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कविता

घर पहुँचने की खुशी
प्रेमशंकर शुक्ल


अपने घर पहुँचने की खुशी
अद्भुत चमक से भर देती है
हमारी आँखें

कोल्लम* में उतरता मेरा साथी
कितना खुश था
स्टेशन आने के कुछ पहले ही
टे्रन के दरवाजे पर खड़े हो
निहारने लगा था
अपने अंचल की सदानीरा नदियाँ
नारियल के झूमते पेड़

उसकी आँखों में छलक आई थी
पत्नी से मिलने की खुशी
बच्चों की खिलखिलाहट से
मन ही मन भीग रहा था
वह बहुत

कोल्लम स्टेशन पर जब दिखा उसका भाई
पुकारा उसे जोर से
मेरी ओर निहार किया चलने का संकेत
अभिवादन भी चहकते हुए

बहुत खुश था वह
वर्षों में लौट रहा था अपने घर

देख उसकी खुशी
पूर आया था मैं भी
असीसते हुए निहारता रहा
देर तक उसे

* कोल्लम-केरल का एक स्टेशन
 


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