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रचनावली

अज्ञेय रचनावली
खंड : 3
संपूर्ण कहानियाँ

अज्ञेय
संपादन - कृष्णदत्त पालीवाल


जब मैं तुम्हारी कोठरी के आगे से जाया करूँ, तब तुम मेरी ओर ऐसी दृष्टि से मत देखा करो। मैं तुम्हारे पास नहीं आता, तुमसे बोलती नहीं, हो सकता तो तुम्हारी ओर देखता भी नहीं। पर जब सब बन्द हो चुके होते हैं, तब मेरी कोठरी खोली जाती है और मुझे घूमने को कहा जाता है, तब मुझे एकाएक अपने जीवन की निरर्थकता दीख पड़ने लगती है। मैं डरता नहीं, घबराता नहीं, कुछ भी नहीं, केवल अशान्त हो जाता हूँ, अनिश्चिय से भर जाता हूँ... इसीलिए, जाते-जाते, एक बार तुम्हारी कोठरी के आगे आकर, बिना रुके ही एक बार तुम्हारी ओर देख लेता हूँ।...

तुम मेरी ओर ऐसी दृष्टि से मत देखा करो। मैं नहीं चाहता कि तुम्हें यह ज्ञान भी हो कि मैंने तुम्हारी ओर देखा। मैं तुमसे आँख नहीं मिलाना चाहता। इसलिए नहीं कि मैं तुमसे झिझकता हूँ - केवल इसलिए कि मैं समझ नहीं सकता कि तुम मुझसे कैसे आँख मिला सकोगे। मेरी ओर देखकर, मेरी उन्हीं आँखों में जिन्होंने आठ साल तक अखंड आग्रह ओर स्नेह से तुम्हारा, मेरी उन्हीं आँखों में अपनी आँखें गड़ाकर, तुम कैसे मेरा सामना कर सकोगे? तुम्हारा हृदय कैसा उद्वेलित हो उठेगा?

झूठ! जब तुम मुझसे धोखा कर ही गये, तब भी मैं तुमसे क्यों आशा करता हूँ कि तुम लज्जित हो सकोगे? लज्जा तो तब आती जब मुझे अब भी उसी दृष्टि से देखते! पर अगर ऐसा होता, तो तुम क्या मुझसे धोखा कर सकते!

तुमने सचमुच धोखा किया है। तुम्हें मैंने किस काम के लिए रुपये दिये थे, तुमने कहाँ खर्च कर दिये? मेरे वे अभागे साथी वहाँ प्रतीक्षा में बैठे रहे, और रुपया उन्हें नहीं पहुँचा, और वे प्रतीक्षा करते-करते पकड़े भी गये, उन्हें दण्ड भी मिल गया... और तुम भी रुपया लेकर नहीं पहुँचे... न मेरे पास लौटकर ही आए...

बताओ, अगर थोड़े-से रुपये के लिए ही तुम्हारा मन विचलित हो सकता था, तो तुम इन आठ वर्षों तक क्यों न पथ-भ्रष्ट हुए? क्यों तुम तब तक विश्वास बढ़ाते गये, मेरे हृदय में स्थान करते गये, क्यों तुमने मुझ पर ऐसा अधिकार जमाया कि मेरा हृदय उसी प्रकार सम्पूर्णतः तुम्हारा हो गया जिस प्रकार मेरा मस्तिष्क सम्पूर्णतः देश का था? अगर तुम्हें जाना ही था, और इस प्रकार जाना था, तो तुम क्यों मेरे इतनी पास आये थे?

यह कैसी कमज़ोरी है कि इतना कुछ होते हुए भी मैं तुम्हें ही सम्बोधन करके लिखे जा रहा हूँ। जिस समय मुझे तुम्हारे धोखे का पूरा विश्वास हो गया, उसी समय मुझे चाहिए था कि तुम्हें हृदय से निकालकर फेंक दूँ, तुम्हें ऐसा भूल जाऊँ कि कहीं तुम्हारा चिह्न तक न रह जाए! और यहाँ मैं तुम्हीं का सम्बोधन करके लिखे जा रहा हूँ - रो रहा हूँ...

