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कविता

बहुत दिनों से...
आनंद वर्धन


बहुत दिनों से तुमने कोई चिट्ठी लिखी नहीं
बहुत दिनों से दरवाजे पर मैना दिखी नहीं

सोच रहा हूँ सुबह सुबह लगती होगी कैसी
सूरज की पहली किरनों सी कोमल रेशम सी
बोली तेरी गूँज रही घर के कोने कोने
तेज हवा पर चढ़ आई भोली खुशबू जैसी
लगता है तुम दीवारों के पीछे कहीं
बहुत दिनों से तुमने कोई चिट्ठी लिखी नहीं

घर के सारे बर्तन कपड़े बैठे हैं गुमसुम
और पेड़ भी हैं उदास, पौधे भी हैं कुछ गुम
इनको आकर दुलरा दो, छू लो कुछ बात करो
सोच रहे सब हुए बहुत दिन, अब तो आओ तुम
तुमने जो जैसा छोड़ा था, सब कुछ रखा वहीं
बहुत दिनों से दरवाजे पर मैना दिखी नहीं

मुझे याद आता है तेरा बाँहों में भरना
सकुचाना चुप हो जाना, कुछ शरमाना डरना
रात बिखेरी चंदा ने जो रजत राशि ढेरों
वैसा लगता ओस कणों का केशों से झरना
प्यार तुम्हें बेटे को वह भी होगा वहीं कहीं
बहुत दिनों से तुमने कोई चिट्ठी लिखी नहीं।

 


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