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रचनावली

अज्ञेय रचनावली
खंड : 3
संपूर्ण कहानियाँ

अज्ञेय
संपादन - कृष्णदत्त पालीवाल


भाई विमल,

आख़िर मैं यहाँ पहुँच ही गया। और पहुँचकर सोचता हूँ, अच्छा ही हुआ क्योंकि फिर क्या जाने सुन्दर जगह देखने को मिलती या न मिलती? ज़िन्दगी का कोई ठिकाना नहीं है - अच्छे-भले तन्दुरुस्त लोग देखते-देखते लुढ़क जाते हैं, मैं तो बीमार हूँ। देखने को अच्छा दीखता हूँ, और आमतौर पर होता भी हूँ, अच्छा ही; पर जब धड़कन का दौरा होता है, तब... तभी मैं कहता हूँ, रोमांस अच्छी चीज़ है। जीवन में जब इतना अनिश्चय है, तब रोमांस के बिना उसे कैसे सहा जाय, यह मुझे तो समझ ही नहीं आता। निश्चय कहाँ है? विश्वास कहाँ है? तुम्हारे विज्ञान में? विज्ञान जब अपनी इति पर पहुँचता है, तब एक प्रश्न-विराम का रूप ले लेता है। और जहाँ वैसा नहीं करता, जहाँ वह निश्चय का, आत्यन्तिक, अकाट्य सत्य का रूप लेता है, वहाँ वह झूठ बोलता है। क्या इसी को निश्चय कहते हैं? लेकिन तुम कहोगे पत्र में भी कहाँ की बात ले बैठा; इसलिए जहाँ हूँ, वहाँ की बात कहूँ।

यह तो तुम जानते हो कि मैं यहाँ आया कैसे। मेरे मामा बहुत वर्षों से यहाँ रहते हैं। अपने माता-पिता से वसीयत में उन्होंने एक विचित्र तबीयत पायी थी (अपनी माँ से शायद मैंने भी उसका कुछ अंश पाया है!) जिसके कारण उनका मन साधारण लोगों में, साधारण कामों में, साधारण स्थान पर लगता ही नहीं था। ज़बरदस्ती शादी कर दी जाने के बाद वे यहाँ भाग आये और जंगल में ही छोटा-सा घर बनाकर रहने लगे। वह उस समय का घर अब एक शानदार बंगला है, जिसके चारों ओर सेब, नाशपाती, खुमानी, आड़ू, अलूचे इत्यादि के सैकड़ों वृक्ष हैं। आज की इस हालत को देखकर कोई सोच भी नहीं सकता कि पन्द्रह-बीस साल पहले-बल्कि अभी पाँच-छः साल पहले तक - यहाँ इनके सिवाय कोई नहीं रहता था - नज़दीक कोई मकान था तो तराई के पार सामने की पहाड़ी पर, जो कौए की उड़ान से तो दो मील से अधिक नहीं होगा; लेकिन वैसे दस मील से कम नहीं! मामा ने अकेले आकर इस चीड़ की झड़ी हुई सुइयों और कुकुरमुत्तों से भरी हुई ज़मीन को फलदायिनी बनाया बाग़ खड़ा किया, और तब (अभी पाँच-एक वर्ष हुए हैं इस बात को) दो-चार और परिवार यहाँ आस-पास आ बसे। अत्यन्त सुन्दर जगह, एकान्त, शान्त और शीतल। काई की हरियावल यहाँ का मखमली बिछौना है, मुनाल के रंगीन पँखों की फड़फड़ाहट ही यहाँ के चामर हैं, पंडुकियों का कूजन ही यहाँ का संगीत है। रोमांस के राजा का यह दरबार है।

तुम पूछोगे, लेकिन रोमांस वहाँ भी है? मैं स्वयं जब सन्ध्या की (मेरी ममेरी बहन का नाम छायावादी मामा ने सन्ध्या रखा था, यह तुम्हें बता चुका हूँ कि नहीं?) आँखों की ओर देखता हूँ, तब मेरे स्वर में यह प्रश्न उठता है। उन आँखों ने उन्नीस बसन्त देखे हैं, उन्नीस बार बसन्त के सुन्दर स्वप्न को पावस के जल से सींचे जाते और शरद की परिपक्वता में फलित होकर भी शिशिर की तुषार-धवल कठोरता में लुट जाते देखा है; फिर भी उनमें उस रहस्य की पहचान नहीं है, स्वप्न की माँग भी नहीं है। ऐसी स्वच्छ - ऐसी तरल और हाँ, ऐसी भावहीन आँखें मैंने आज तक नहीं देखीं। भावहीन इसलिए कहता हूँ कि उनमें अपना कुछ नहीं दीखता - जान पड़ता है, सन्ध्या के पास अपना कुछ है नहीं जो आँखों में आये-चाहे व्यक्त होने के लिए, चाहे छिपा रहने के लिए। वायु चलती है, चीड़ के वृक्षों में सर-सर ध्वनि उठती है, तो मैं देखता हूँ कि सन्ध्या की आँखों में भी उस ध्वनि का कम्पन है; आड़ू के वृक्ष से कोई बची-खुची फूल की पंखुड़ी गिरती है, तो मुझे जान पड़ता है कि उन आँखों में भी अवसान की एक रेखा खिंच गयी है; सूर्य अस्त होता है, तो मैं पाता हूँ कि रंगों कि बिछलन पर टिकी हुई उन आँखों में भी अनुराग की झलक है। लेकिन जब मैं उन्हें पकड़ने के लिए बात करता हूँ तब पाता हूँ कि वहाँ कुछ नहीं है - सन्ध्या शून्य है। उसकी आँखों में प्रकृति-ही-प्रकृति है! तभी मैं कहता हूँ, वे आँखें बहुत ही सुन्दर हैं, लेकिन बहुत ही भावहीन।

