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कहानी

भविष्यवादी
से.रा. यात्री


अभी ''हम लोग एक-दो साल और भी यहीं रह सकते हैं-जहां सात बरस गुजारे-दो-तीन और सही। आखिर लोग रहते ही हैं।''

पिता ने गम्‍भीरता कायम रखते हुए अपनी बात पूरी की और हम लोगों को चश्‍मों से घूरने लगे। अपनी बात कहने के बाद वह खुश्‍क होंठों पर जीभ फिराकर उन्‍हें गीला कर लेते हैं और अगर किसी तरह यह आभास हो जाता है कि उनकी बात का विरोध हो सकता है तो लम्‍बी-सांसें खींचने लगते हैं।

जहां तक सम्‍भव होता है हम तीनों भाई और मां उनका विरोध नहीं करते, क्‍योंकि हम जानते हैं कि अन्‍त में वह हमारी ही मानेंगे और हमसे सहमत न होने की दशा में और भी अधिक हताश हो जायेंगे। कई बार यह भी होता है कि हम उनकी बात पर सहमति-असहमति कुछ भी व्‍यक्‍त नहीं करते और वह हम लोगों को चुप देखकर ज्‍यादा परेशान हो उठते हैं।

मैंने अपने दोस्‍तों के पिताओं को बहुत बुरी तरह बरसते और बिगड़ते देखा है। अगर बेटे-बेटियों की बात उन्‍हें नहीं रुचती तो नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं और कई तरह की कारगर धमकियों का इस्‍तेमाल करते हैं लेकिन हमारे पिता का गुस्‍सा कभी शब्‍दों में बाहर नहीं निकलता। वह एक बार पूरी तरह पागल हो चुके हैं-उस अर्से में हमारे परिवार की जमकर दुर्गति हुई थी।

दरअसल उनका पागलपन भी अजीब ढंग का था। उन्‍हें एक काल्‍पनिक आशंका ने आ घेरा था-अगर किसी दिन मेरी नौकरी छूट गयी तो? बस इसी बात को लेकर वह इतना परेशान हुए कि रातों जागने लगे। यह अनिद्रा कुछ इस तरह पीछे पड़ी कि रातों कमरे में और ऊपर छत पर चक्‍कर काटने लगे। उनके भयभीत रहने की हालत यहां तक पहुंची कि उन्‍हें लोगों से मिलते-जुलते भी डर लगने लगा। पहले वह महीने-भर का सौदा-सुलफ खुद ही लाते थे और सुबह रोज नियम से सब्‍जीमंडी जाकर सब्‍जी वालों से पैसे-पैसे का मोल-भाव करके तरकारियां खरीदते थे।

मेरे पिता कोई कंजूस आदमी नहीं हैं लेकिन थोड़े-से रुपयों का हिसाब गड़बड़ होने पर कमरे में अकेले बैठकर वह जेब से सारे रुपये-पैसे बाहर निकालकर कई-कई बार गिनते थे। बाज मौकों पर रुपये गिनते समय कोई उनके पास पहुंच जाता था तो एकदम सकपका उठते थे और गिने-‍बेगिने रुपयों को गडमड करके जेब के हवाले कर देते थे। हर नोट पर थूक लगाकर उसे पलटना उनकी आदत बन चुकी थी; बल्कि एक बार तो मुझे उन्‍हें झिड़कना पड़ गया-गो उस वक्‍त मेरी उम्र तेरह-चौदह बरस से कम नहीं थी। मैं, मां और पिता किसी नातेदार के यहां शादी में जा रहे थे। हड़बड़ी में ट्रेन पकड़ी - अभी सामान भी ठीक तरह से नहीं रखा गया था कि वह जेब से दस-दस रुपये के बहुत-से नोट निकालकर गिनने लगे। मैं अपनी सहज बुद्धि से समझता था अभी कोई गिरहकट पीछे लग जायेगा और मैदान साफ कर देगा। मेरे नाराज होने पर उन्‍होंने फिर वही हरकत यानी गिने-बेगिने नोटों को मिलाकर जेब में ठूंस लिया।

