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कविता

मेघों ने दी ताल कि सावन बीत गया
आनंद वर्धन


कैसा मचा धमाल कि सावन बीत गया

बड़े ताल की लहरें आज जवान हुईं
चलती दुलकी चाल कि सावन बीत गया

बंधन सारे टूटेंगे यह लगता है
उमड़ा छोटा ताल कि सावन बीत गया

मछुआरिन खुश हो मिलजुल कर बुनती है
मछुआरे का जाल कि सावन बीत गया

बुधुआ की झुग्गी में पानी आ बैठा
किसे सुनाए हाल कि सावन बीत गया

ऊँचा दाम मिलेगा धन्ना ने रोका
गोदामों में माल कि सावन बीत गया

बच्चों की कागज की नावें दौड़ पड़ीं
बिन चप्पू बिन पाल कि सावन बीत गया।

खटता रमुआ पानी डूबे खेतों में
घरवाली बेहाल कि सावन बीत गया।

आँख मिचैनी में सूरज कुछ पिछड़ गया
गली न उसकी दाल कि सावन बीत गया।

बादल सब सैलानी जैसे लौट चले
आना अगले साल कि सावन बीत गया

सुबह खिली, हरियाये पर्वत चोटी तक
मन का मिटा मलाल कि सावन बीत गया।

 


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