तुम मन में हँसोगे कि रोमांस के उपयुक्त वातावरण नहीं मिला; लेकिन मुझे ऐसा तो नहीं लगता। तुम्हें मैं कोई प्रमाण तो नहीं दे सकता, फिर भी मैं सिद्धान्ततः यह मानता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति में रोमांस की क्षमता है, और वह कभी-कभी प्रकट भी होती है - दूसरों के आगे नहीं, तो उस व्यक्ति के आगे अवश्य, जिसमें वह हो। सन्ध्या में रोमांस है या नहीं, मैं चाहे न जानूँ, वह स्वयं एक दिन अवश्य जानेगी। और मैं भी क्यों नहीं जानूँगा? जैसी उसकी आँखें हैं, उनमें भला कुछ छिप सकता? पहाड़ी झील का अन्तर इतना स्वच्छ होता है, तभी तो उसमें छोटे-से-छोटा मेघपुंज भी, एक उड़ता हुआ पक्षी तक साफ़ झलक जाता है; नहीं तो क्या तालाब के गँदले पानी में कुछ दीखता है?

तुम ऊब उठे होगे। थोड़ा-सा विस्मय मुझे भी होता है कि आने के पहले ही दिन तुम्हें इतना लम्बा पत्र कैसे लिख गया! रात यहाँ पहुँचा था, रात बारह बजे तक लोग बातें करते रहे। सवेरे उठकर दिन-भर सन्ध्या के साथ घूमा किया-बाग़ देखा, घर देखा, खेतों की क्यारियाँ और उनसे परे एक रहस्य-भरे परदे की तरह दृष्टि को रोकनेवाला चीड़ का जंगल भी देखा। नीचे घाटी में फैली हुई और भागती हुई धूप देखी, टूटते तारों की तरह गिर कर सर्राता हुआ निकल जानेवाला कुरर का जोड़ा देखा। पड़ोसियों से परिचय प्राप्त किया; फिर सन्ध्या के पाले हुए पक्षियों, मुर्ग़े-मुर्गियों, हंसों की जोड़ी और जंगली बिलार के बच्चे से पहचान की। और अब रात को तुम्हें पत्र लिखने बैठा हूँ, तब भी थकान नहीं है, परिश्रम एक विचित्र अत्यन्त मधुर नशे की तरह शरीर में छाया हुआ है! इस सबसे तुम अनुमान लगा सकते हो कि यह स्थान कैसा होगा!

लेकिन तुम्हें क्या? तुम्हें अच्छी तुम्हारी बीमे की एजेण्टी और नगर कांग्रेस कमेटी की रीं-रीं-चीं-चीं! इस आख़िरी ‘इन्सल्ट’ के साथ।

- तुम्हारा स्नेही

2

27 जून

प्रिय, विमल,

मैं कहता था, मैं जीतूँगा! रोमांस-रोमांस-रोमांस - कितना चाहते हो तुम रोमांस? मैंने उस दिन देखी नहीं थी; लेकिन क्या वह थी नहीं? वह तो बरसों से यहाँ चक्कर काट रही है - माई डीयर मैन, बरसों से! पर गर्व पीछे करूँगा, बात को कह लूँ। तो सुनो!

पिछला पत्र लिखने के बाद फिर तबीयत खराब हो गयी और तीन दिन बाहर निकलना नहीं हुआ। इस बीच मैंने सन्ध्या को कुछ और पहचाना। मामी तो हैं नहीं, और मामा काफ़ी बुजुर्ग भी हैं और अब बोलते-बोलते भी कम हैं, अक्सर अपनी लाइब्रेरी में रहते हैं, इसलिए घर की देख-रेख और सेवा-शुश्रूषा का सब भार सन्ध्या पर ही रहता है। और वह उसे ऐसे निभाती है, जैसे जानती ही न हो कि वह बोझ है। मैंने अपने को बिलकुल आराम में पाया, और इतना ही नहीं; मैंने यह भी पाया कि सन्ध्या साधारण घरू चिकित्सा के अलावा और भी बहुत-कुछ जानती है। ‘मेघदूत’ उसे ज़बानी याद है, ‘कुमारसम्भव’ उसने कई बार पढ़ रखा है, भारवि और श्रीहर्ष की वह तुलना कर सकती है! ख़ैर। तीन दिन बाद मैं उठने-फिरने लायक हुआ तो यह तय हुआ कि बाहर खुले में बैठा जाय। बँगले के सामने घास पर मेरे लिए एक आराम-कुर्सी डाल दी गयी, अपने लिए सन्ध्या ने एक स्टूल रख लिया। मैं लेट गया, टाँगों पर कम्बल डाल कर रंग-बिरंगे बादलों की ओर देख कर क्या कुछ सोचने लगा। सन्ध्या भी चुपचाप बैठी कभी मेरी ओर, कभी बादलों की ओर, कभी सामने की पहाड़ी की ओर देखने लगी।

