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कविता

गणमान्य तुम्हारी...
अविनाश मिश्र


वह बीस वर्षों से दीप प्रज्ज्वलन की दुनिया में है
और इस दरमियान वह करीब बीस हजार बार दीप प्रज्ज्वलित कर चुका है
इस एकरसता में एक सरसता अनुभव करता हुआ
वह सुरक्षा कारणों से अब तक टमाटरों, अंडों, जूतों, पत्थरों, थप्पड़ों
और गोलियों से तो दूर है लेकिन गालियों से नहीं

एक सघन हाशिए से लगातार सुनाई दे रही गालियों के बरअक्स
वह है कि दीप पर दीप जलाता जा रहा है

इस उत्सवरतक्षतमदमस्त वक्त में
इतनी संस्कृतियाँ हैं इतनी समितियाँ हैं इतनी बदतमीजियाँ हैं
कि उसे बुलाती ही रहती हैं अवसरानवसर दीप प्रज्ज्वलन के लिए
और वह भी है कि सब आग्रहों को आश्वस्त करता हुआ
प्रगट होता ही रहता है
एक प्रदीर्घ और अक्षत तम में ज्योतिर्मय बन उतरता हुआ

लेकिन तम है कि कम नहीं होता
और शालें हैं कि वे इतनी इकट्ठा हो जाती हैं
कि अगर करोलबाग का एक व्यवसायी टच में न हो
तब वह गोल्फ लिंक वाली कोठी देखते-देखते गोडाउन में बदल जाए

गाहे-बगाहे उसे बेहद जोर से लगता है
कि वे शालें ही लौट-लौटकर आ रही हैं
जो पहले भी कई बार उसके कंधों पर डाली जा चुकी हैं
क्योंकि ठिठुरन से हुई मौतें हैं कि थम ही नहीं रहीं इस दुनिया में
इतनी इतनी सारी शालों के बावजूद

वे एक उम्र के असंख्य पाँच मिनट
वे इतनी गणेश और सरस्वती वंदनाएँ
वे इतने सत्कार
वे इतने दो शब्द
वे इतनी बार माइक से गायब होती हुई आवाजें
वे इतने चेहरे
वे इतनी तालियाँ और गालियाँ... गालियाँ... गालियाँ...

इसे शर्म कहें या सरमाया ये सब कुछ भी हासिल है उसे
एक वातानुकूलित और मधुमेहपीड़ित जीवन में
 


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