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कविता

माँ-2
आनंद वर्धन


माँ आँच होती है
देती है तपिश
माँजती है हमारे संस्कारों को
और सहेजती जाती है
सब स्मृतियाँ
पुराने कपड़ों की तह सी।

कब हम घुटनों के बल चले
खड़े हुए कब
कब हमारी जुबान से झरे तोतले शब्द
पहली पहली बार
मौलसिरी के फूल से
कब हम बड़े हुए

कमरे के फर्श पर
कब सीखा लिखना
और कब
हमारे कंधों की ऊँचाई
उसे पार कर गई
हमें संस्कार देने वाली माँ

हमें संसार का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति मानती है
जिसके लिए सब कुछ संभव है
जो हमेशा बोलता है सच
जो कुछ गलत नहीं करता

दुनिया का छोटा सा शब्द माँ
बड़ा है दुनिया से भी
और उससे भी बड़ा है
माँ का आँचल
नीले आसमान से भी बड़ा।

 


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