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रचनावली

अज्ञेय रचनावली
खंड : 3
संपूर्ण कहानियाँ

अज्ञेय
संपादन - कृष्णदत्त पालीवाल

अनुक्रम सूक्ति और भाष्य पीछे     आगे

सूक्ति

सरसों के खेत के किनारे पर बनी हुई ऊँची मुँडेर पर वह बैठी थी, और उससे कुछ एक ओर हटकर दो मोरनियाँ भूमि की ओर ध्यान से झुककर, कुछ खोज़ रही थीं। कुछ और दूर से, एक मोर गर्दन झुकाये उसकी ओर दौड़ा आ रहा था।

बसन्त तब आ रहा था, आया नहीं था। उस दिन हल्के-हल्के, छितराये हुए बादल थे, धूप नहीं थी।

सांगानेर स्टेशन से कुछ ही इधर वह स्थान था, इसलिए गाड़ी की गति धीमी हो गयी थी। गाड़ी की खिड़की में से बाहर देखते हुए सत्य ने यह दृश्य देखा, निश्चय करने की क्रिया में ही घूमकर कैमरा उठाया और चलती गाड़ी में से उतर पड़ा।

सत्य के पीछे कुछ नहीं है, सत्य है पर्याप्त साधन, आगे है भविष्य और उसके अरमान। वह विदेशी पत्रों के लिए लेख लिखा करता है, उससे कुछ आमदनी हो जाती है। उस आमदनी पर वह देशाटन करता है, फ़ोटो खींचता है, और उन्हें लेखों के साथ भेजकर और कुछ पाता है।

इस समय वह राजपूतों के विगत गौरव पर लेख तैयार करने के लिए चित्तौड़ जा रहा था। लेकिन राह में एक चित्र की सम्भावना देखकर, अपने साहसिक स्वभाव के वश, वह उतर पड़ा। उतरकर वह सीधा उस लड़की के पास पहुँचा और कैमरा ठीक करने लगा।

लड़की वहाँ से उठी नहीं, बोली भी नहीं, लेकिन अपनी लाल ओढ़नी से उसने मुख ढक लिया और वह शरमायी-सी देखती रही।

सत्य ने कैमरा ठीक करके जब यह देखा, तो लड़की को फ़ोटो खिंचाने के लिए मनाने का कोशिश में पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

वह फिर भी नहीं बोली।

सत्य ने कहा, ‘‘हम तुम्हारी फ़ोटो खींचेंगे।’’

वह मुँह ढके-ही-ढके बोली, ‘‘नहीं खींचोगे।’’

सत्य ने हँसकर कहा, ‘‘मैं तो खींचने लगा हूँ,’’ और कैमरे की ओर झुका।

वह मुँडेर से खिसककर उसी की ओट हो रही।

सत्य एक झल्लायी-सी हँसी-हँसा और कैमरा उठाकर मुँडेर के पार हो लिया।

वह उठी और हाथ से मुँह को आधा ढके हुए कि कहीं अनजाने में उसकी फ़ोटो न ले ली जाय, सरसों के खेतों में से होती हुई भागी। सत्य एक हाथ से खुला हुआ कैमरा थामे, दूसरे से उसके केस को दबाते हुए, उसके पीछे दौड़ा।

सत्य बहुत तेज़ दौड़ सकता था, पर यहाँ वह स्थान से परिचित और ऐसे रास्ते से अभ्यस्त थी, सत्य अपरिचित और अनभ्यस्त। और फिर पास पहुँचकर कैमरा ठीक करने में भी तो देर लगती! सत्य दौड़ रहा था तो इसी आशा में कि देहाती लड़कियों से (देहाती क्यों, सभी लड़कियों में) पौरुष के प्रति सम्मान के साथ ही जो स्वाभाविक हास्य-प्रवृत्ति से उत्पन्न औचित्य का भाव होता है, उसके फलस्वरूप वह कहीं रुककर कहेगी, ‘‘अच्छा लो, खींचो!’’ वह विजय!

पर, इस लड़की के लिए पौरुष का स्टैंडर्ड शायद बहुत ऊँचा था, वह नहीं रुकी, नहीं रुकी। खेतों के पार एक टीला-सा था, उसके आगे मुड़ते ही, सत्य के देखते-देखते वह एक झोंपड़े में घुस गयी, भीतर के अन्धकार में उसकी आँखों से ओझल हो गयी।

सत्य रुक गया। पहले उसे खीझ आयी कि व्यर्थ ही वह ट्रेन से उतरा, फिर वह खिलखिलाकर हँस पड़ा और टीले के एक ओर भूमि पर बैठकर कैमरा बन्द करने लगा।

शायद हँसी सुनकर, वह मुँह ढँककर बाहर निकल आयी। सत्य ने उसे देखकर कहा, ‘‘इधर आओ, सुनो!’’

