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कविता

यह साँसत
प्रेमशंकर शुक्ल


यह साँसत
लगता है
संकट बन जाएगी

खामोशी यह
भारी पड़ेगी
कहीं-न-कहीं

बहुत व्यवस्थित होने का दवाब
बिखरा देता है
अधिक

आती हैं
इतनी मुश्किलें
कि उपाय -
गड्डमड्ड होने लगते हैं

होता है क्यों ऐसा
कि पता नहीं चलता
समय का सही अर्थ
और सूझते नहीं
शब्द -
कुछ कहने के लिए?
 


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