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कविता

चीटियाँ हमारी लौकिक गुरु हैं
प्रेमशंकर शुक्ल


कोने के कचरे-कताहुर से
धूल-धक्कड़ से
चीटियाँ अपने घर
चीनी और चावल के दाने
ले जा रही हैं
अपने अच्छे और आवश्यक को
अपनी पूरी चिंता और सामर्थ्य से
कचरे से निकाल लेना-सहेज लेना
और उसे सुघर देना
चीटियों के लिए उत्सव जैसा है
चीटियों की जिजीविषा - सामर्थ्य
और सहकार को देख
हम उबरते हैं अपने बोझिल समय से
सँभलते हैं अपने आवश्यक को - अच्छे को
समेटने-सहेजने और सँवारने के लिए
चीटियों के प्रति
कृतज्ञता से यह कि -
वे हमारी लौकिक गुरु हैं।
 


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