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कहानी

दंश
से.रा. यात्री


अवस्‍थी साहब पिछले तीन दिनों से कमरे में बंद हैं। घर के सभी सयाने और वयस्‍क कई बार दरवाजा खुलवाने की अनथक चेष्‍टाएं कर चुके थे परन्‍तु अवस्‍थी साहब परसों शाम दफ्तर से लौटने के बाद कमरे में घुसे तो फिर बाहर नहीं निकले। उनकी पत्‍नी गायत्री देवी स्‍वयं बहुत मिन्‍नत-खुशामद करती रही थीं लेकिन दरवाजा नहीं खोला तो फिर खोला ही नहीं। धीरे-धीरे सारे घर में एक अजीब-सा आतंक फैल चुका था। बड़ी लड़कियाँ, कालेज-स्‍कूलों में पढ़ने वाले बच्‍चे तथा अवस्‍थी साहब का दामाद रतनलाल घंटों बैठकर यह तय करते रहे थे कि आखिर अवस्‍थी साहब को किस तरह बाहर निकाला जाय! रतनलाल सेल्‍स टैक्‍स के दफ्तर में क्‍लर्क था। उसे तनख्‍वाह बहुत कम मिलती थी लेकिन ऊपर की आमदनी हो जाती थी, इसलिए अच्‍छा ठाट-बाट बनाकर रहता था। अवस्‍थी साहब ने किसी तरह जोड़-तोड़ करके बड़ी लड़की प्रमिला की शादी रतनलाल से कर दी थी। रतनलाल था तो मैट्रिक पास ही, पर उसका स्‍वास्‍थ्‍य बहुत निखरा हुआ था। बातचीत में भी बहुत अच्‍छा था। शादी के बाद से वह अवस्‍थी साहब के घर पर ही रह रहा था। अवस्‍थी साहब बनारस के रहने वाले थे और उनका पुश्‍तैनी पेशा महाब्राह्राण का था, इसलिए मेधावी होने के बावजूद अपने नगर में उन्‍हें कोई प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त नहीं हो पाई थी। बनारस विश्‍वविद्यालय में न पढ़कर वह इलाहाबाद में शिक्षा पाते रहे थे और वहीं से उन्‍होंने सन् 1930 में बी.ए. एल-एल बी. की परीक्षा अच्‍छी श्रेणी में पास की थी। घर-परिवार की स्थिति अच्‍छी नहीं थी। इसलिए साल दो-साल घर से खाकर प्रैक्टिस जमाने का धैर्य भी नहीं था। इसके अलावा कानून की परीक्षा पास करने तक दो बच्‍चे भी हो चुके थे। अवस्‍थी साहब शुरू-शुरू में छोटी-मोटी नौकरियों में दिन काटते रहे। दूसरे महायुद्ध के दिनों में राशनिंग विभाग में नौकरी मिली जो आगे जाकर पक्‍की हो गयी। अपनी तीक्ष्‍ण मेधा के सहारे अवस्‍थी साहब उन्‍नति करते चले गये। राशनिंग विभाग में रहते हुए उनकी घरेलू स्थिति कुछ सुधर गयी मगर उसी अनुपात में परिवार भी बढ़ता चला गया। अवस्‍थी साहब शुरू से ही सादगी पसन्‍द इन्‍सान थे इसलिए राशनिंग ऐसे महकमे में रहते हुए भी जीतोड़ पैसा पैदा करने की इच्‍छा उनमें कभी नहीं जागी। युद्ध की समाप्ति पर उन्‍होंने अपना विभाग बदल लिया। सेल्‍स टैक्‍स में आ गये। उनका कार्यक्रम बहुत निश्चित था। सुबह नित्‍यकर्मों से निपटकर दो घंटे पूजा करते और फिर भोजन करके दफ्तर जाते तो मेहनत से सरकारी काम करते। स्‍वभाव से मितभाषी और संकोचशील होने के कारण रिश्‍वत के लिए उन्‍होंने अपनी तरफ से कोई कोशिश नहीं की मगर सेल्‍स टैक्‍स अफसर होने की वजह से बड़े-बड़े व्‍यापारी अपने ढंग से उनके यहां विनम्रता दिखाकर दांत निपोरते हुए जो कुछ पहुंचा जाते उससे इन्‍कार न करते। उनकी सालाना रिपोर्ट हमेशा अच्‍छी होती रही और निर्बाध गति से उन्‍नति करते-करते एक दिन असिस्‍टैंट सेल्‍स टैक्‍स कमिश्‍नर की कुर्सी पर पहुंच गये। सारे विभाग में उनके देवता