मुझे, न जाने क्यों, अभी तक विश्वास नहीं होता कि तुम मुझसे विश्वासघत कर सकते हो। शायद इतने वर्षों से तुम्हारा विश्वास करते-करते इसी का अभ्यास हो गया-अब मैं उसे तोड़ नहीं पाता!

तुम, तुम वहाँ कोठरी में बैठे-बैठे क्या सोचा करते हो? ये सब प्रलयंकर विचार तुम्हारे भी मन में उठते हैं, या नहीं? अगर तुमने सचमुच विश्वासघात किया है, तो नहीं उठते होंगे। विश्वासघाती हृदय में इनकी क्षमता ही नहीं हो सकती...

पर मुझे देखकर तुम्हारी आँखें क्यों जल उठती हैं, वह क्या है? उसे क्या समझूँ, अभिनय?

नहीं हो सकता...

तुमने हिम्मत कर ही डाली!

जब मैं तुम्हारी कोठरी के आगे से जा रहा था, तब - आज तुमने आँख उठा कर देखा नहीं, सिर झुकाये ही आवाज़ दी - भइया!

यह क्या है - तुमने बुलाया! विश्वासघाती होकर भी तुम ऐसा कर सकते हो? तुम्हारी वाणी में क्या था? उस समय मुझे आश्चर्य ने पागल कर दिया, नहीं तो मैं समझ पाता।

शायद तुम्हारी वह पुकार, उसकी ध्वनि का उतार-चढ़ाव, उसका कम्पन, वह एक ही शब्द मेरे जीवन की एक अखंड ज्योतिमय स्मृति हो जाता! ‘भइया’!

मैं उत्तर नहीं दे सका, कोठरी के दरवाज़े पर ही जाकर खड़ा हो गया। तुमने फिर कहा, ‘‘पास आओ।’’

मैं पास क्यों नहीं गया? क्या इस डर से कि कहीं तुम्हारी आँखों में विश्वास-घात न देख पाऊँ?

मैंने तुम्हारी ओर देखे बिना ही कहा, ‘‘कहो!’’

‘‘भइया, मुझसे नाराज हो?’’

यह प्रश्न! मैंने झूठ विस्मय के स्वर में कहा, ‘‘अच्छा?’’

आठ साल तक तुम्हें प्यार किया था, आज तुम्हें इस स्वर में कहा, बिच्छू के डंक के समान एक शब्द, ‘‘अच्छा!’’

तुम फिर बोले, ‘‘उसी रुपये वाली बात से। मैं सफ़ाई देना चाहता हूँ।’’

मैंने उपेक्षा के स्वर में कहा - ‘‘ईश्वर जानता है कि मेरे हृदय में उपेक्षा थी या क्या! आज नौ साल हो चुके, मैंने तुमसे कभी किसी बात की सफ़ाई माँगी है?’’

क्या एक ही चोट काफ़ी नहीं थी जो मैंने यह दूसरा प्रहार किया?

पर इससे तुम स्थिर हो गये। बोले, भइया, मेरी बात सुने बिना ही तुमने निर्णय कर लिया? अगर मैं दोषी भी हूँ, तो तुम क्या इतना अन्याय करोगे?’’

‘‘अन्याय!’ ग़ैरों से न्याय-अन्याय हो सकता है। तुम्हारे और मेरे बीच में भी न्याय के फैसले खड़े हो सकते हैं?

मैंने फिर एक शब्द कहा-शब्द नहीं एक ध्वनिमात्र - ‘‘हूँ!’’