बहुत समय ऐसे बीत गया। अँधेरा होने लगा। मैं इतनी देर तक सन्ध्या से कुछ भी नहीं बोला था; लेकिन सोच रहा सन्ध्या के बारे में ही। अब जब मुझे ध्यान हुआ कि मैं बहुत देर से चुप हूँ, तब मैंने उसकी ओर देखा। वह अब स्थिर दृष्टि से सामने की पहाड़ी की ओर देख रही थी। मैंने भी उधर ही देखते हुए पूछा, ‘‘उस पहाड़ी पर क्या कोई नहीं रहता? कहीं प्रकाश नहीं है।’’

वह उत्तर देने को हुई ही था कि सामने पहाड़ पर कहीं एक बत्ती जल उठी। प्रकाश दूर था, छोटा-सा दीखता था; लेकिन वह तेल के दीये-सा लाल नहीं था, पीला भी नहीं था; काफ़ी सफ़ेद दीखता था, मानो बिजली का हो। और वह लैम्प की तरह स्थिर नहीं था, कभी जलता था, कभी मिट जाता था, कभी थोड़े काल के लिए, कभी अधिक।

पहले मैंने समझा कि वह पेड़ों में से छन कर आता होगा, और हवा से पेड़ों के हिलने के कारण झिपता-बलता होगा। लेकिन हवा बिलकुल शान्त थी, यहाँ तक कि पहाड़ों में हमेशा होती रहनेवाली चीड़ों की साँय-साँय भी बन्द थी। अत्यन्त स्तब्धता छायी हुई थी। फिर मुझे ऐसा भी लगा कि वह झिपना-बलना आकस्मिक नहीं है, मानो किसी विशेष प्रणाली पर चल रहा है, जैसे उनमें चिन्तन है, कुछ अभिप्राय है। मेरी रोमांटिक वृत्ति जागी-क्या यह सिगनल है? मैं ध्यान से देखने लगा, और मैंने पाया कि मैं उस प्रकाश के सन्देश को साफ़-साफ़ पढ़ सकता हूँ - मोर्स प्रणाली पर सन्देश भेजा जा रहा था - आइ लव यू - आइ लव यू - आइ लव यू-

मैं भौंचक रह गया। इस जंगल में मोर्स कोड ओर प्रेमालाप का यह आधुनिक तरीक़ा! मुझे इतना आश्चर्य हुआ कि मैं बोल नहीं सका, दस मिनट तक चुपचाप एक सिगनल ही देखता रहा। जब वह बन्द हो गया, और थोड़ी देर बाद पहाड़ के एकरूप अन्धकार को चीर कर मामूली तेल के दीये का लाल और फैला हुआ-सा प्रकाश जगने लगा, तब मैंने किसी तरह सन्ध्या से कहा, ‘‘वह जानती हो क्या था? कोई सिगनल कर रहा था, ‘मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ’।’’

सन्ध्या ने अचम्भे में आकर कहा, ‘‘सच? लेकिन मैं तो इसे आठ वर्षों से नित्य देख रही हूँ!’’

मेरा विस्मय और बढ़ गया। ‘‘आठ वर्षों से? नित्य? कौन रहता है वहाँ? किसे सन्देश भेजता है?’’

सन्ध्या ने मेरे प्रश्न की उपेक्षा करते हुए कहा ‘‘अजब बात है। आठ वर्ष पहले तो इधर हमारे सिवाय कोई था ही नहीं।’’

थोड़ी देर बाद उसने फिर धीरे से कहा, ‘‘अजब बात है।’’

थोड़ी और देर बाद उसने और भी धीरे से कहा, ‘‘बड़ी अजब बात है। आठ वर्षों से-’’

फिर वह एकाएक उठकर भीतर भाग गयी।

और सवेरे मैं देखता हूँ, झील पर बादल घिर आये हैं, सारा आकाश छा गया है। अब सन्ध्या की आँखों के और संसार के बीच में सदा के लिए एक परदा छा गया है, जिस पर सन्ध्या का सच्चा रूप दीखता है-और वह रूप है सारे विश्व का रहस्य - रोमांस, रोमांस, रोमांस...

29 जून

परसों मैं पत्र अधूरा ही छोड़कर उठ गया था। वैसे वह अधूरा था भी नहीं, क्योंकि जो असल बात मुझे लिखनी थी, वह तो लिख ही चुका था। फिर भी उतनी बात से ही मन नहीं भरता। अगर रोमांस के आ जाने से ही उसकी हौंस मिट जाती, तो बात ही क्या बनती? आकर तो वह निरन्तर माँगती है कि उसका रहस्य खोला जाय, इस माँग में ही तो उसकी शक्ति है। मैं समझता हूँ, पिछली सदी में यूरोप में जो रोमांटिक गाथाओं की लहर आयी थी, उसमें संकेत रूप से यही बात कही गयी थी। रोमांस की इसी रहस्यमयी शक्ति को शाप का रूप दिया गया था। टेनीसन की ‘लेडी आफ़ शैलाट’ का शाप भी यही था-शीशे में ‘बाहर’ का दृश्य देखना रोमांस की पुकार थी, जिसके वश होकर वह बन्दी रमणी नाव में बैठकर बह चली, जाने किस रहस्य का उद्घाटन करने के लिए! कीट्स की ‘ला बेल डाम सां मेर्सी’ की हृदयहीन नायिका भी तो वही रहस्यमयी शक्ति है, जिसके एक चुम्बन से अभिभूत होकर पुरुष सदा उसकी तलाश में मारा-मारा फिरता है...