स्‍वभाव और बुद्धिमानी की धाक थी। बिक्री कर से सम्‍बन्धित सूक्ष्‍म से सूक्ष्‍म बातों का ब्‍यौरा उनकी जबान पर रहता था। अपने विभागीय काम के अलावा उन्‍हें किसी और बात में विशेष दिलचस्‍पी भी नहीं थी। जहां एक ओर अवस्‍थी साहब के गुणों में इतनी समृद्धि दीख पड़ती थी वहीं दूसरी ओर एक गहरी खाई भी नजर आती थी। अवस्थी साह‍ब की छोटी-बड़ी ग्‍यारह संतानें थीं। तीन पुत्रियों के बाद एक लड़का हुआ था जो अभी कालेज में पढ़ रहा था। बेटे के बाद सात बेटिया थीं। तनख्‍वाह से प्राविडेण्‍ट फंड के पैसे कटते थे वही उनकी संचित निधि थी। ले-देकर बीस हजार के बीमे थे। इतनी-सी सुरक्षित संपत्ति से स्‍पष्‍ट ही कोई बड़ा काम पूरा नहीं हो सकता था। हालांकि लखनऊ में उनके पास एक बहुत बड़ी कोठी थी, सामने कई बीघे का लान था मगर लान की कायदे से न कभी घास कटती थी और न फल-फूल के पौधे ही रोपे जाते थे। कोठी के बाहर बरांडे में पुराने-धुराने आठ सरकंडे के मोढ़े पड़े रहते थे। श्रीमती अवस्‍थी ने साइकिलों के टायर उनपर चढ़वा दिये थे जिससे उनके अंजर-पंजर ढीले होने पर भी सरकंडे एक जगह जुड़े हुए थे। पुरानी साडियों से मोढ़ों की गद्दियां दिखलाई देती थीं। कोठी की यही हालत अंदर से थी। बाहर कमरों की कोठी में एक भी कमरा ऐसा नहीं था जहां बाहर से आने वाले अतिथि को बिठाया जा सके। अधिकांश कमरों में बच्‍चों की किताबें-बस्‍ते और छोटे-मोटे कपड़े बिखरे पड़े रहते थे। श्रीमती अवस्‍थी को बेसलीका औरत नहीं कहा जा सकता। अपनी सामर्थ्‍य और सीमा के अनुसार वह घर को बराबर कायदे में लाने की चेष्‍टा करती रहती थीं परन्‍तु छोटी बच्चियां उनके कायदे पर बराबर धूल उछालती रहती थीं। ज्‍यों-त्‍यों करके बड़ी लड़की प्रमिला की शादी हो पायी थी। वह भी अवस्‍थी साहब के दफ्तर के एक जूनियर क्‍लर्क रतनलाल से। शादी में अधिक रूपया खर्च न कर सकने की मजबूरी ही इस विवाह के पीछे थी। लेकिन अवस्‍थी साहब ने अपनी बेटी की शादी यह सोचकर रतनलाल से की थी कि वह स्‍मार्ट लड़का है, कायदे से रहता है, परिश्रम और ईमानदारी से एक दिन उन्‍नति कर जायेगा। रतनलाल मेहनती और समझदार था पर दुनियादारी की समझ और दफ्तर से‍ मिलने वाली एक सौ तीस रूपल्‍ली की तनख्‍वाह ने उसे ईमानदारी की ओर से पूरी तरह विमुख कर दिया था। शादी होने के बाद वह अवस्‍थी साहब की कोठी पर ही रहने लगा और उसने दफ्तर की सारी फाइलों को उलट-पलटकर उन केसों को नोट कर लिया - जिनसे अच्‍छी रकम पैदा की जा सकती थी। रतनलाल दफ्तर में एक दबंग किस्‍म का आदमी माना जाता था ओर शादी के बाद तो दफतर के लोग उसे अवस्‍थी साहब का दामाद समझकर और भी घबराने लगे थे। अवस्‍थी साहब के सामने पेश होने वाले मुकद्दमों का रतनलाल ब्‍यौरेवार सूक्ष्‍म अध्‍ययन करने लगा और वह मुकद्दमों से सम्‍बन्धित पार्टियों से ऐसी रकमें वसूल करने लगा जो उन्‍हें किसी तरह भी अखरने वाली नहीं लगती थीं। ऐसी वसूली वह अपनी सास को लाकर देता और अवस्‍थी साहब को ऊंच-नीच समझाकर केस में थोड़ी नरमी करवा देता। अवस्‍थी साहब - जिन्‍होंने कभी ऐसा रवैया अख्‍तयार नहीं किया था - रतनलाल के तरीके से बहुत देखी होते परन्‍तु