फिर वह कहानी की तरह कहने लगा-शायद वह समझ गया कि मैं बिना इच्छा जताए भी उसकी बात सुन लूँगा... कहने लगा :

‘‘तुमने मुझ रुपये दिये थे, मैं लेकर चला। तुम्हें मैंने बताया नहीं, जहाँ तुमने जाने को कहा था, वहाँ जाते हुए राह में मेरा घर भी पड़ता था जहाँ मेरी माँ और बहिन भी रहती थीं। मैं उनसे मिलने गया था। सोचा था कि मिल लूँगा, उन्हें थोड़ी-सी सान्त्वना दे आऊँगा, और फिर अपने काम में लग जाऊँगा। लेकिन -’’

तुम इतनी देर रुक रहे थे - इसी आशा से न कि मैं आग्रह से पूछूँ - ‘‘लेकिन क्या?’’ मैंने नहीं पूछा, दृढ़ होकर चुपचाप खड़ा रहा... तुमने न्याय माँगा था, मैं न्याय ही दूँगा, कठोर न्याय... यह प्यार का स्थान नहीं है...

तुम फिर कहने लगे - ‘‘लेकिन मैंने जो सोचा था, वह नहीं हो पाया... मैं खोजते-खोजते पहुँचा तो मेरी माँ अपने घर में नहीं, उसी घर के नये मालिक की अनुकम्पा से मिले हुए एक अस्तबल के कोने में पड़ी कराह रही थी - और बहिन शशिकला उसके पास खड़ी रो रही थी...

‘‘माँ को कई सालों से दमे की बीमारी थी - जब मैं घर से निकला था तभी बहुत थी, बाद में तो उसका ऐसा हाल हो गया कि कभी जब दौरा आता तो साँस भी नहीं ले सकती... तब शशि उसके पास बैठ कर खूब रोती, खूब रोती...

‘‘घर में एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी। मुझे अभी तक पता नहीं लगा कि वे गुजारा कैसे करती थीं... शशि दो-दो तीन-तीन दिन भूखी रह जाती, और चार पैसे जोड़ कर तम्बाकू ले आती। अब माँ को बहुत कष्ट होता, तो उसके पास तम्बाकू धरवा कर धुआँ दिया करती... बिचारी के पास यही एक इलाज करने की सामर्थ्य थी...

‘‘मैं पहुँचा तो माँ को न्युमोनिया भी हो गया था। दमे के कारण श्वास नहीं आती थी, उस पर न्युमोनिया हो गया था, और बेचारी शशि ने कमरे में तम्बाकू का धुआँ कर दिया था। मैं कहने को हुआ, ‘‘माँ, शशि, मैं आ गया हूँ।’ पर ‘माँ’ भी पूरा कहते नहीं बना!

‘‘जब मैंने माँ के माथे पर धीरे से हाथ रखा, तब उसने आँखें खोली। आँखें खुलीं, तब शायद उनमें भर्त्सना थी। किन्तु खुलते-खुलते ही उठ गयी। माँ एक फीकी हँसी हँसी-नहीं वह हँसी भी नहीं थी, केवल ओठों की खिंची हुई रेखा कुछ ढीली हो गयी थी-फिर उसने आँखें बन्द कर लीं और टूटे स्वर में बोली, मैं जियूँगी!’

‘‘शशि से मैंने बात भी नहीं की। कहा कि तम्बाकू बाहर फेंक दो, खिड़कियाँ खोल दो, और माँ को अपना कोट उढ़ाकर उलटे-पाँव बाहर निकल गया।

‘‘डॉक्टर ने आकर देखा, तो कुछ बोला नहीं। मुझसे कहा, ‘‘बाहर चलो, दवाई ले आना।’’ बाहर आकर उसने बताया कि कोई आशा नहीं है। मैंने कहा, ‘‘उसका हौसला तो बहुत है, जीना चाहती है’, वह बोला, ‘यह अच्छी बात है, पर फिर भी’’

‘‘मैं दवाई लाया, साँस के लिए ऑक्सीजन लाया, बिछाने-ओढ़ने के लिए कपड़े लाया, माँ के भी और शशि के भी... और तुम्हारे दिये हुए रुपये खर्च होते गये...’’

