-रटाया संवाद जैसा कुछ था जिसे प्रभावपूर्ण ढंग से बोलने की चेष्‍टा की गयी थी परंतु सामने वाले को महसूस नहीं कराया जा सका था।

अपनी बात खत्‍म करके वह एकदम चुप्‍पी साध गया। उसने अनुभव किया कि थोड़े-से शब्‍द बोलने में ही उसकी सांस फूल गयी है। उसने आगंतुक के चेहरे पर दबी-सी दृष्टि डाली और अपने शब्‍दों की प्रतिक्रिया तलाशने लगा। वह कुछ क्षण अनजाने में ही सांस रोके बैठा रहा। वह नहीं चाहता था कि पत्‍नी और बच्‍चे यह सुनें कि उसका कोई तीस वर्ष पुराना मित्र मिलने आया है और इतनी बदहालत में है कि रुपये मांग रहा है।

पता नहीं क्‍या हुआ कि सहसा उसके मुंह से निकाला, ''आओ युवराज, कमरे में बैठकर बात करें, यहां धूप आ रही है।''

युवराज नाम का विद्रूप उठकर उसके पीछे कमरे में पहुंच गया और याचना के स्‍वर में बोला, ''हर्रो! मैं रोज-रोज तेरे पास नहीं आऊंगा। तेरे पास मकान है और भी भगवान का दिया सब कुछ है। तेरे पास रूपया न हो तो किसी से लेकर दे दे। ऐसा वक्‍त बार-बार नहीं आयेगा।''

उसे अपने बचपन का नाम सुनाने वाला कभी इस जीवन में मिलेगा, ऐसी उम्‍मीद मां-बाप की मृत्‍यु के साथ ही खत्‍म हो चुकी थी। आज न जाने कितने सालों के बाद हरि को हर्रो कहने वाला आखिर कोई आ ही गया। उसने खाली आंखों से 'गया वक्‍त कभी नहीं लौटता' के अंदाज पर उकसाने वाले याचक को देखा और सहम गया। हालांकि बीस रुपये का पूरा नोट उसकी पैट में पूर्ण सुरक्षित था। लेकिन उसे लग रहा था कि आगंतुक के पास कोई ऐसी भेदी नजर है जो सारी वास्‍तविकता को स्‍पष्‍ट देख सकती है। हो सकता है, अगले क्षण वह यह भी कहने लगे, 'तुमने मुझसे रुपये छुपाकर पतलून की चोर जेब में ठूंस रखे हैं।'

वह निरंतर चुप बना रहा और कमरे में यों ही दीवारों पर आंखें डालता रहा। इन दीवारों में देखने को कुछ नया नहीं था। वह आंखें बंद करके भी देख सकता था कि कहां क्‍या कुछ है। जब चुप्‍पी एकदम असह्रा हो गयी तो वह डूबते‍-से स्‍वर में बोला, ''युवराज भाई, मेरे पास बीस का एक नोट है और आज त्‍योहार के दिन बच्‍चे बाजार जाने के लिए तैयार बैठे हैं।''

''बीस नही, मुझे कम से कम डेढ़-दो सौ चाहिए। तुम किसीके नाम रूक्‍का लिख दो। मैं उससे बेलिहाज होकर मांग लूंगा। मैं भिखारी नहीं हूं, माई फ्रेंड।''

जब उससे कोई उत्तर नहीं बन पड़ा तो युवराज ने अपने मस्‍तक पर हाथ मारकर कहा, ''बेशरम युवराज! तुझे यह दिन भी देखना पड़ा? दोस्‍त से कहने आया तो वह भी तेरी मदद नहीं करता।''

यह कहकर वह कुर्सी छोड़कर उठ खड़ा हुआ ओर दीवानगी के स्‍वर में बोला, ''अच्‍छा ठीक है तो फिर मैं जाता हूं। आज दीवाली का दिन है, तुमको दीवाली मुबारक हो। खैर, अब क्‍या कहना-सुनना वाकी है। आज कुछ भी हो सकता है। अब धीरज दम तोड़ चुका है दोस्‍त।''

आगंतुक की चेतावनी में उसे किसी भयंकर कांड के घट जाने की अग्रिम सूचना मिलती लगी। वह नीचे से ऊपर तक हिल उठा, जैसे कोई अनहोनी एक क्षण में ही घटित होने जा रही हो। उसके माथे की नसें तन गयीं। वह सामने प्रश्‍नवाचक की तरह खड़े मायूस आदमी की आंखों में झांकने की ताव नहीं ला सका। चुपचाप उठा और खूंटी पर लटकती पतलून की जेब से नोट निकाल लाया। उसने शर्मसार होकर वह नोट बचपन का नाम पुकारने वाले बालसखा की ओर बढ़ा दिया।

अब आगंतुक ने एक भी शब्‍द नहीं कहा और नोट उससे लेकर अपने माथे से छुलाकर उसके नंगधड़ंग शरीर से लिपट गया।

वह इस स्‍नेह-पगे आचरण के लिए कतई तैयार नहीं था। उसे अपने अंक से मुक्‍त करके युवराज दरवाजे की दिशा में बढ़ते हुए बोला, ''तेरे पास यही थे तो यही सही। मुझे तेरे बीस ही हजार और लाख बराबर हैं। जिंदगी रही तो कभी लौटा दूंगा। जाते समय छाती पर बोझ लेकर नहीं जाना चाहता।''

युवराज तेजी से कदम बढ़ाते हुए द्वार से बाहर निकल गया। वह भी दरवाजा बंद करके भीतर रसोई में पहुंच गया।


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