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कविता

गलियाँ
प्रेमशंकर शुक्ल


गलियाँ हमारे संसार की पहुँच हैं
सुलझा देती हैं
बात की तरह कठिनाई

हमारी भाषा का वैभव
गलियों से ही
बढ़ा है बरहमेश

संबंधों को सिरजती-सँवारती
छूट गए को मिला ही देती हैं
कभी-कभार
देती हैं दुर्गम से उबार
पार हुआ तो
गलियों का ही नाम लूँगा।
 


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