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लोककथा

पहाड़ की प्योंली
गीता गैरोला


आसमान को छेदती नुकीली ऊँची-ऊँची बर्फीली चोटियों की तलहटी में देवदार, भोज और रिंगाल के हरे-भरे सघन जंगलों के बीच एक गहरे अनछुए उड्यार (गुफा) में कच्ची हल्दी के साथ गुलाबी बुराँस सी रंगत वाली एक लड़की रहती थी। दूर पास तक कोई मानुष जात नहीं निपट अकेली। जंगल के पौन पंछी, भौंरे, तितली, छोटे बड़े पशु-पक्षी धरती पर लिपटे नन्हें फूल-पौधे, आसमान से लिपटते ऊँचे-ऊँचे तिकोने पेड़ ही उसके भाई बहिन अपने पराए थे। यही अपने उसे प्योंली कह के बुलाते। सब उसकी बोली चीन्हते और वो सबके मन की जान लेती। रात दिन झुरता चौमासा जब चारों दिशाओं को सफेदी से ढक देता उस घुप्प उदासी में भी सारे जंगल की बसासत हवा की हिलोरों के साथ सीटी बजा-बजा कर प्योंली-प्योंली गा-गा के उसके साथ होने का अहसास दिलाते रहते। सर्दियों के बर्फीले दिनों में प्योंली के हिस्से की बर्फ भी खुद ही ओढ़ बिछा लेते। नरम परों वाले पंछी अपने परों को बिछा के प्योंली का बिस्तर बना देते। सारे जानवर गुफा के दरवाजे को घेर कर अपनी साँसों की गर्मी से प्योंली के लिए गुनगुना मौसम बनाये रखते।अपनी बोली में गीत सुना कर उसका मन बहलाते। सर्दियाँ बीतने पर बसंत के आगमन से जंगल में जमी बर्फ जब सफेद फेन उगलती छोटे-छोटे धारों में बँट कर बल खाती हुई नदियों से मिलने को आतुर हो जाती। सारा जंगल धूप के ताप की खुमारी में डूबा रंग-बिरंगे फूल खिला देता। दिन देहरी पै ठिठक जाता। भौंरे गुन-गुन की पुकार से प्योंली को गुफा से बाहर बुलाते। तितलियाँ अपनी सहेली का हाथ पकड़ के बड़े मान से रंगों की महक से महकती अपनी दुनिया में लाती। प्योंली उनके साथ कूदती अपने मन की छलाँगें लगाती बन-बन गदेरे-गदेरे डोलती। एक दिन नदी के किनारे फेनीले पानी में पैर डुबोए वो मोनाल (ऊँचे पहाड़ों पर रहने वाला बहुत रंग-बिरंगा पंछी) के साथ कुछ गुनगुना रही थी।

तभी गदेरे के पारदर्शी पानी में कोई परछाईं झिलमिलाई। प्योंली ने पलट के देखा। उसके पीछे एक युवक खड़ा था। वन्य पुष्पों के बीच खिली वनफसा सी प्योंली को पनीली आँखों से देखता युवक सकपकाते हुए बोला बहुत प्यासा हूँ, पानी पी लूँ क्या? प्योंली पानी से पैर खींचते हुए परे हट गई। लंबे ललाई रंगत वाले सुदर्शन युवक को एकटक देखते हुए उसने सोचा जरूर ये कोई राजकुमार होगा। कुछ अनमनेपन से बोली यहाँ शिकार खेलने आए हो ना। युवक चुपचाप दोनों हथेलियों का छमोटा (ओक) बना के पानी पीता रहा। कोई जबाब ना मिलने से प्योंली उदास हो के बोली तुम मानस जात हमेशा हम बनबासियों को खत्म करना जानते हो बचाना नहीं। युवक बहुत थका हुआ है ये समझ के प्योंली ने उसको बैठने की जगह दी। हाँ मै यहाँ शिकार के लिए ही आया हूँ पर रास्ता भटक गया। साथी कहीं दूर छूट गए, चारों तरफ प्रकृति के अनछुए अप्रतिम अपार सौंदर्य का रसपान करते हुए युवक सम्मोहित हो बोला यहाँ कितनी सुखदाई शांति है। ऐसा मैंने पहली बार देखा। तुम लोग कितने सौभाग्यशाली हो। प्रकृति के इस निस्सीम विस्तार के बीच पंछियों के वृंदगान के सहचर रहते हो। तुम्हारे और इनके बीच कोमल तान का रिश्ता है। प्योंली अपने भीतर के अज्ञात लोक से बाहर आई, पर तुम तो राजमहल में रहते हो। वहाँ के जैसे सुख सुविधाएँ यहाँ कहाँ। एक आदिम राग में बँधे दोनों के बीच बहुत देर तक आवाजें तैरती रही।