लेकिन साहित्य-मीमांसा भी क्या बीमे के आँकड़े हैं जो तुम्हें रुचेंगे। लौटूँ कहानी की ओर ही!

रोमांस तो सन्ध्या की है, लेकिन रहस्य तो मेरे लिए भी है न! मैंने खोज-खाज़कर बहुत-सी बातें पता लगायी हैं। और जो पता लगीं, उनके आधार पर बहुत-कुछ सोचा भी है, जिसके कुछ परिणाम भी निकले हैं। ये सब अब लिखता हूँ कि आयु की लम्बाई से ही जीवन की क़ीमत लगानेवाले तुम उसकी गहराई भी कुछ समझ पाओ।

वह जो परली पहाड़ी पर आदमी रहता है, उसका नाम है बलराज। उसने कहीं शिक्षा नहीं पायी है, लेकिन सुनने में आता है कि वह केवल पढ़ा-लिखा ही नहीं, बहुत-सी विद्याओं में पारंगत भी है। यह सब कुछ उसने स्वयं अपनी हिम्मत से सीखा है, क्योंकि उसका बाप देवराज यहाँ के हिसाब से काफ़ी सम्पन्न होते हुए भी पढ़ाई के विरुद्ध था और वैसे भी अक्खड़ था। बेटा ऐसा तीक्ष्ण-बुद्धि कैसे निकला, इसका कारण कई प्रकार से बताते हैं; लेकिन उन सब बातों में इतना साम्य अवश्य है कि उसकी माँ का ठीक-ठाक पता नहीं है, और जिस स्त्री ने उसे पाला-पोसा, वह देवराज की दूसरी पत्नी थी। सौतेली माँ का जैसा चित्र खींचा जाता है, इस स्त्री ने अपने को उसके योग्य साबित करने में कोई असर नहीं छोड़ी। देवराज न केवल बुढ़ापे की स्त्री का गुलाम था, बल्कि वैसे भी अत्यन्त कठोर और नीरस तबीयत का आदमी था। लोग बताते हैं कि वह कई बार बलराज को इतना पीटा करता था कि वह बेहोश हो जाता था, और तब उसे घर से कुछ दूर राह के किनारे डाल जाता था। कई बार आते-जाते लोग उसकी पट्टी कर जाते थे, और कभी कुछ फल भी खाने को दे जाते थे।

जब बलराज कुछ बड़ा हुआ, तब उसे घर से बिलकुल बहिष्कृत कर दिया गया - एक अलग झोंपड़ा उसके लिए डाल दिया गया, जिसमें वह उसी कड़वी आज़ादी में पलने लगा, जो बन्दी को उस समय मिल जाती है, जब वह काल-कोठरी के एकान्त में पाता है कि वह सारे संसार से अलग है। यहीं उसने तरह-तरह की किताबें पढ़ीं, थोड़ी-बहुत हिकमत, कुछ संगीत, कुछ बढ़ईगिरी और न जाने क्या-क्या...

मैं कुछ-कुछ उसकी हालत का अनुमान कर सकता हूँ। दुबला लम्बा शरीर, बड़ी-बड़ी आँखें, लम्बे किन्तु सिर से सटकर रुखाई से लटकते हुए बाल, एकदम मनोविज्ञान-ग्रन्थों के ‘प्राब्लेम चाइल्ड’ की-सी सूरत। उस जंगल में अकेले रहते, यह देखते हुए कि उसके संसार में जो दो व्यक्ति हैं जिनसे वह कुछ स्नेह की आशा कर सकता है, उनमें से एक तो उसे नित्य पीटता है, उसे कुचल कर मिट्टी करके ही अपनाना चाहता है; और दूसरा व्यक्ति, जिससे मृदुता और सहानुभूति की उम्मीद प्रकृति ने न जाने कैसे पुरुष की नस-नस में तड़पा दी है, उसकी विमाता है, जो दूर ही धकेलती है, और कभी पास खींचती है, तो एक विष में लपटाये हुए सूत्र से। बलराज किधर गया होगा, यह समझना कठिन नहीं है। बच्चा जब माँ को माँगता है, और पाता है केवल एक स्त्री जो किसी दूसरे की पत्नी है, तब उसकी आत्मा दूसरे रास्ते में पड़कर वह कमी पूरा करना या छिपाना चाहती है - संगीत द्वारा, शारीरिक परिश्रम द्वारा, आत्मपीड़न द्वारा और सबसे बढ़कर दिवास्वप्नों के द्वारा-उस अमोघ अस्त्र रोमांस के द्वारा।

देवराज मर गया, और बलराज की विमाता कहीं चली गयी। बलराज अपने पिता के विस्तृत खेतों का स्वामी होकर रहने लगा।

