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कविता

मेट्रो में रोना
अविनाश मिश्र


जैसे रोना चाहिए वैसे नहीं रो रही थीं वे

वहाँ संसद थी और केंद्रीय सचिवालय का मेट्रो स्टेशन
जहाँ से एक लंबी सुरंग से गुजरकर
मेट्रो रेल दिल्ली विश्वविद्यालय तक जाती थी
बगैर धूल उड़ाए मेरे धूल-धूसरित भारत में

यह शासन के अनुशासन में गुजर जाने का वर्तमान है
और रुलाइयों के व्याकरण पर इसका गंभीर प्रभाव है
यहाँ बेवफाइयाँ हँसमुख और जुदाइयाँ शुष्क थीं
और इस वर्तमान में एक लड़की और उसके साथ दो बच्चियाँ
जो उस लंबी सुरंग में से गुजर रही मेट्रो रेल के भीतर
बराबर रोए चली जा रही थीं
जैसे रोया जाता है वैसे
जैसे रोना चाहिए वैसे नहीं

मलाई लड़कियों और दैवीय सेलफोन धुनों को बेअसर करती हुई
उन बच्चियों की रुलाई भीड़ में ‘हॉर्न’ की तरह थी

दिल्ली पुलिस के आँख और कान बनने के चक्कर में
लगभग अंधे और बहरे हो चुके नागरिकों
और दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन के अब तक के स्वर्णिम अतीत में
यह रुलाई संभवतः पहली बार थी

दिल्ली पुलिस के आँख और कान बराबर पूछताछ कर रहे थे
लेकिन बच्चियाँ अपनी रुलाई से आगे नहीं बढ़ पा रही थीं
और लड़की खुद की चुप से

अंधी और बहरी नागरिकताएँ तब तक चैतन्य नहीं होतीं
जब तक सामान्यताएँ अपवाद में न बदल जाएँ
लेकिन यह चैतन्यता अपंगता ही है
इसलिए एक रूमाल एक कलम एक ट्रांजिस्टर बम है
सब मकान मालिक शरीफ और सारे किराएदार लुटेरे हैं
पाँच सौ और एक हजार रुपए के सब नोट जाली हैं
कहीं कोई मजबूरी बताकर कुछ मदद माँग रहा व्यक्ति ठग है
और यदि यही मजबूरी कहीं कुछ बेच रही है तो माल यकीनन चोरी का है
और बच्चे यहाँ तभी रोते हैं जब वे अपहृत होते हैं

और इस अर्थ में मेट्रो में रोना अपहरण में रोना था
मेट्रो में रोना सब गंतव्यों पर रुक-रुककर रोना था
मेट्रो में रोना संसद से जहाँगीरपुरी तक रोना था
मेट्रो में रोना मेट्रो में होना था
 


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