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कविता

महाप्राण
प्रेमशंकर शुक्ल


महाप्राण था
जीवन का महागान गाता था
अंतस् विस्तृत पहाड़ था :
आकाश छुआ
नदी फूटती थी जिससे
कविता की

मरकर हजार मरण
साध लिया था जीवन-राग
जाग-जाग कहता था -
फिर एक बार

तना हुआ सीना
गरिमा से गहरी आँखें
सूत्र सुझाती थीं -
दृढ़ आराधन से दो उत्तर
विकट प्रश्न हैं कहाँ अमर

कद-काठी का ऊँचा था
बड़े-बड़े छंदों को
अनुशासित करता था
कुपथ छेंकता
पथ पर वह आता था
गाता था - लिखता था
मुसकाता था : बड़ी-बड़ी सत्ता पर

दुर्धर्ष रहा वह इतना
कि तुलना हो जल से
सहज-सरल भी इतना
कि उपमा हो
जल से ही।
 


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