सन्ध्या को याद है कि दस-एक वर्ष पहले वह एक बार इस तरफ़ आया था और एक दिन यहाँ रह गया था। सन्ध्या उस समय केवल नौ वर्ष की थी; लेकिन उस दिन में बलराज से उसकी जो कुछ बात-चीत हुई, वह उसे बखूबी याद है, और याद होने का कारण भी है। सन्ध्या ने अपना समवयस्क लड़का तब तक देखा नहीं था, लेकिन वह स्वच्छन्द वातावरण में पली होने के कारण प्रगल्भ और बेधड़क थी; बलराज ने भी अपनी समवयस्क लड़की नहीं देखी थी, पर वह अपनी आहत और पीड़ित आत्मा के कारण अत्यन्त संकोची और एकान्तप्रिय था। सवेरे वह आया था, और सन्ध्या कहती है कि दोपहर तक उसके मुख से एक शब्द नहीं निकला! चुपचाप एक फीकी-सी, दीख जाने पर फ़ौरन झिप जाने वाली दृष्टि से सन्ध्या की ओर देखते हुए ही उसने खाना खाया, वैसे ही लाइब्रेरी में बैठा रहा। पहली बात उसने यही कि की ‘घूमने जाऊँगा,’ और बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये चीड़ के जंगल की ओर चल दिया।

और वहाँ जंगल में और मजे की बात हुई। सन्ध्या उसके बर्ताव से हैरान तो हुई; लेकिन कुंठित होना सीखा नहीं था, और न जाने क्यों उसे इस बारह बरस के लड़के की बीमार आँखों पर करुणा-सी भी आयी थी। वह भी पीछे-पीछे वन की ओर चल दी। वहाँ वह बलराज की तलाश में घूमती हुई जंगली स्ट्राबेरियाँ भी बीनती रही, और जब आखिर बलराज मिला, तब उसे स्ट्राबेरियाँ देती हुई बोली, ‘‘लो तुम्हारे लिए बीनी हैं।’’ बलराज विस्मय में वह ले भी नहीं सका, बोला, ‘किसी के लिए नहीं बीनी जातीं।’’ कल्पना करो इस उत्तर की, और उस बच्चे की हालत, जो यह कहता है! समझो उसकी प्रवासी आत्मा का अकेलापन, जिसमें उसकी सारी मिठास, सारा रस, अन्तर्मुख होकर भीतर-ही-भीतर घुमड़ रहा है, विकृत हो रहा है-ठीक वैसे ही, जैसे अंगूर का रस निचोड़ कर दाब दिया जाने के बाद सड़ता है और शराब में परिणत हो जाता है...

सन्ध्या उसे साथ लेकर ही लौटी। रास्ते में उसने न-जाने कितने और कैसे-कैसे प्रश्न पूछे, जिनके उत्तर में बलराज धीरे-धीरे अपना तो नहीं, अपने ज्ञान का परिचय देने लगा। जंगल की अनेक तरह की जड़ी-बूटियों के नाम उसने बताये, सुगन्धित जड़ों की खूबियाँ गिनायीं, और यहाँ तक खुल सका कि जेब में से एक जड़ निकालकर सन्ध्या की ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘‘लो, सूँघो!’’ जब सन्ध्या ने सूँघ कर प्रशंसा की और लौटाने लगी, तब बोला, ‘‘तुम रखो। सन्ध्या ने पूछा, ‘‘मेरे लिए नहीं लाये थे, तब मैं नहीं लूँगी।’’ और उसने देखा कि ‘‘रखो,’’ कहता हुआ भी बलराज जैसे लेने के लिए हाथ बढ़ाने की चेष्टा कर रहा हो, मानो उसमें इतना भी साहस नहीं है कि आग्रह कर सके! सन्ध्या ने वह जड़ रख ली, और वे लौट आये। इसी शाम बलराज चला भी गया।

बस, इतनी-सी बात तब हुई थी - दस साल पहले। और आज यही व्यक्ति सिगनल करके कहता है, ‘‘मैं प्रेम करता हूँ,’’ और आठ वर्षों से कह रहा है! कितना सच्चा सूत्र है, जो मृत्यु और जीवन का सम्बन्ध जोड़ता है; कितना कमजोर तन्तु है, जिस पर अपनी पीड़ाओं का गुरु-भार लिये नाचता हुआ बढ़ता है!

तुम कहोगे, क्या बेहूदगी है, पागलपन है! तुम्हारी समझ में प्रेम का यह रूप आ ही नहीं सकता। मिलने के बाद किसी के भीतर कल्पना का कल्पवृक्ष फल उठे, वह सम्भावनाओं के आसरे ही कल्पित प्रेम का उद्यान खड़ा कर ले और उसी में इतना तन्मय हो जाय कि बाहर न निकले, यथार्थता न देखे, यह तुम्हारी दृष्टि में बेहूदगी ही हो सकती है। तुम प्रेम को आत्म-दान के, उपासना के रूप में-बल्कि अछूत की उपासना के रूप में-कब देख सके! तुम्हें तो यह जँचता कि यहीं जंगल में उसका और सन्ध्या का चोरी से मिलन हुआ करता, या वह कभी सन्ध्या के घर में घुस आता और फ़िल्म के बनमानस के ढंग पर उसे उठा ले जाता! तब तुम कहते, ‘‘यही तो यथार्थता है साहब!’’ या ‘‘मर्द का प्यार ऐसा ही होता है!’’ लेकिन तुम जानते हो, यथार्थता का यह रूप भी रोमांस का उबाल होता? तुम्हारे सड़े मस्तिष्क का रोमांस भी सड़ी हुई होगी-और अन्ततः यह तुम्हारी ‘यथार्थता’ क्या एक मोहावरण नहीं होती उस यथार्थता को छिपाने के लिए, जिसमें तुम, स्वयं तुम हो? लेकिन जाने दो, मैं बहस नहीं करना चाहता; मैं इस अभागे बलराज के स्वप्न में रहना चाहता हूँ, उसके सिगनल के स्पन्दन में जीना चाहता हूँ।

