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कविता

दरवाजे फिर से
रामचंद्र चंद्रभूषण


दरवाजे फिर से
गदराई ऋतुगंधा।

चितवनिया
सुमिरन में बीत गई
छलकन में
गागरिया रीत गई
खाती हिचकोले
सरगम की सारंधा।

विजनवती
थालियाँ परोस रही
किरन-फूल
जूड़े में खोंस रही
पाकर वरमाल
झुका गेहूँ का कंधा।
 


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