साँझ की धूप पेड़ों की फुनगियों पर सिमटने लगी। युवक ने वो रात गदेरे के किनारे एक चौड़ी पठाल में बिताई। इधर बादलों की बाँहों में बँधा चाँद रात की पनीली आँखों में डबडबाता रहा। उधर गुफा के अंदर लाखों तारों का आलोक झरता रहा। सन्नाटे थपकियाँ देते रहे। सूरज के घोड़ों की छलाँग के साथ युवक ने प्योंली की हथेली में अपनी माया की आँच भर दी। दुनिया का सबसे सुरीला राग गाने के लिए भरे मन से अपने सगे संबंधी वन, पौन, पंछियों से बिछुड़ के प्योंली राजकुमार के साथ चल दी। नए लोग, नया रहन-सहन, अनभोगी सुख सुबिधाएँ और चाहतों की तितलियों की उड़ान ने प्योंली के मन के ओने-कोने को एपण से रंग दिया।

बस थोड़े दिनों के बाद ही पहले उसे अपने मोनाल याद आए फिर हौले-हौले सारे जंगल की कायनात ने प्योंली के आस-पास उदासी का घेरा डाल दिया। प्रियतम की लाख कोशिश के बाद भी प्योंली के पूरे बदन से गुलाबी बुराँश का रंग उतर गया। कच्ची हल्दी के पीलेपन से महक खतम हो गई। वो दिन पर दिन, पल-पल झूरती (कमजोर) रही। प्रिय हर उपाय, हर इलाज करके हार गया। दिन रात उसके सिरहाने बिताता रहा, पर प्योंली की आँच छीरती रही। सुख के झरने सूख गए। और एक दिन असीम अँधेरों की गहराई में तैरते हुए अपने प्रिय का हाथ अपनी बर्फ से सर्द हथेलियों में दबा के बोली कि ये राजमहल मेरे लिए नहीं थे। मुझे माफ कर देना। तुम्हारी माया की कदर नहीं कर पाई। मैं जंगली फूल हूँ वहीं पनप सकती थी। मैं तो पेड़ दर पेड़ बहती हुई आवाज थी। राजमहलों की दीवारों की कैद की घुटन में कैसे पनपती। यहाँ की खाद मिट्टी मेरे लिए नहीं है। मेरे मर जाने के बाद इस मिट्टी को उसी चोटी में दबा देना। आज के बाद किसी पशु-पक्षी का शिकार मत करना। वो सब मेरे संगी साथी हैं। राजकुमार बौरा गया।

उसने प्योंली को उसी चोटी में दफना दिया जहाँ वो उसे मिली थी। बसंत ऋतु आते ही वहाँ पर पीले रंग का फूल खिल गया। पूरे जंगल के पेड़ पौधो ने, पौन पंछियों ने झूम-झूम कर मोनाल के सुर में सुर मिला के गीत गाए और उस पीले फूल का नाम प्योंली रख दिया। तब से पहाड़ी खेतों की मेंड़ों पर, जंगल के कोने कोने पीली प्योंली के गुच्छों से लहलहाते बसंत के आने की, और जंगल में प्योंली की चहलकदमी की गवाही देते है। आज भी पहाड़ की जो बेटियाँ मायके नहीं जा पातीं, मुंडेर पर खिली प्योंली के गले लग अपनी खुद (याद) बिसरती हैं।


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