-स्नेही

3

12 जुलाई

भाई,

यह उम्मीद नहीं थी यहाँ का मौसम ऐसे दगा देगा। आज आठ दिन से बारिश बन्द नहीं हुई है। सुबह से तीसरे पहर तक हल्की बारिश और घोर गड़गड़ाहट उसके बाद रात-भर मूसलाधार वर्षा। मैं तंग आ गया हूँ। सन्ध्या के मामा तो अब लाइब्रेरी से निकलते ही नहीं, वहीं खिड़की-दरवाज़े बन्द करके आग जलाकर बैठे रहते हैं, क्योंकि नमी से उनके जोड़ों में दर्द होने लगता है; और सन्ध्या बारिश में भी जहाँ-तहाँ घूमती-फिरती है और अजब तर्क के पहाड़ी गीत गाती है। मैं बहुत अकेला हूँ। जब कभी उस अकेलेपन का ध्यान आ जाता है, तब आत्मा अपने सारे दुखों को याद करके बेकल हो उठती है, और वह सनातन प्रश्न पूछने लगती है, जो मानवता का वरदान भी है और शाप भी - मैं क्या हूँ, क्यों हूँ और कब तक हूँ? वैसे तो इन प्रश्नों के आगे कौन अकेला नहीं है? सुख में, संग, रस-प्लावन में, जब यह प्रश्न उठा है तो तभी उठा है कि जब व्यक्ति एक प्रकार से इन सबसे दूर हट गया है, हटे बिना भी अलग हो गया है-यानी अकेला हो गया है। ऐसा अकेलापन क्यों आता है? मुझे लगता है कि भीतर-ही-भीतर एक आग पैदा होती है, जिससे सुख-ऐश्वर्य में भी एक दर्द-सा छा जाता है और उसे खोखला बना देता है... भाप अन्ततः है तो पानी ही, लेकिन आन्तरिक ताप के कारण उसका आकार बदल जाता है, वह पानी होकर भी तृप्तिदायिनी नहीं रहती, और इसलिए भाप में रखी जाने पर ‘पानी में मीन प्यासी’ ही हो सकेगी।

मैं अकेला हूँ। भीतर के किस दाह के कारण अकेला? सुनो। मैं रोगी हूँ, इस समय लगभग अपाहिज हूँ, क्योंकि दूसरे के आसरे रहता हूँ। मेरे जीवन में क्या आपूर्त्तियाँ नहीं हैं? मैं रोमांस का जाल बुनता हूँ। पर क्या उसके तन्तु नहीं टूट जाते? फिर मैं दूसरों के लिए महल बनाता हूँ, लेकिन क्या वे दूसरों के होने के कारण अधिक मजबूत होते हैं?

मैं सन्ध्या को देखा किया हूँ। और ऐसे कई दिन आये हैं, जब मैं घंटों निष्काम विस्मय में उसे देखा किया हूँ, किसी तरह का कोई भाव मुझमें नहीं जागा है - देखते रहने का भी नहीं-बच्चा तितली को देखते हुए जिस तरह उसमें, उसके उड़ने में नहीं, उसकी रंगीनी में, सुकुमारता में नहीं, उसकी सम्पूर्णता में, तितलीपन में तन्मय हो जाता है, उसी तरह मुग्ध हो सकने का अवसर मुझे मिला है। फिर मैंने उसकी आँखों में बड़ी हल्की-सी बदली छायी देखी है, और उसे ही देखा किया हूँ, और नित्यप्रति आते रहनेवाले उस सिगनल-सन्देशों से मुझे उसे देखने में सहारा मिलता रहता है। मैंने देखा है, शाम को चाहे बारिश हो, चाहे पत्थर पड़ें, जब साँझ घिर आती है और दीये बालने का समय होता है, तब सन्ध्या एक अजब विनय का भाव लिये बाहर जाकर खड़ी हो जाती है और सिगनल की प्रतीक्षा करती है। सिगनल के बाद जब पहाड़ी पर वह मैला-सा स्थिर प्रकाश जाग जाता है, तब वह लौट आती है और बरामदे में आकर कुछ देर चुप खड़ी रहती है, फिर भीतर आकर अपने काम में लग जाती है। पर अब तीन दिन से सिगनल बन्द है। सन्ध्या के मन की बात मैं नहीं जानता; लेकिन मेरे लिए कुछ टूट-सा गया है। आठ साल बाद एक दिन वह सिगनल बन्द हो जाय, जबकि आठ साल बाद ही वह मेरे द्वारा पढ़ा गया था, इसमें मुझे लगता है कि विधि खास तौर पर अपमान करना चाहती है।