खैर, रास्‍ते में तो जेब वगैरह नहीं कटी पर ऐन शादी के दिन उन्‍हें कोई चित कर गया। कुएं पर नहाने गये थे। वहां अपने कपड़े-लत्ते उतारकर एक तरफ रख दिये। जब नहाकर लौटे तो कपड़ों के बीच कमीज का निशान भी नहीं मिला। मां और मैं बहुत क्रुद्ध हुए-पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने की भी बात उठी मगर वह भयभीत होकर इस तरह कांपने लगे कि आखिर रो-धोकर ही गम खाना पड़ा।

मुझे याद नहीं पड़ता (यों याद करने का मेरे लिए सवाल भी क्‍या उठता है) कि मेरी मां से उन्‍होंने कभी कोई मीठी बात की होगी। मैंने उन्‍हें हमेशा अपने-आपमें ही गर्क पाया-अन्‍दर से उद्वेगपूर्ण और बाहर से स्‍वयं को जबरन रोकते हुए। जिन दिनों उनका आत्‍मविश्‍वास खो गया था वह घण्‍टों जागते बैठे रहते थे। इस बीच हममें से किसीकी आंखें खुल जातीं तो फौरन किसी का नाम पूछने लगते। आप सोचिए जरा-नींद खुल जाने पर आप दोबारा झपकी लेने जा रहे हैं और इसी क्षण आपसे किसीके लड़के, बाप या मां का नाम पूछा जा रहा हैं और मजे की बात यह है कि सन्‍दर्भ का दूर-दूर तक‍ पता नहीं है। हम लोग उन्‍हें सोने के लिए कहकर फिर गहरी नींद में डूब जाते थे। उनके जागरण की स्थिति ने उन्‍हें अन्‍त में विक्षिप्‍त कर दिया।

उनके पागल होते ही हमारी सारी जीवनचर्या एकदम चौपट हो गयी। प्राइवेट नौकरी में ज्‍यादा देर तक किसीके ठीक होने का इन्‍तजार नहीं किया जाता। महीने-दो महीने में उन्‍हें नौकरी से अलग कर दिया गया। बड़ा भाई उस समय तेईस साल का था; बी. ए. पास करके एजूकेशन की ट्रेनिंग कर रहा था। उसकी ट्रेनिंग खत्‍म होने में अभी छह माह की अवधि बाकी थी। मैं उस वक्‍त बहुत छोटा था; मझला मैट्रिक में पढ़ रहा था। जमा-जथा कुछ पास था नहीं; पिता को रुपये-पैसे गिनने का व्‍यसन जरूर था लेकिन वह रुपये कभी बचा नहीं पाते थे। हमेशा मितव्‍ययिता का सहारा लेकर भी उन्‍हें खर्च कर डालते थे। रुपये-पैसे के मामले में कुछ इतने भविष्‍यवादी थे कि मन ही मन गणित करते और पचास रुपये माहवार बचाते हुए एक क्षण में पूरे साल की बचत जोड़ जाते और फिर अगले बीस वर्षों की बचत को हजारों तक खींच ले जाते यानी रिटायर होने तक सीधा-सा चालीस-पचास हजार का तखमीना था। लेकिन उनके अस्‍वस्‍थ होने पर हमने पाया कि आगे के दो महीने भी खिंचने वाले नहीं थे। मां और बड़े भाई ने तय किया कि उस मकान को छोड़कर किसी सस्‍ते मकान का जुगाड़ किया जाय।

हम लोग पहला वाला मकान छोड़कर जिस जगह रहने गये उसे किसी भी लिहाज से घर कहना मुश्किल था। छतें फर्श की गलबहियां करती लगती थीं। मैं तो फिर भी गनीमत हूं - बीच का भाई ताड़ जैसा लम्‍बा है। बेखबरी में ऊपर हाथ उठ गये तो उसके पंजों की चमड़ी छिल गयी। ऐसी दशा में छत में पंखा लगाने का तो सवाल नहीं उठता था...एक और कमरा था जिसमें अंधेरे का अजीब आलम था-उसमें घुसने के दो मिनट बाद तक यही नजर नहीं आता था कि कहां क्‍या है। मां और हम तीनों भाई टटोलकर चीजें तलाश करते थे। हर वक्‍त बिजली जलाना मुमकिन नहीं था; मालिक मकान पांच रुपये माहवार लेता था और किसी कौशल से दिन में बिजली बन्‍द कर देता था। तीन साल बाद घर में एक भी प्राणी ऐसा नहीं बचा था जिसकी आंखों पर चश्‍मा न चढ़ गया हो। मां को तो गठिया ने ऐसा घेरा कि वह टांगें घसीट-घसीटकर चलने लगीं।