मैंने फिर तुम्हें रोक कर कहा, ‘‘क्या यही किस्सा कहना था?’’ तब तुमने उत्तर भी नहीं दिया, अधिकार-भरी मुद्रा से हाथ उठाकर मुझे रोक दिया और कहते गये। आठ साल के अभ्यास से तुम मुझे बुली करना खूब सीख गये हो! तुम फिर कहने लगे :

‘‘चार दिन तक मैं सोया नहीं, बराबर माँ के सिरहाने बैठा रहा। बेचारी शशि... मुझसे बातें करना चाहती पर चुप हो जाती कि माँ के विश्राम में विघ्न न हो... चुपचाप मेरी ओर देखा करती - मैं कहता, दवा लाओ, पानी लाओ, आग जलाकर पानी गर्म कर दो, पैर ढक दो, तो चुपचाप वैसा करके फिर पैताने आकर बैठ जाती और मेरे मुँह की ओर देखा करती, बोलती भी नहीं... एक दिन मैंने उसकी दृष्टि से आहत होकर कहा, ‘शशि, क्या देखती हो? मेरी ओर ऐसे मत देखा करो, नहीं तो मैं चला जाऊँगा।’ तब उसने दूसरी ओर देखना प्रारम्भ किया, बोली कुछ नहीं। मैंने फिर कहा, ‘शशि, ऐसे पागल हो जाओगी, जाकर सो रहो। मैं माँ के पास बैठा हूँ।’ तब वह बोली, ‘और तुम नहीं सोओगे?’ मैंने फिर मना कर, धमका कर और यह वचन दे कर कि दूसरे दिन मैं सोता रहूँगा और वह जगेगी, उससे स्वीकार कर लिया। वह उसी कमरे में ज़मीन पर बिस्तर बिछा कर यह कहकर लेट गयी कि ज़रूरत हो तो उसे जगा लूँ, नहीं तो अच्छा नहीं होगा... थोड़ी देर में माँ सो गयी। उसकी रुकती साँस की गति से मुझे एकाएक ध्यान हुआ कि शशि सो रही है। मैं कान लगा कर उसका नियमित श्वासोच्छ्वास सुनने को हुआ। पर उसकी साँस सुन ही नहीं पड़ रही थी। न जाने मुझे क्या ध्यान हुआ, मैं उठ कर उसके पास गया। वह सोई नहीं थी, छत की ओर दृष्टि जमाये, बड़ी-बड़ी आँखें किये रो रही थी, चुपचाप-चुपचाप... मैंने पूछा, शशि यह क्या है? तब उसने आँखें बन्द कर लीं। मैंने फिर पूछा तो बोली, माँ अच्छी जाएगी तो तुम चले जाओगे’ - मैंने कहा, ‘शशि, इस वक्त नहीं - मुझे अभी मत कोसो...’ फिर हम दोनों चुप हो गये और वह मेरे घुटने पर हाथ रख सो गयी...

‘‘दूसरे दिन माँ की तबीयत कुछ अच्छी थी, शशि भी खुश जान पड़ती थी... सवेरे ही शशि ने मुझसे कहा,‘‘ आज तुम सोओ। कल सवेरे उठना।’ मैंने बहाना करने को कहा, ‘आज बदली है, अच्छा लगता है। ठहर कर सोऊँगा’, पर वह नहीं मानी। मैं जाकर लेट गया। समझा था कि नींद नहीं आएगी, पर थोड़ी ही देर में बादलों की गड़गड़ाहट सुनते-सुनते सो गया।

‘‘जब नींद टूटी तब शाम के पाँच बजे थे। मैंने शशि को छेड़ने की इच्छा से पूछा, ‘शशि, सवेरा हो गया न, अब उठूँ?’ कोई उत्तर नहीं मिला। मैंने उठकर देखा, शशि कमरे में नहीं थी। माँ के पास गया तो देखा, सो रही है। मैंने झुककर फिर देखा-