उस दिन हमेशा की भाँति सन्ध्या बाहर खड़ी थी। सिगनल होकर देखा जाना ऐसी अभ्यस्त दैनिक क्रिया थी कि शायद उधर ध्यान भी नहीं जाता था। मामा ने पुकारा, ‘‘सन्ध्या!’’ तब मुझे एकाएक ख़याल आया कि तारे निकल आये हैं, रात घनी हो गयी है और सर्दी खूब हो रही है। मामा की आवाज़ सुनकर सन्ध्या चुप-चाप सिर झुकाये चली गयी। उसके बाद नौकर मुझे खाना दे गया - सन्ध्या नहीं आयी।

और अब तीन दिन हो गये हैं, वह सिगनल बन्द है। जब बन्द होने के कारण सोचता हूँ तब आशंका से हृदय भर जाता है। मुझे एक लेखक की कहानी याद आती है, जो नित्य नियम से प्रातःकाल घूमने जाता था और ठीक आठ बजे लौट आता था। एक दिन वह आठ बज के कुछ मिनट तक नहीं लौटा, तब उसकी स्त्री रोने लगी - उसे दृढ़ विश्वास हो गया कि वह मर गया है। और उसका विश्वास ठीक निकला! क्या बलराज को कुछ हो गया है? यह सोचकर मैं सहम जाता हूँ। उस अज्ञात दूरस्थ आदमी को मैं भाई-सा मानने लग गया हूँ। और सन्ध्या के लिए भी मुझे चिन्ता हो रही है। उसकी आँखों में जो बादल छाने लगे हैं, वे कुछ महत्त्व रखते हैं। सन्ध्या मौन है, मैं नहीं जानता कि उसके भीतर कुछ जागा है या नहीं; लेकिन इतना जानता हूँ कि वह वैसी नहीं बनी है कि दो बार प्यार कर सके। और अगर बलराज...

मेरा मन बहुत उदास हो गया है। लिखने की इच्छा नहीं होती। क्षमा करना। मन आता है कि अभी उठ कर चल दूँ और बलराज का पता लगाकर लाऊँ। लेकिन वह बारिश का जल प्लावन, और यह स्वास्थ्य की टूटी हुई नाव... और वह रोमांस का आलोक। कितनी दूर-कितनी दूर!

तुम्हारा-

प्रिय विमल

लिखना चाहता हूँ, पर लिख नहीं सकूँगा! अपनी डायरी के कुछ पन्ने फाड़कर भेज रहा हूँ, पढ़ लो!

18 जुलाई।

क्या इस साहस को बुद्धिमत्ता कहा जा सकता है? कीच और पानी और सील, छाये हुए बादल, पहाड़ों का उतार-चढ़ाव-इस हालत में क्या मुझ रोगी, को यह काम लेना चाहिए था? लेकिन और चारा कहाँ है? जिसे जीना है, उसका मार्ग यही है कि क्षण-क्षण पर जीवन को लापरवाही से परे फेंक देने को तैयार रहे। जीवन का मोह लेकर भी कोई जिया है? दिन-भर में रुक-रुककर मैं छः मील आ सका हूँ, और फिर भी लगता है, टूट गया हूँ! पता नहीं, कल चार मील भी जा पाऊँगा या नहीं। लेकिन जाना तो होगा। मुझे लगता है कि बलराज मेरा भाई है - भाई से बढ़कर कुछ है, क्योंकि मैं उसे देखे बिना भी अपना सका हूँ।

मैंने सन्ध्या से कहा था, ‘‘कल प्रातःकाल मैं उधर जाना चाहता हूँ, मामा से कह देना।’’ उसने कहा, ‘‘अच्छा।’’ सवेरे मैंने देखा, वह तैयार खड़ी है, और घोड़े पर आवश्यक सामान भी लदा हुआ है! मैंने पूछा, ‘‘तुम भी जाओगी?’’ लेकिन पूछते ही मुझे लगा कि मैंने बिलकुल व्यर्थ यह प्रश्न पूछा है। उसने उत्तर में कुछ कहा नहीं, केवल इतना ही, ‘‘तुम अकेले जाने लायक़ नहीं हो।’’

और दिन-भर चलकर हमने यहाँ पड़ाव भी कर लिया है। मैं यहाँ बैठा बलराज की बात सोच रहा हूँ, शायद सन्ध्या भी सोच रही होगी - आज सिगनल को बन्द हुए, आठ दिन हो गये... मुझे लगता है, जैसे हम लोग ध्रुव-प्रदेश में गिरे हुए किसी उड़ाके को बचाने जा रहे हों; और देर होने से उत्कंठा और चिन्ता बढ़ती है कि क्या वह कल तक बचा रहेगा? क्या मैं झूठ-मूठ का रोमांस गढ़ रहा हूँ?