बड़े भाई ने ट्रेनिंग खत्‍म करके कोई छोटी नौकरी तलाश की; मुझे और मंझले भाई को स्‍कूल में दाखिल करवाया और किसी न किसी तरह पिता का इलाज चालू रखा। मां तो वृद्ध होने ही लगी थीं। रात-दिन धीरज से काम लेकर घर-गृहस्‍थी की गाड़ी को खींचने वाले बड़े भाई का हुलिया भी विचित्र बन गया। उनके विवाह के समय कन्‍यापक्ष की औरतों ने यहां तक कह डाला, ''लड़का तो दुहेजु लगता है, सारा सिर तो धौला हुआ पड़ा है।'' मेरे लिए यह स्थिति काफी सनसनीखेज थी क्‍योंकि मेरे बड़ें भाई उस समय तक सत्ताईस बरस भी पूरे नहीं कर पाये थे।

पिता को हमने पागलखाने नहीं भेजा; यह बात दूसरी है कि हर नाते रिश्‍तेदार ने हमें यही नेक सलाह दी कि उन्‍हें 'मेंटल हास्‍पीटल' ही भेजा जाना ठीक है। पिता आत्‍म-विस्‍मृति के दौर से तो लौट आये लेकिन कार्य-कारण का सम्‍बन्‍ध पकड़ लेने के बाद भी उनकी झिझक और आत्‍महीनता दूर नहीं हो सकी।

उन्‍हें तीन बरस के बाद फिर नौकरी मिली। गम्‍भीरता से अपनी जिम्‍मेदारियों को समझते हुए उन्‍होंने महसूस किया कि उनका बोझ यकायक बढ़ गया है। इस बीच मंझला इतना बेनकेल हो गया था कि रात-रात-भर घर से गायब रहने लगा था। आधी-पिछली रात लौटता भी था तो इतनी बेखुदी के आलम में होता था कि सबसे ऊपर की मंजिल की खाली छत पर पड़ा पाया जाता था। एक दिन तो गजब होते-होते रह गया। वह जालिम न जाने रात को कब लौटा था - ऊपर जाकर एक नर्स के दरवाजे से लगकर सो गया। नर्स जवान और अकेली थी; वह तो गनीमत हुई, पिता बहुत जल्‍दी जागते हैं, किसी काम से ऊपर गये होंगे-उसे वहां देखकर जबरदस्‍ती नीचे पकड़ लाये। आप कल्‍पना कीजिये, अगर वह अविवाहित नर्स बीच में कभी किवाड़ खोलकर बाहर निकलती तो क्‍या बखेड़ा खड़ा हो सकता था! मंझला भाई आगे चलकर अपने बीहड़ दोस्‍तों को घर में लेकर आने लगा। एक दिन तो य‍ह तक हुआ कि इतवार की सुबह पिता के कुछ दोस्‍त ताश वगैरह खेलने के इरादे से आये। पिता ने उन्‍हें बिठलाने की नीयत से दरवाजा खुलवाया तो शराब की उल्‍टी की भभक से एकदम पीछे लौट गये। पिता के पीछे खड़े दो-तीन उम्रदराज लोग पिता की स्थिति भांपकर एक शब्‍द बोले जीने से चुपचाप नीचे उतर गये।...जब कमरे की धुलाई शुरू हुई तो पाया गया कि रजाई-गद्दे, पलंग और उसके नीचे कै करके कुम्‍भीपाक का दृश्‍य उपस्थित कर दिया गया है।

पर इतने पर भी मैंने अपने पिता को मझले भाई से इस सम्‍बन्‍ध में कभी बातचीत करते नहीं पाया। उन्‍होंने शायद उसी दिन यह फैसला कर लिया कि ऐसे बेटों के साथ किराये के मकान में गुजर नहीं हो सकती; किसी दिन भी इतनी फजीहत हो सकती है कि कोई सिर उठाने लायक नहीं बचेगा।