उसने एक बार कैमरे की ओर देखा-वह आधा बन्द था-और आगे चली आयी।

‘‘तुम फ़ोटो क्यों नहीं खिंचातीं?’’

चुप!

‘‘खिंचा लो तो वह अखबारों में छपेगी। देश-भर के लोग जान जाएँगे कि तुम यहाँ रहती हो।’’

लेकिन शहर के तर्क गाँव में नहीं चलते। वह फिर चुप।

‘‘डरती हो क्या, राजपूत होकर?’’

चुप!

सत्य सोचने लगा, यह औरत है या दीवार - सभी तरह दुर्भेद्य! कुछ खिन्न होकर बोला -‘‘फ़ोटो खींच लेने देतीं, वह छप जाती, तो मुझे बीस रुपये मिलते।’’

एकाएक उसने कहा - जिस स्वर में कहा, वह सुना ही जा सकता है, बताया नहीं - ‘‘बीस रुपये!’’

किस तरह खिंचकर, झकझोरा जाकर, सत्य ने उसकी ओर देखा - उसके मुख की ओर।

ओढ़नी का छोर उसके हाथ से छूट गया था-मुँह उघड़ा हुआ था, और ठोड़ी के पास हाथ जड़-सा रह गया था, उँगलियाँ ऐसे खुली थीं, मानो उनमें धारणा-शक्ति नष्ट हो गयी है, फ़ालिज मार गया है।

ओठ खुले थे - ‘‘बीस रुपये!’’

सत्य से उसकी आँखें मिलीं। सत्य चौंक-सा गया। उसे लगा, उसका मुख जो कह रहा है, और उसकी आँखें जो कह रही हैं, उनमें कुछ विपर्यय है, वे परस्पर विरोधी हैं। पर नहीं, वह विरोध नहीं है! मुख पर जो जड़ित विस्मय का भाव है, शब्दों से जो विस्मय, विवश अनुमति, झुकाव प्रकट होता है, आँखें उसका खंडन नहीं कर रहीं, उसे स्पष्ट कर रही हैं, उसकी व्याख्या कर रही हैं। शब्द मानो एक गूढ़ सूक्ति हैं, आँखें उनका विशेष भाष्य।

पर, अजब बात है, सूक्ति तो समझ में आ गयी, भाष्य क्या कह रहा है, नहीं समझ में आता, नहीं आता...

उलझन में सत्य की उँगलियाँ कैमरे के किसी बटन से खेलने लगीं। सत्य की आँखें भी उधर गयीं।

उसने कहा, ‘खींचो!’’

सत्य ने फिर उसकी ओर देखा। तब वहाँ कुछ नहीं था, न मुख पर विस्मय, न आँखों में वह-वह क्या? जो उसे समझ नहीं आया था। उसके सामने खड़ी थी एक लड़की साधारण, गम्भीर, स्थिर, अपलक। उसके मुख पर निर्लज्जता नहीं थी, थी वह लज्जा की स्तिमित अनुपस्थिति-सी, जो परदा करनेवाली स्त्रियों के मुख पर बलात् परदा हटा देने से दीखती है। उघड़े मुखवाली स्त्रियों को लज्जा की ज़रूरत रहती है, परदेवाली स्त्रियाँ मानो डिफ़ेंस का सारा भार उस स्थूल निर्जीव परदे पर ही छोड़े रहती हैं, और यह सीखते उन्हें देर लगती है कि लज्जा देखने की चीज़ है।

यही सब दर्शन बघारता हुआ, सत्य मुस्कराता हुआ उठा। फ़ोटो खींचते समय उसे लगा कि जिस विशेष बात के लिए वह फ़ोटो लेना चाहता था, वह अब इसमें नहीं आ सकती, फिर भी अब तो खींचना ही था।

फ़ोटो खिंचाते ही, इससे पूर्व कि सत्य कुछ कह भी पाये, वह पलटकर झोंपड़ी के भीतर घुस गयी। क्षण ही भर बाद, एक बड़ी बूढ़ी-सी औरत ने झोंपड़ी के दरवाज़े पर आकर, अपनी क्षीण आँखों से सत्य की ओर सन्दिग्ध दृष्टि से देखा, फिर झोंपड़ी का द्वार बन्द कर लिया।

सत्य ने जाना कि कहानी आधे में ही समाप्त हो गयी और आगे नहीं चल सकती। वह थोड़ा-सा मुस्कराया और स्टेशन की ओर चल पड़ा।

कहानी आगे तो चल ही नहीं सकती, इसलिए वह जल्दी-जल्दी उसे भुलाने लगा। उसकी घुमक्कड़, भावुक, सौन्दर्य-पूजक प्रकृति में वह चीज़-गुण या दोष-थी, जो राह-चलते प्यार कर सकती है और स्वाभाविक फल - राह-चलते भूल सकती है।

‘‘बाबू साहब, हमारी तस्वीर उतारो!’’

