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कविता

कविताओं का मरते जाना
सोनी पांडेय


अभी-अभी आई थी
एक कविता
कुछ शब्द उफन रहे थे
कुछ भाव हिलोरे मार रहे थे
अँगुलियाँ कंपित हो छटपटा रही थीं
कि बस कलम मिले
और कविता जनम ले कागज पर
पोर-पोर टूटने लगा
कविता फूटने को थी
कि एक कड़कदार आवाज कानों में पड़ी
कपड़े पड़े हैं अभी तक धुलने को
हद है, दोपहर हो गई...

नशा है कविता का
चसक है लिखने का
भले घर की औरतें कहाँ पालती हैं
ऐसे बेहूदे शौक...

कितनी हैं शहर में जो पालती हैं
कविता का शौक
बस एक शब्द कानों में पड़ते -
मीच लिए आँख,कान बंद कर लिए
फिर भी वह तेज जहर पड़ ही गया
रsssssssssण्डीsssssयापा है
कविता...
और जनमने से पहले ही कविता मर ग ई...
 


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