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कविता

हमारे गाँव की शाम
प्रेमशंकर शुक्ल


खेतों से हर शाम घास का गट्ठर लिए
लौटते हैं माँ-पिता
चूजों के लिए चोंच में दाने दबाए
टेढ़ी लकीरों में लौटते हैं पक्षी
हुँकरती-रँभाती लौटती हैं गायें
अपने थनों में दूध भरे हुए

लहरों को विश्राम का कह
ठहर जाता है तालाब का जल

बत्ती को जलाने से पहले
बहन साफ करती है लालटेन का शीशा
शायद इसलिए कि -
साँझ हमारे घर में आदर से आ सके

बाड़े के बाँस के झुरुमुट में बढ़ रहा शोर
अभी थोड़ी देर में थम जाएगा सुबह तक के लिए
लगता है - इन चिड़ियों के बिना गाए
न धरती पर अँधेरा उतरता है
न उजाला ही फूटता है

धूप को - धूल को सुबह मिलने का कह
दुबक गई है गौरैया ओसार के अपने घोंसले में
अभी-अभी छौंकी गई तरकारी
गोधूलि को अपनी गंध से कर देती है सराबोर
सिझ रही रोटियों में महकती है हमारी भूख

लालटेन की रोशनी में पढ़ते हुए
मुझे याद आती है -
स्कूल के अपने साथी की अल्हड़ हँसी,
उसका भोला चेहरा और
गली का वह मोड़ -
जहाँ हम एक-दूसरे से छूट जाते हैं

बच्चों के लिए लोरियाँ,
हमारी नींद में मिठास और
स्वप्नों की सुखद आहटें लिए
उतरती है शाम हमारे गाँव
हम कहीं भी हों हमारे गाँव के शाम की
हमें हर रोज प्रतीक्षा रहती है।
 


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