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कविता

उच्छृंखल
सोनी पांडेय


उसकी नजरों में तेजाब सी जलन थी
और मैं जबरन बताना चाहती थी
कि आज, देखो मेरी कविता यहाँ छपी है...

वह रोके था जहर गले तक
बेमन से हाँ-हूँ करता रहा
मैं खुश थी कि छपना उस पत्रिका में
मेरी सबसे बड़ी खुशी थी...

और अगली बार सुनते ही मेरी अगली खुशी
सह न सका...
उफन पड़ा उबल कर
मेरा लिखना उच्छृंखलता था
छपना भी, साहित्यिक बहसों में सहभागिता
और कविता सुनना, सुनाना भी
ये भले घर की औरतों के तय मानक के विरुद्ध था...
इस लिए मालिक द्वारा ठहराई जा चुकी हूँ
अपने खून के सभी रिश्तों संग
उच्छृंखल
हाँ, अब मैं एक उच्छृंखल स्त्री हूँ...
 


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