हम लोगों को मालूम नहीं कि पिता ने कब चुपचाप बड़े भाई के नाम एक टुकड़ा जमीन खरीद ली और मकान का नक्‍शा वनवा लिया। हम सब, जिन्‍होंने कभी अपने मकान की कल्‍पना भी नहीं की थी, सहसा सजग होकर मकान के निर्माण में सक्रिय हो उठे। मकान बनने की प्रक्रिया बहुत हतोत्‍साह करने वाली होती है। ईंट-गारा-मिट्टी और बालिश्‍त-बालिश्‍त बढ़ती दीवारें अपने नंगेपन के प्रति कोई आकर्षक नहीं जगातीं। इसके अलावा फर्श, छतें और लैण्‍टर का काम इतना जानलेवा होता है कि मन उससे दूर भागता है। परन्‍तु पिता सुबह-शाम उसमें इतने गर्क रहे कि उनका सारा हिसाब-किताब और तखमीना मकान से बंध गया।

हम लोगों के अनुमान से बहुत पहले ही मकान बनकर तैयार हो गया। उसके तैयार होने पर प्रवेश की तिथि पंडित से पूछी जाने लगी। मैंने बड़े गौरव से अपने दोस्‍तों को अपने निजी मकान के बारे में सूचना दी। धीरे-धीरे सारे परिवार ने मकान को लेकर अपने-अपने ढंग से फूलना शुरू कर दिया-हमारा अपना घर चाहे ढाई कमरे का ही सही ले‍किन है तो बिल्‍कुल अपना ही । कैसे भी रहो, कहीं घूमो, रात को जल्‍दी या देर से लौटो, दरवाजा बन्‍द हो तो दीवारें कूदकर भीतर घुस जाओ; कहीं कोई कहने-सुनने वाला नहीं, एतराज करने का सवाल नहीं। अपना घर क्‍या होता है यह जानना आसान नहीं। इसके लिए ईंट-चूने में लिपटी दीवारों को अपनी आंखों से उठते देखना जरूरी होता है।

हम नये मकान के बारे में बराबर बहसें करने लगे। मां का कहना था कि मुझे और मंझले को एक कमरा मिलेगा। उस कमरे में फर्नीचर भी डाल दिया जायगा। आने-जाने वाले उसी कमरे में बैठा करेंगे। उसमें एक ऐसा ताला फिट होगा जो बाहर से चाभी द्वारा खोला जायेगा लेकिन अन्‍दर से बिना चाभी के खुल जाया करेगा। यह ताले वाली स्थिति यह सोचकर अपनायी जाने वाली थी कि मैं और मंझला रात-बिरात देर तक बाहर भटकते रहते थे। पिछले वाला कमरा बड़े भाई और भाभी के लिए ठीक किया गया था। दोनों कमरों के मध्‍य में रसोईघर था। मां और पिता जी के विषय में अभी कुछ तय नहीं था। हो सकता है कि उनके लिए छत पर एक छोटा कमरा और बन जाय ले‍किन इसकी कोई रूपरेखा हमारे सामने नहीं थी।

नये मकान में जाने की बात दो माह और टल गयी। हमें नीची छतों वाली दुछत्ती और अंधा कमरा इतने बुरे लगने लगे कि हम बेचैन होने लगे। पिता ने नये मकान में जाने की कोई जल्‍दी नहीं दिखायी। फिर हमने पाया कि पिता और बड़े भाई आपस में कुछ खुसर-फुसर करते रहते हैं। और एक दिन इसका नतीजा सामने आ गया। जब हम सभी लोग घर में थे पिता ने कुछ ऊंची आवाज में एलान किया, ''अभी हमें यहीं रहना चाहिए...हम लोग एक-दो साल और भी यहीं रह सकते हैं, जहां सात बरस गुजारे-दो-तीन और सही...आखिर लोग रहते ही हैं...।''

मंझले ने इस फैसले पर तत्‍काल कोई प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त नहीं की। नया मकान बस्‍ती से बाहर खुले में पड़ता था। उसे रात को देर में लौटने पर असुविधा हो सकती थी। यह मकान नगर के बीच में था इसलिए वह गयी रात तक भी आसानी से घर लौट सकता था। मां पिता की घोषणा सुनकर दंग रह गयीं-उनका चेहरा थोड़ा खिंच गया और वह बड़े भाई की बच्‍ची को गोद से उतारकर उठने लगीं। बड़े भाई कातर दृष्टि से पिता का चेहरा कनखियों से देख रहे थे और भाभी अंधेरे कमरे में लगातार खांस रही थी। पिता की घोषणा सुनकर मैं एकाएक उत्तेजित हो उठा था। अभी तक यही सोचकर चुप था कि कोई उनका विरोध करेगा परन्‍तु सबको चुप देखकर मैं बौखला उठा, ''क्‍यों रहें इस नरक में जब अपना मकान तैयार खड़ा है?''