‘‘माँ वहाँ नहीं थीं। उनका शरीर नीला पड़ गया था, साँस बन्द थी... जब माँ बीमार थीं तब मैं जाने कहाँ घूमता रहा, और जब मैं सो रहा था तब माँ मुझे छोड़कर चली गयीं-

‘‘मुझे याद आया कि शशि वहाँ नहीं है। मैंने पुकारा, ‘शशि,! ‘शशि!’ उत्तर नहीं मिला। मैं उसे ढूँढ़ने बाहर निकला-बाहर बड़े जोरों से वर्षा हो रही थी... मैंने देखा, छोटे-से आँगन में शशि पड़ी भीग रही है ओर उसके माथे से ख़ून बहकर पानी को रंग रहा है। मैं उसे उठाकर अन्दर लाया, वह बेहोश थी। मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया, कमरे में आग जलाई और उसके हाथ-पैर मलने लगा कि होश आ जाए...

‘‘रात तक होश नहीं हुआ। मैं चाहता था डॉक्टर को बुलाऊँ, पर शशि को छोड़कर कैसे जाता? रात को दस बजे शशि हिली, और कुछ देर में आँखें खोल कर शून्य दृष्टि से मेरी ओर देखने लगी। बोली, ‘माँ’ - और चुप। ...मैंने अब सिर पर गीली पट्टी बाँधी और डॉक्टर बुलाने चला।

‘‘डॉक्टर ने दवाइयाँ दीं। शायद माँ के बारे में पूछना चाहता था, पर वहाँ उसे पड़ी देखकर समझ गया, और बोला, ‘‘मुझे बहुत खेद है - ‘मैंने कुछ कहे बिना उसे दरवाज़ा दिखा दिया। वह चला गया।

‘‘मैंने शशि को दवा पिलायी। अब उसे होश आ गया, तब मैंने पूछा, ‘शशि, माँ क्या -’ आगे नहीं कह सका। शशि बोली, बहुत धीरे से, ‘सुनो!’ मैं और पास झुक गया। ‘माँ ने पूछा था, देव कहाँ है? मैंने कहा, ‘सो रहा है, जगा दूँ? बोली, नहीं, ऐसे ही ठीक है। फिर धीरे-धीरे मुस्कराने लगी। मुस्कराते-मुस्कराते ही - बस!’ मैंने कुछ देर बाद पूछा, ‘फिर? तुम बाहर कैसे गयीं?’ वह बोली, ‘मुझसे कमरे में नहीं रहा गया। तुम्हें जगा भी नहीं सकी - तुम इतनी देर सोये नहीं थे -बाहर ही निकल गयी... फिर पता नहीं क्या हुआ...’

‘‘रात में शशि को बड़े जोर से बुखार चढ़ आया। अभी पौ भी नहीं फटी थी कि वह अनाप-शनाप बकने लगी। मैंने बहुत शान्त करने की कोशिश की, पर वह यह नहीं समझती थी कि मैं उसके पास हूँ, या मैं कौन हूँ। बहुत देर तक तो मैं उसे होश लाने की चिन्ता में था। अब निराश होकर मैं उसका प्रलाप सुनने लगा...

‘‘वह क्या कह रही थी? अगर वह प्रलाप था तो... पर प्रलाप में भी कोई इतनी तीखा उलाहना दे सकता है? वह कह रही थी, ‘अब माँ अच्छी हो गयी। अब तुम चले जाओ। अब मैं भी अच्छी हूँ। चले जाइए। देखो, तुम्हारा काम बिगड़ गया-’

‘‘मैं बहुत नहीं सुन सका। मैंने जोर से पुकारा, ‘शशि’! उसका प्रलाप बन्द हो गया। मैं समझा कि उसे होश होने को है। मैंने फिर जोर से पुकारा, ‘शशिकला!’ पर वह फिर पहले की भाँति प्रलाप करने लग गयी।

‘‘मुझसे सहा नहीं गया। मैं अब तक देखता आया था, सहता आया था। माँ की मृत्यु से भी मेरी आँखों में आँसू नहीं आये थे, केवल मैं और भी अधिक यन्त्रवत् होकर काम करने लगा था... इस छोटी-सी बात ने बन्ध तोड़ दिये। मैं भूमि पर बैठकर, शशि की चारपायी की बाँही पर सिर रख, फूट-फूट कर रोने लगा...

