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कविता

मेरा भाई
प्रेमशंकर शुक्ल


कल अचानक मेरा भाई मुझसे मिलने शहर आया
रोजी-रोटी की मुश्किलें चाट गई हैं उसका शरीर
घर की उलझनों ने छेंक दी उसकी पढ़ाई
पिता के मरते ही शुरू हो गईं
कचहरी की झंझटें

कितनी कम है अभी उसकी उमर
लेकिन घर की जिम्मेदारियों के चलते
असमय ही वह दुनियादार हो गया

मेरा वह भाई जो चंचल था बहुत
बात-बात में हँसता-लिपटता-झगड़ता रहता मुझसे
अदब से बोलता है अब

इतने अदब से
कि घर का हालचाल पूछने पर
उसके कहे से नहीं
उसके चेहरे के रंग और लकीरों से ही
सुनी या समझी जा सकती है
उसके भीतर की उथल-पुथल
 


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