वे उसकी बातों और तर्कों के औचित्‍य से इन्‍कार न कर पाते। उनके रिटायर होने में कुल दो साल रह गये थे। बचत के नाम पर उनके पास पचास हजार रूपये भी नहीं थे। रिटायर होने के बाद इतने बड़े परिवार का भरण-पोषण एक ऐसी विषम समस्‍या थी जिसका निराकरण उन्‍हें कहीं होता नहीं दीख पड़ता था। रतनलाल के प्रयत्‍नों से घर में गोदरेज की अलमारियां और दूसरी सुविधाएं दिखाई देने लगी थीं। श्रीमती अवस्‍थी लड़‍कियों की शादियों के लिए भी थोड़ा-बहुत सामान जुटा रही थीं। रतनलाल की सहायता से थोड़ा-बहुत जेवर भी खरीदना शुरू कर दिया था। चूंकि अवस्‍थी साहब ने पूरी नौकरी के दौरान कोई ऐसा काम नहीं किया था जिससे विभाग में उनके बदनामी होती इसलिए उनके नाम पर रतनलाल की वसूली के बावजूद उनके दफ्तर में उनकी प्रतिष्‍ठा पूरी तरह सुरक्षित बनी रही। गत दो बरसों में रतनलाल ने एक हजार से पांच हजार रुपये तक भिन्‍न-भिन्‍न तरीके से वसूल किये। रिटायरमेंट के नजदीक पहुंचकर अवस्‍थी साहब में एक बड़ा परिवर्तन यह हुआ कि उनके सिद्धान्‍त बिलकुल ढीले पड़ गये। इसका कारण कुछ भी रहा हो लेकिन एक बात साफ हो गयी कि आने वाले असुरक्षित और भयावह कल ने उन्‍हें बुरी तरह हिला दिया था। अभी उनके रिटायरमेंट में कोई डेढ़ महीने का समय रह गया था‍ कि एक बड़े उद्योगपति का मामला आ गया। इस केस में पांच लाख के आयकर का घपला था। रतनलाल ने दौड़-धूप करके उद्योगपति से एक लाख तय कर लिया। उद्योग‍पति को कोई आपत्ति नहीं थी। वह एक लाख देने के लिए तत्‍काल तैयार हो गया। रतनलाल ने जब सारी बात अवस्‍थी साहब के सामने रखी तो उनका चेहरा एकदम बुझ गया, उन्‍होंने रतनलाल को तुरंत कोई उत्तर नहीं दिया। हाथ में लटके अखबार को ऊपर करके गम्‍भीर हो गये लेकिन रतनलाल चैन से नहीं बैठा, बोला, ''देखिऐ, आप नौ सितम्‍बर को रिटायर हो रहे हैं'' आज इक्‍कीस जुलाई है! रिटायर होने के बाद के लिए भी कुछ सोचा है, आपने कि सब चीजें कैसे चलेंगी? आपके रिटायर होने से घर के खर्चे तो एकदम बैठ नहीं जायेंगे। बच्‍चे आज जहां जिस स्‍टैण्‍डर्ड पर पहुंच चुके हैं उससे नीचे उतरने का सवाल ही नहीं उठता। मैं यह नहीं मानता कि इस केस में एक लाख रुपया ले लेने से सारी समस्‍याएं हल हो जायेंगी लेकिन इतना आप समझ रखिए कि आपके बाद जो आदमी इस कुर्सी पर आयेगा उसके लिए एक लाख रुपया लेने में कोई ऊहापोह जैसी चीज नहीं होगी। सारी मशीनरी करप्‍ट है। आप अपने तईं प्‍यूरीटन बनने की बात कर सकते हैं। वैसे इन टर्म्‍स में आजकल कोई नहीं सोचता। दस..., दस ही क्‍यों हजार बेईमान आदमियों के बीच एक ईमानदार आदमी रूटीन वर्क को खराब ही करता है। अवस्‍थी साहब ने चेहरे के सामने से अखबार हटाकर पूछा, ''तुमने इस केस में मितना रुपया एक्‍सेप्‍ट किया है?'' ''पचास हजार मैं ले चुका हूं। पचास तारीख के दिन मिलने की बात है।'' अवस्‍थी साहब का चेहरा सफेद और बुढ़ापे से भरा दिखाई देने लगा लेकिन उन्‍होंने अपनी अस्‍वाभाविक रूप से कांपती आवाज पर काबू पाने की कोशिश करते हुए कहा, ''हूं...