‘‘शशि जाग पड़ी। जो काम इतने मनाने पर भी नहीं हुआ था, वह निस्सहायता की एक चीख ने कर दिया।

‘‘वह बड़े शान्त स्वर में बोली, ‘इधर आओ।’ मैं पास गया तो बोली, ‘मेरे पास लेट जाओ!’ मैं लेट गया। फिर बोली, ‘‘एक बात सुनोगे? नाराज न होना।’ मैंने कहा ‘कहो’।’ फिर मुझे आँख बन्द कर लेने को कह कर उसने मेरे कान में धीरे से कहा, ‘तुम चले जाओ।’ मैंने विस्मित होकर पूछा, ‘कहाँ शशि?’ उसने और भी धीरे से कहा, ‘तुम्हारे काम में विघ्न होता होगा-‘मैं जानती हूँ?’ मैं चौंक कर चारपायी पर उठ बैठा। मुझे मालूम हुआ कि क्षणभर में सब कुछ उबल गया है-कि कुछ रहा ही नहीं है! मैं शून्य दृष्टि से खिड़की की ओर देखता, जड़वत् बैठा रहा। शशि थोड़ी दूर चुप रह कर कोमल स्वर में बोली, ‘नाराज हो गये न!’ मैं उत्तर भी नहीं दे सका। मैंने केवल उसके माथे पर हाथ रख दिया-यह जताने को कि नाराज नहीं हूँ। उसने मेरा हाथ अपने दोनों तप्त हाथों से बड़े ज़ोर से पकड़ लिया...

‘‘वह फिर बोली, ‘तुम समझते हो, मैं बिलकुल भोली हूँ। मैं सब जानती हूँ। जब माँ थी, तब मैंने कुछ नहीं कहा-अब कहती हूँ कि तुम अपना काम-कि अगर तुम्हारे काम में अड़चन पड़ती हो तो जाओ। अभी चले जाओ। बोलो, जाते हो न?’ मैंने बहुत हिम्मत करके कहा, ‘और तुम?’ वह धीरे से मुस्करायी। बोली, ‘मैं अच्छी हूँ। और कहो तो जल्दी से और भी अच्छी होकर बताऊँ?’

‘‘मैंने अविश्वास-भरी दृष्टि से उसकी ओर देखा। वह बोली, ‘देखो, अब मैं शान्त हूँ। अब बोलो मत...’

‘‘हम दोनों चुप बैठे रहे। वह स्थिर दृष्टि किये न जाने क्या देखती या सोचती रही। मैंने अनुभव किया, उसका बुखार कुछ कम हो रहा है-सवेरा हो गया था। उसने कहा, ‘अब मैं अच्छी हूँ, तुम जाकर डॉक्टर को बुला लाओगे न?’ मैंने प्रसन्न होकर कहा, ‘अच्छा।’ वह फिर बोली, ‘एक और बात मानो।’ मैंने पूछा, ‘क्या?’ तो बोली, ‘अगर तुम्हें कहीं काम हो तो चले जाओ। शाम तक लौट आना।’ फिर मेरे मुख की ओर देखते हुए बोली, ‘तब तक मैं बिलकुल अच्छी हो जाऊँगी। बोलो, जाते हो न?’