उत्तर देने से पहले पिता ने लम्‍बी-लम्‍बी सांसें खींचीं और दीवार के कोने में फंसे मकड़ी के जाले पर आंखें जमा दीं। मेरी तल्‍खी का उत्तर देने से पहले पिता ने आंखों से चश्‍मा उतारकर हाथ में ले लिया और पूरी नाक को दो उंगलियों के बीच में लेकर सहलाने लगे। हौंसला बटोरने के लिए वह ऐसा करते हैं। मैं बहुत पहले से इन क्रियाओं से परिचित हूं और बात अगर दरगुजर करने की होती है तो मैं आगे उन्‍हें परेशान भी नहीं करता हूं लेकिन यह मामला बहुत गम्‍भीर था। अब नये मकान को छोड़कर इस कालकोठरी में सड़ने को कैसे स्‍वीकार कर लिया जाय!

''ढाई सौ रूपया माहवार का आफर है,'' बहुत अपराधी भाव से सिर नीचे की तरफ झुकाकर उन्‍होंने स्‍पष्‍टीकरण दिया।

उनकी दलील से अप्रभावित रहकर मैंने कहा, ''तो?''

वह लड़खड़ा गये, ''दो साल किराये पर उठ जाता तो कर्जा भी उतर जाता।''

''फिर क्‍या जरूरत थी इतना ताबड़-तोड़ करने की? मकान बनवाया भी तो किराये पर उठाने के लिए!'' मैंने गहरी अवज्ञा से हंस पड़ा। मैंने अपना वार काफी नहीं समझा; उन्‍हें शब्‍दों से रौंदने लगा, ''भई वाह! जब हम किराये के नाम खाली पचास रूपया माहवार देते हैं तो बराबर रोते-झींकते रहते हैं-मकान-मालिक हमें लुटेरा लगता है। आप खुद सौ बार कहते हैं, 'दो कोठरियों का किराया पचास रुपये! अन्‍धी मची है, आग लग गयी है।' मैं पूछता हूं जो आपको ढाई सौ रुपये माहवार देगा उसके लिए दुनिया में दान खाता खुला है? बड़ी खुशी से आपका स्‍वागत करते हुए इतना ढेर सारा रुपया देगा? लूट मची है साली! हम लोगों की गर्दन उतार लेना चाहते हैं और हमारे नाखून को भी कोई छूता है तो बिलबिलाने लगते हैं।''

मैं अनाप-शनाप बकता चला गया। गालियां तक बक गया। पिता का मुंह अचम्‍भे से खुला रह गया। घर-भर में सबसे छोटा हूं और यह उम्‍मीद शायद किसी को नहीं थी कि मैं नये मकान के साथ इतनी गइराई से जुड़ गया हूं।

सहसा मैंने पिता की पेशानी पर पसीना देखा, वह बुरी तरह भयभीत लग रहे थे। उनके चेहरे की उभरी हड्डियां आगे की तरफ आ रही थीं और लुंगी से उघड़े टखने बहुत सूखे तथा ढीली झुर्रियों में कराहते नजर आ रहे थे। मैं उनकी स्थिति से घबड़ा उठा और बाहर जाने लगा।

पिता के पूरे शरीर में एक झुरझुरी उठने जैसा कम्‍पन हुआ और उंगली से इशारा करके जीवन में पहली बार उन्‍होंने सीधा सम्‍बोधन करके कहा, ''बैठो...तुम शायद ठीक ही कहते हो...पहली तारीख को यह मकान छोड़ देंगे।'' उनकी पूरी देह फिर से कांपी और वह बैठे-बैठे एक तरफ को लुढ़क गये। मां और बड़ा भाई उनको संभालने के लिए दौड़ पड़े। मैं बुरी तरह सहम गया और मुझे लगा, मैंने बेरहम होकर शब्‍दों की छड़ी से पीट-पीटकर उन्‍हें बेदम कर दिया है।


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