hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कविता

भीतर एक भय है
प्रेमशंकर शुक्ल


पाता नहीं कब से
भीतर एक भय है

बाहर बहुत जय है

जय है बहुत से
बढ़ जाता है
भीतर का भय

भीतर का भय
और बाहर बहुत जय
दिखाई देने लगे हैं -
इतने एक
कि हमें -
अपने ही विश्वास में
घुटन महसूस होती है।
 


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में प्रेमशंकर शुक्ल की रचनाएँ