‘‘मैं शशि-सा बुद्धिमान नहीं था, क्योंकि मैंने उसे भोली समझा था! उसने कैसा धोखा दिया-तुम्हारे दिये रुपयों में से जो बचे थे, वे लेकर मैं देने चला। डॉक्टर से कहता गया कि शशि को दवाई दे दें। सोचा था कि शाम तक लौट आऊँगा। और यह भी सोचता जाता था कि माँ का दाह-कर्म करना है... जिसका मुझे अब तक ध्यान नहीं आया था... पर जब वहाँ पहुँचा तब क्या हुआ, तुम जानते ही हो... लोग गिरफ़्तार हो चुके थे, मैं भी बच ही गया - घर के चारों ओर पहरा पड़ा हुआ था...

‘‘शशि ने कहा था, शाम तक लौट आऊँ। मैं शाम को नहीं लौटा-या कम से कम शशि के पास नहीं लौटा। जब सन्ध्या को छः बजे घर आया, तो देखा, शशि चुपचाप पड़ी है, उसके खुले नेत्र छत की ओर देख रहे हैं, मुख पर एकाग्र पीड़ा का भाव है... मैं उसकी निश्चलता देख कर डर गया... माँ की निश्चलता मुझे याद आ गयी... मैं लपक कर पास गया तो शशि भी चली जा चुकी थी। उसके सिरहाने एक बोतल उल्टी पड़ी थी, उस पर लेबिल लगा था, ‘विष’। मैंने उठाकर देखा, छाती में मलने का तेल था-यानी तेल की खाली बोतल थी-तेल कुछ लुढ़क गया था और कुछ... काम आ चुका था... शशि के सिरहाने पर एक काग़ज़ के टुकड़े पर लिखा रखा था, ‘तुम अभी चले जाओ। मेरे कारण तुम्हारे काम में विघ्न नहीं होगा। मैं दुखी नहीं हूँ, सच्चे दिल से कहती हूँ। भगवान तुम्हें सफल करें।’ बस!

‘‘मैं परचा हाथ में लिये-लिये घर से बाहर निकला, और भागा! स्टेशन पर जा कर वहाँ से चल दिया, तुम्हारे पास आने को। फिर मैं कैसे पकड़ा गया, और क्या हुआ, यह सब तुम्हें पता है... बाद में शायद पुलिस ने ही माँ और शशि का दाह-कर्म किया है। मैं एक बार उनके जीवन से निकल आया और दूसरी बार उनकी मृत्यु से, पर डर से नहीं...

‘‘हाँ, जो रुपया बचा था वह अब भी है। मैंने जमा कर दिया था, अब भी तुम मँगवा सकते हो।’’

तुम चुप हो गये। सारी कहानी कहकर यह भी नहीं पूछा कि ‘सुन ली?’

मैं भी नहीं बोल पाया। थोड़ी देर में मैं घूमकर लौटने को हुआ, तब तुमने कहा, ‘‘भइया, मैं दोषी हूँ, मुझे क्षमा कर दो!’’ और सिर झुकाये बैठे रहे। मैं जब कोठरी के जँगले के पास आया, तब भी वैसे ही बैठे रहे। मैंने कठोर स्वयं में कहा, ‘‘उठो!’’ तो चुपचाप खड़े हो गये। मैंने कहा, ‘‘पास आओ,’’ तो आगे आ गये। ‘‘और पास, बिलकुल!’’ तो जँगले से माथा टेक लिया। मैंने हाथ से झटक कर ठोड़ी ऊपर उठा दी, तब तुम आँखें नीची ही किये रहे। तब मैंने कठोरता का अभिनय छोड़ दिया। धीरे से आगे बढ़कर, आँखें बन्द कर करके, तुम्हारा मुँह चूम लिया...

पागल! पागल! तुम्हारा कोई ऐसा भी अपराध है जिसे मैं क्षमा न कर सकूँ - विश्वासघात के सिवाय - जिसे मैं क्षमा न कर सकूँ-

(दिल्ली जेल, फरवरी 1933)


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