19 जुलाई

शाम। पथ में शाम हो गयी - लेकिन अब वह स्थान दूर नहीं है। रात में हम वहाँ जा लेंगे। यहाँ पहाड़ी रास्ते के मोड़ पर मुड़ते ही वह घर दीखने लगा, और देखते ही मुझे याद आया, मैं कितना थका हुआ हूँ! अब हम यहाँ बैठे हैं; सन्ध्या कभी उस घर की ओर देखती है, कभी दूसरी पार अपने बाग़ की ओर, धीरे-धीरे कुछ गुनगुनाती है। उसने अभी तक इस घर की या बलराज की कोई बात नहीं की है, मानो उसे सारे रास्ते-भर मेरी ही चिन्ता रही है; मुझसे उसने रह-रहकर पूछा है कि तबीयत कैसी है... कभी मुझे लगता है कि उसे इस सारे क़िस्से में मामूली कौतूहल से अधिक कुछ नहीं है! पर क्या सन्ध्या इतनी शून्य हो सकती है? उसकी आँखों में जो मुझे दीखता है, वह क्या मेरी ही सृष्टि है? इस समय साँझ के धुँधलके में उसका गुनगुनाना क्या केवल साँझ के रंगों का मुखर रूप है, और उससे अधिक कुछ नहीं?

लेकिन - सन्ध्या की हल्की-सी चीख सुनकर मैं देखता हूँ - सिगनल! घर की खिड़की से बिजली की बैटरी का सिगनल, ‘‘मैं तुम से प्रेम करता हूँ - मैं तुमसे प्रेम करता हूँ - मैं तुम से-’’ और बस।

हमें जाना चाहिए, अभी चलना चाहिए। मन में संशय का दानव कहता है, शायद उसकी बैटरी खत्म हो गयी थी और नयी बैटरी की प्रतीक्षा में आठ-नौ दिन बीते, यही तुम्हारी इस सारी बेवकूफ़ी का नतीजा निकलेगा; पर मन नहीं लगता, अभी चलना ही होगा, चाहे पहुँचते-पहुँचते मेरे हृदय का स्पन्दन बन्द हो जाय... सत्य को जानना ही होगा...

24 जुलाई।

सत्य-किसे कहते हैं हम सत्य? लेकिन ऊपर का पन्ना पढ़ता हूँ तो मन कहता है, आखिर तुम सत्य जान ही गये... जब पूछता हूँ, जान गया, तो उत्तर नहीं मिलता। सिवाय इसके कि अब यहाँ अच्छा नहीं हो सकूँगा।

एक अस्वस्थ पीला शरीर, अपनी श्यामता में सुनहले तारे उलझाये हुअस बाल, शान्त चेहरा... उस अँधेरे घर में घुसकर जब मैंने बत्ती जलायी तब यही देखा। चारपायी खाली थी, बलराज खिड़की के पास ज़मीन पर लेटा हुआ था, और उसके हाथ के पास टार्च पड़ी थी। मैंने लपक कर बलराज का कन्धा पकड़कर हिलाया, नब्ज़ देखी और घबरा कर कहा, ‘‘हैं?’’ पर सन्ध्या अपने स्थान पर ही ऐसे स्तब्ध, गतिहीन खड़ी रही, मानो मैं अनुसन्धान करके जो कुछ पता लगाऊँगा, वह उसे पहले से जानती है, वह सब उसके भीतर घटित हो चुका है... वह छोटी-सी लड़की जिसने अभी तक यह नहीं जाना था कि प्रेम क्या होता है, कैसे बिना प्रयास के प्रेम, मृत्यु, अनन्तता तक का अर्थ मानो ज्ञान का एक ही घूँट पीकर जान गयी और उससे विचलित नहीं हुई...

आज छः दिन हो गये इसको; लेकिन सब वे दृश्य मेरे आगे ऐसे फिर रहे हैं, जैसे अभी वह सब-कुछ हो रहा हो... फिर भी सोचने को, लिखने को, कुछ नहीं है। ऐस भी क्षण होते हैं, जो जीने के लिए होते हैं - और उसके बाद याद करने के लिए नहीं, पीछे देख-देखकर बार-बार फिर जीने के लिए होते हैं... ऐसा ही क्षण वह था, जब मैं बलराज के सिरहाने झुककर बैठा हुआ उसके चेहरे की ओर देखता जा रहा था, उस मनःशक्ति की लहरों में बहा जा रहा था, जो इस चिर-रुग्ण क्षीण शरीर को चारपायी से खींचकर खिड़की तक लायी थी, एक अज्ञात-स्वप्न को अपनी दीप्ति द्वारा खींच बुलाने के लिए; और जब सन्ध्या खिड़की पर खड़ी पार की ओर टकटकी लगाए देख रही थी... और वह क्षण तब समाप्त हुआ, जब सन्ध्या ने घूमकर बहुत धीमे स्वर में पूछा, ‘‘अगर मैं टार्च ले लूँ, तो चोरी तो न होगी?’’

मैंने टार्च उठाकर उसे दे दी और एक मूक दृष्टि से उसे वह कह देना चाहा जो ज़बान से नहीं निकला कि यह तो आठ वर्ष से तुम्हारी है...

लेकिन अब टार्च से क्या? जीवन में जो टार्च होती है, रोमांस, वह सन्ध्या के लिए बुझ गयी है। अब उसे सिगनल द्वारा कोई बुलाता है तो काल - और उसका संकेत, उसका प्रसाद, क्या है? शून्य, शून्य, शून्य...

(मेरठ, सितम्बर 1937)


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