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कविता

आईने से
प्रेमशंकर शुक्ल


आईने में देखता हूँ
जो अपना चेहरा
कहाँ लौटता है वह
वही का वही

लगता है
आईने को चेहरे छिपाने की आदत है
जबकि हम समझते हैं
आईना चेहरा दिखाता है

हर रोज जो चेहरा
लेकर जाते हैं हम
आईने के पास
छूट जाता है वह
वहीं का वहीं

एक दिन कहना है
आईने से
कि वह हमारे सभी चेहरे
वापिस तो करे
 


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