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कविता

पड़ताल
सोनी पांडेय


पूर्णता/अपूर्णता का द्वंद्व सहेजे
जब रखती हूँ पैर बस में
भागने लगती है मेरे भीतर की स्त्री...
उस आदमकद आईने के सामने
और एक दम से खयाल आता है कि
शायद भूल गई हूँ
माँग भरना या चिपकाना माथे पर बिंदी
रह गई चूड़ियाँ वहीं श्रृंगारदान में
झट पर्स में से निकाल कर प्लास्टिक के कड़े डाल लेती हूँ देख कर सूनी कलाई
सुहागन की सूनी कलाई
अपशगुन का भय
नाच जाता है उसका चेहरा जो भागते हुए
गया सुबह -सुबह
और सिहर उठते हैं रोंए ...
जबकि मुझे विश्वास नहीं ईश्वर पर
शुभ/अशुभ पर
फिर भी उस भागते हुए आदमी के चेहरे से प्रेम की हद है या मेरे अंदर की औरत की कमजोरी कि, कुछ चूड़ियाँ, बिंदी जरूर रहती हैं पर्स में
इस आपातकालीन परिस्थितियों में...

इस तरह सीखती गई
अनगिन गणित कि कैसे जोड़ना/घटाना है
कैसे रखना है खुश सबको
कैसे सुबह जल्दी बनाई जाती है सब्जी

आँगन में नहाते बच्चों को कैसे झट-पट तैयार करना और भेजना है स्कूल
सीख लिया सास/ससुर को समय से देना चाय
नहीं छूटता गलती से आस-पड़ोस का सुख-दुख जानना
पर रह ही जाता है रोज सहेजना खुद को
कुछ सपनों की तहें नहीं खोल पाती किसी दिन
जिसे तहा कर रखा था, छोड़ते उस आँगन को
सपनों को जी पाना भी आज एक सपना है
जबकि उन दिनों दुपट्टे में ठाट से बाँध लेती थी
बाँट लेती थी, कुछ माँ से
सखियों और बहनों से
बेखौफ बता आती थी पड़ोस की भाभियों को
कि सिर नहीं झुकाऊँगी
निर्जलाव्रत, उपवास और बेकार की मनगढ़ंत
मान्यताएँ नहीं मानूँगीं
वह हँसती और ठोक कर सिर कहती
मानों न मानो
मानना पड़ता है...
औरत की सरहदें वहीं तक हैं
जहाँ तक पुरुष चाहता है...

और इन दिनों
एक मशीन की तरह चलते
सोचती हूँ
उस युग में अपनी रक्षा के लिए पकड़ाया
अस्त्र-शस्त्र मुझे
आज भेजते हुए नौकरी पर भी तुम करते हो
रक्षा अपनी अर्थव्यवस्था का
बदल लिए मानक धर्म का कि परिवार पोषण में
बराबरी की भूमिका है मेरी
बदल लिए नियम सामाजिक ढाँचे की अपने लिए कि
अब चौखट के अंदर बाहर की जिम्मेदारियों में हम बराबर हैं
लेकिन नहीं बदल पाए दिमाग को
दरवाजे पर आज भी तुम हो
चौखट के अंदर मैं
कैद पिंजड़े में मैना जैसे तोड़ना चाहती है
लौह श्रृंखला
उड जाना चाहती है
आकाश की अनंत ऊँचाई तक
मैं तोड़ देना चाहती हूँ
कभी-कभी
अपने स्त्रीत्व का बोध
एक बू सी उठने लगती है
नथूने फूलने लगते हैं
काई में लिपटी नीम की जड़ सी गिली वर्जनाएँ
सुलगने लगती है
और फाड़ कर वह परदा भाग जाना चाहती हूँ
बस मुट्ठी भर समय ही माँगा था
पर तुम्हारी दुनिया में
सब है मेरे लिए
नहीं है तो बस
मेरे हिस्से का मुट्ठी भर समय...
 


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