सत्य ने चौंककर देखा, एक हट्टा-कट्टा पठान, अपनी काली दाढ़ी की नोक का एक बाल दो उँगलियों से पकड़े, उसकी ओर देखता चला आ रहा है। उसकी गिद्ध की-सी तीखी और शायद उतनी ही क्रूर आँखों में एक उपहास भरी-सी हँसी है, जो आँखों तक ही सीमित है। उसके झुर्रियों पड़े मुख पर नहीं आयी।

सत्य ने उसे जल्दी से सिर से पैर तक देख डाला। तुर्रेदार पगड़ी, तेल-सने पट्टे, दो-एक हजार बटनों से सजी हुई काली मखमल की वास्केट, लम्बा कुरता, मैली, पर खूब खुली-खुली फूली हुई सलवार जिससे पैर के चप्पल छिप जाएँ, हाथ में लाठी-यानी सिर से पैर तक पठान-वैसा पठान जैसा विदेशी पत्रों में दिखाया जाता है, जो प्रमाणित करता है कि भारत के सीमा प्रान्त की रक्षा के लिए ब्रिटिश राज्य आवश्यक है, जिसके लिए विदेशी पत्र पैसे देते हैं।

सत्य ने कहा, ‘‘हाँ, तस्वीर उतारूँगा!’’ और उसके अतिरिक्त सबकुछ भूल गया।

भाष्य

वह चित्तौड़ से लौट रहा था।

बहुत-से चित्र उसने एकत्र कर लिए थे और सोच रहा था कि बहुत दिनों के लिए वे पर्याप्त होंगे। और चित्रों के साथ ही वह मानो उस वीरभूमि, सूखी, नंगी, प्यासी और कठोर भूमि की एक छाया-सी लिए जा रहा था, जो उसे लिखने में सहायक होगी, जिसके आसरे वह उस विगत गौरव को जगा सकेगा, विदेशी पाठकों पर प्रकट कर सकेगा, उन्हें वह रोमांचकारी अनुभूति दे सकेगा जिसकी वे हमसे अपेक्षा रखते हैं, जिसके लिए वे हमारे देश को मात्र ‘‘ईस्ट’ न कहकर ‘ओरिएंट’ कहते हैं...

और वह लड़की? उसे वह भूल गया था। उसका स्थान इस विराट में नहीं था - राह-चलते वह कहाँ-कहाँ ठहर सकता है?

लेकिन जब गाड़ी सांगानेर से चली, तब एकाएक उसे जान पड़ा, वह वहाँ रुके बिना रह ही नहीं सकता, रह ही नहीं सकता। वह फिर उतर पड़ा और स्टेशन से बाहर उस मुंडेर की ओर चल पड़ा।

राह में झोंपड़ा पड़ता था, लेकिन वह जान-बूझकर, झोंपड़े से बचता हुआ मुँडेर की ओर चला। उसे पूरी आशा थी कि जो कुछ देखने वह जा रहा है, वह मुँडेर पर ही दीख सकता है। उस-जैसी प्रकृति वालों में कोई अहम्मन्यता होती है, वह उसमें भी थी। वह स्वप्न को छोड़कर जा सकता है, पर स्वप्न भी उसे छोड़कर जाने की धृष्टता कर सकता है, यह वह नहीं जानता था।

तभी, जब मुँडेर पर उसने कुछ नहीं पाया, तब उसे धक्का-सा लगा; उसे लगा, विशेष उसी को लक्ष्य करके यह इंसल्ट फेंका गया है। वह कुछ क्रुद्ध-सा झोंपड़े की ओर चला।

झोंपड़े पर पहुँचकर उसने देखा, वह भी खाली था।

तब वह एकाएक भूमि पर बैठ गया। उसे लगा, उसका कुछ बहुत अपना, शरीर के एक अवयव की तरह प्रिय और आवश्यक खो गया है।

थोड़ी देर बाद वह उठा, उठकर झोंपड़े के दो चक्कर लगा आया और वहीं आकर बैठ गया। झोंपड़ा फिर भी उतना ही खाली रहा।

अभी आध घंटा पहले उसके लिए यह झोपड़ा न कुछ के बराबर था, अभी आध घंटा बाद फिर न कुछ रह जाएगा, पर इस क्षण वह अपनी सारी शक्ति से उस झोंपड़े से कुछ माँग रहा है, वह क्यों नहीं है, वहाँ पर? यह असह्य था उसके लिए, इतनी बड़ी चोट, इतना रूखा तिरस्कार, कभी उसकी अहंता को नहीं मिला था...

