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कविता

वन-गंध
प्रेमशंकर शुक्ल


भीतर भर रही है
वन-गंध

डालियाँ-टहनियाँ लहरा रही हैं ऐसे
जैसे हवा से
उनके रिश्ते का
यह महत्वपूर्ण जश्न हो

इस वन से गुजरते
रह-रहकर आ रही है
तुम्हारी याद

वन-गंध के साथ
इसी वन में आनी थी
तुम्हारी महक भी
होना था एक-दूसरे को निहारते हुए
पर अफसोस!
चला जा रहा हूँ दूर
बहुत दूर!!
 


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