इस केस में कौन तारीख लगी है?'' ''नौ सितम्‍बर।'' नौ सितम्‍बर का नाम सुनते ही अवस्‍थी साहब का पूरा शरीर एक बार तो ऐसे कांप गया गोया उन्‍हें जाड़ा देकर बुखार चढ़ आया हो लेकिन संक्षिप्‍त-सा 'ठीक है' कहकर उन्‍होंने अपना सिर फिर अखबार में गाड़ दिया। रतनलाल थोड़ी देर बैठकर प्रतीक्षा करता रहा कि शायद वह कुछ और दरयाफ्त करें पर अवस्‍थी साहब ने अखबार से सिर नहीं हटाया। घर के सारे काम हस्‍बेमामूल चलते रहे। अवस्‍थी साह‍ब के दैनिक कार्यों में भी कोई अंतर नहीं आया। वह पहले भी अधि‍क बातें नहीं करते थे, इधर तो उन्‍होंने एकदम बोलना छोड़ दिया। समझदार बच्‍चों और पत्‍नी ने इसे रिटायर होने का दुख ख्‍याल किया। अवस्‍थी साहब के कमरे की बत्ती सारी-सारी रात जलने लगी। रतनलाल ने इसे केस की तैयारी समझा और उसे यह सोचकर संतोष हुआ कि अवस्‍थी साहब बिना किसी झंझट के इतनी आसानी से तैयार हो गये। जिस दिन उस केस तारीख थी साहब सुबह से ही बहुत उद्विग्‍न और थके दिखलाई पड़े। उस दिन उनके चेहरे पर इतना बुढ़ापा उभर आया जैसे एक रात में ही वह वार्धक्‍य की पूरी सीढ़ी चढ़ गये हों। जो सहज गति उनके जीवन में सबके लिए बहु‍त स्‍पष्‍ट और जानी-पहचानी थी आज वह सहसा खंडित हो गयी। निश्‍चय ही इसमें रिटायर होने का दुख शामिल होगा मगर वह तो बरसों से कहते थे, ''क्‍या है जी इस नौकरी में? इससे चार गुना तो मैं सेल्‍स टैक्‍स के मुकदमे करके पीट सकता हूं।'' फिर वह विश्‍वास आज यकायक कैसे टूट गया? जो हो, अवस्‍‍थी साहब ठीक वक्‍त पर अपनी कुर्सी पर बैठ गये और अन्तिम केसेज और फाइलें देखने लगे। अवस्‍थी साहब सारे दिन सन्निपात के रोगी की स्थिति में रहे। उनके सामने जिस समय अन्तिम केस आया तो रतनलाल ने एक क्षण के लिए कमरे में झांका और बाहर हो गया। अवस्‍थी साहब का मस्‍तक बुरी तरह दुख रहा था। उन्‍होंने अपने मस्‍तक की खड़ी हुई नसों को अंगूठे से मसला और फाइल देखने लगे। उनका सहायक यह देखकर दंग रह गया कि इस केस का फैसला करने में अवस्‍थी साहब को दस मिनट का समय भी नहीं लगा। दफ्तर के कर्मचारियों की दृष्टि से यह एक महत्‍वपूर्ण मामला था लेकिन इसका चंद मिनटों में निपटारा होते देखकर सबने यह समझ लिया कि रतनलाल की गोली अपना काम कर गयी और अवस्‍थी साहब जहर का भरा हुआ प्‍याला बिना सांस लिए पी गये। अंदरूनी तौर पर इस केस के बारे में लोगों को बहुत-सी शिकायतें हो सकती थीं लेकिन अपने किसी मातहत के विरुद्ध जिस शख्‍स ने एक भी बुरी रिपोर्ट न दी हो उसे आज आखिरी वक्‍त पर माफ करना उन्‍हें इंसानी फर्ज लगा। सबको मालूम हो गया कि इस केस में अवस्‍थी साहब को क्‍या कुछ मिला है लेकिन शाम को दफ्तर खत्‍म होने के बाद किसी के चेहरे पर कोई शिकायत नहीं थी। अवस्‍थी साहब दफ्तर से लौटे और अपने कमरे में बंद हो गये। सब बार-बार दरवाजे पर टक्‍करें मारते रहे लेकिन वह बाहर नहीं आये। अवस्‍थी साहब यह तो नहीं कह सकते कि उनकी चादर एकदम बेदाग थी; रतनलाल ने उनकी जानकारी में कई बार पांच-पांच हजार रुपये लिए थे, हां, यह आखिरी झटका जो एक लाख तक पहुंचा है यही उनकी आत्‍मा पर असह्रा बोझ है। हो सकता है इसका प्रायश्चित करने में उन्‍हें और भी दो दिन लग जायें।


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