तभी वह पूछ-ताछ करने के लिए गया। कुछ दूर एक और झोंपड़ा था जहाँ उसने पड़ताल आरम्भ की। और वहीं वह समाप्त हो गयी। जो कुछ वह जान पाया, वह यों है :

उस झोंपड़े में एक बहुत बूढ़े माता-पिता और उनकी एकमात्र कन्या (नाम जसुमति) रहते थे। पास का एक खेत भी उनका था, जिसमें वे सरसों बोते थे। मानी बात है कि वैसे रूखे, नंगे देश में इससे जीविका चलना असम्भव है, पर यह भी प्रकट है कि वहाँ और कुछ काम भी नहीं था, शहर होता तो मजूरी हो सकती थी, वहाँ कहाँ? तो (आप कहेंगे, वही पुरानी बात!) उन्होंने एक पठान से दस रुपये क़र्ज़ लिये थे; और उसे ही कभी उतार देने की आशा पर जी रहे थे। दो आने रुपया महीना के हिसाब से, वह अब तक पाँच बार दिया जाकर भी अब पंचगुना था-मूल चुका देने की आशा कभी उन्होंने की भी होती, पर सूद कौन चुका सकता? और वे कभी सोचा करते थे, दस रुपये लेकर किसी के नाम जो काल्पनिक तोड़ा जमा किया जा सकता है, वही दस रुपये देकर वे पा सकते, तो शायद चोरी करके ही दस रुपये ले आते, या अपने को ही बेच लेते! ख़ैर, हुआ वही जो होना था - एक दिन पठान ने आकर उनका खेत, झोंपड़ा वग़ैरह सब कुर्क करा लिया, उन्हें निकलवा दिया।

...वे कहाँ गये? पता नहीं। किसी शहर की ओर गये होंगे मजूरी कमाने। या...

चलते-चलते उसे यह भी मालूम हुआ कि पठान ने बड़ी उदारता से यह भी प्रस्ताव किया था कि यदि जसुमति के पिता उससे जसुमति का विवाह करना मंजूर कर लें, तो वह उन्हें और झोंपड़ा वगैरह सब रहने देगा, और क़र्ज भी बाकी सब मान जाएगा, तो वह झोंपड़ा माफ़ कर देगा - वे मान जायें सही। लेकिन...

लेकिन कुछ नहीं, उस सूखी नंगी, प्यासी और कठोर भूमि का अदम्य अभिमान... बूढ़े माता-पिता का क्षीण शरीर क्रोध से काँप गया था...

पर इस सबसे क्या? वहाँ था अब कुछ नहीं-

सत्य फिर वहीं मुँडेर पर पहुँचा। उसी जगह को खोजकर, जहाँ उस दिन जसुमति बैठी थी, बैठ गया। कैमरा पैरों के पास धरकर, शून्य दृष्टि से रेल की ओर देखने लगा।

एकाएक जसुमति के शब्द उसके कानो में गूँज गये, एकाएक उसकी आँखें उसके आगे नाच गयीं, एकाएक उन आँखों में छिपी बात उसे दीख गयी...

‘‘बीस रुपये!’’

‘‘बीस रुपये के लिए तुम फोटो से कहीं अधिक कुछ माँग सकते थे - कहीं अधिक कुछ...’’

वह खड़ा हो गया। आवेश में, वह अपने को गालियाँ देने लगा, सारे व्यक्तित्व की शक्ति बटोर कर घोर, भयंकर, रौद्र शाप देने लगा-‘बेवकूफ़! बेवकूफ़! अकथ्य-अक्षम्य-जड़मति-बेवकूफ़!’’

लेकिन क्या बेवकूफ़ी उसने की थी, वह नहीं जानता था। और जानता तो अपने आगे भी स्वीकार करने को वह तैयार होता, इसमें सन्देह है।

तभी उसे ध्यान हुआ, आध घंटे में सांगानेर से दूसरी गाड़ी चलती है।

(लाहौर, फरवरी 1935)


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