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कविता

स्त्री की हँसी
प्रेमशंकर शुक्ल


कितनी मोहक होती है
स्त्री की हँसी
स्निग्ध-भरी हुई
उजास से

न जाने कितनी पीड़ाओं -
दुखों को बरका
फूटती है यह उजास

स्त्री की हँसी :
होती है सचमुच में
अद्वितीय
यह एक सुंदर संज्ञा की
अत्यंत सुंदर क्रिया है
रोशन किए
अपनी ऊष्मा से
हमारा आसपास
 


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