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रचनावली

अज्ञेय रचनावली
खंड : 3
संपूर्ण कहानियाँ

अज्ञेय
संपादन - कृष्णदत्त पालीवाल


अंगारे लाल-लाल चमक रहे थे; किन्तु फिर भी छोटी-सी झोंपड़ी में बैठा हुआ व्यक्ति जाड़े से काँप रहा था। रात बहुत बीत गयी थी, उस झोंपड़े में दिया तक नहीं जल रहा था। अंगारों के क्षीण किन्तु अरुण आकाश प्रकाश में झोंपड़े में पड़ी प्रत्येक वस्तु ने एक अद्भुत, अलौकिक रूप धारण किया था। एक कोने में पड़ी हुई थाली ऐसी चमक रही थी मानो निशाचर अपनी आरक्त आँखें खोले किसी शिकार की प्रतीक्षा में बैठा हो। और दूसरे कोने में शायद कपड़ों का एक गट्ठर पड़ा था।

बाहर घनघोर वर्षा हो रही थी। छप्पर से कभी-कभी थोड़ा-सा पानी अन्दर चू पड़ता था। वह जहाँ गिरता, वहाँ एक धब्बा-सा पड़ जाता। लाल प्रकाश में वह रक्तकुंड-सा प्रतीत होने लगता। झोंपड़े में बैठा हुआ व्यक्ति चौंककर उसकी ओर देखता, फिर अपने विचारों में लीन हो जाता।

उस व्यक्ति के शरीर पर एक फटी कमीज और एक पाजामे के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। क्षण-भर वह निस्तब्ध बैठा रहता, फिर एक दीर्घ निश्वास छोड़ कर काँप उठता और आग की ओर सरक जाता।

रात्रि की निविड़ता बढ़ती जा रही थी और अंगारों का प्रकाश क्षीणतर होता जाता था; किन्तु वह व्यक्ति आग की ओर विस्मय-विस्फारित नेत्रों से देखता हुआ बैठा था; और उसमें एक भयानक अरुण दीप्ति काँप रही थी। उसमें अमानुषिकता का, उदासीनता का, और जड़ता का एक विचित्र भाव था जैसे हिमगह्वर में ठिठुरते हुए भूखे एकाकी भेड़िए की आँखों में होता है।

अंगारों की दीप्ति राख से धीरे-धीरे आवृत होती जाती थी, किन्तु उस व्यक्ति के हृदय से शायद कोई भार उठता जा रहा था। उसका झुका हुआ शरीर ठिठुरने पर भी धीरे-धीरे सीधा हो रहा था। ऐसा विदित होता था मानो उसके अन्दर कोई घोरतम परिवर्तन हो रहा और उसकी टक्कर की चोट से, उसकी प्रतिक्रिया से, उसका हृदय कम्पित हो गया हो।

एकाएक उसके जड़प्राय शरीर में स्फूर्ति आ गयी। उसने अंगारों को हिलाकर पुनः दीप्ति कर दिया। झोंपड़े में फिर प्रकाश हो गया। वह व्यक्ति धीरे-धीरे, मन्त्र के उच्चारण की तरह कुछ कहने लगा-‘तुम अविश्वस्त हो, तुम सन्दिग्ध हो; तुमने एक कार्य में हाथ बँटाया था, किन्तु तुम अयोग्य गिने गये और तिरस्कृत कर निकाल दिये गये...।

‘तुम विश्वास के अपात्र हो! तुम्हारे मुँह पर कालिख पुत गयी है! अब तुम कभी भी उस महान् कार्य में भागी नहीं हो सकते। तुम जहाँ जाओगे, मृत्यु की छाया की तरह अपरिहार्य यह कलंक तुम्हारा पीछा करेगा कि तुम पर लोग विश्वास नहीं कर सके...।

‘तुम... तुम भ्रष्ट प्रतिमा की तरह कलंकित, अभिशापित... अभिशापित... अभिशापित... हो।’

एकाएक झोंपड़े के कोने में पड़ा वह गट्ठर हिला और उसमें से एक मुख-एक स्त्री-मुख, बाहर निकल आया। एक चिन्तित, स्नेह-प्लावित स्वर ने पूछा, ‘‘भइया, क्या सोच रहे हो? अब सो जाओ।’’

वह व्यक्ति चौंका और उस गट्ठर की ओर देखकर क्षण-भर चुप खड़ा रहा। फिर उसने कहा -उसकी वाणी में वेदना और प्रेरणा का विचित्र सम्मिश्रण था, ‘‘यहाँ आओ।’’

वह कपड़ों की गट्ठर उठाकर और पास आया। उसने स्नेह-भाव से एक हाथ उस व्यक्ति के कन्धे पर रख दिया और बोला, ‘‘क्या है, लियांग?’’

‘‘देखो, शै-वा, हम विश्वास के योग्य नहीं समझे गये और इसी से मैं क्रुद्ध होकर यहाँ चला आया हूँ; पर यह अविश्वास असह्य है। मैं तुम्हारे आगे इस आग को साक्षी करके प्रण करता हूँ कि अपने को विश्वास के योग्य सिद्ध करूँगा, नहीं तो-नहीं तो - अपने देश न लौटूँगा - न अपना ही नाम धारण करूँगा। और शै-वा, तुम मेरी एकमात्र सहायक होगी...’’

शै-वा ने अपना सिर धीरे से लियांग के कन्धे पर रख दिया, कुछ उत्तर न दे सकी।

कहीं से रोने का अत्यन्त अस्फुट स्वर सुन पड़ा...।

थोड़ी देर में आग बुझ गयी।

2

हांकाउ नगर में अन्धकार फैला था। नगर के मुख्य चौक में बहुत भीड़ थी। स्त्री-पुरुष, बच्चे एकत्र हो रहे थे... और बीच में कहीं-कहीं, कीच से लथपथ फटी वर्दियाँ पहने, कुछ सशस्त्र और अनेक निहत्थे सैनिक चिल्ला रहे थे।

दूर क्षितिज के ऊपर मलिन-सी लाल ज्योति थी, और उसमें से धुएँ के पहाड़-से उठ रहे थे। आकाश में काले-काले बादल छाये थे, कभी-कभी कोई भूखे शेर की तरह गुर्रा उठता था। हवा नहीं चल रही थी; किन्तु वातावरण में मानो दबी हुई विद्युत के कम्पन का अनुभव होता था और नागरिकों की वह भीड़ चिन्तित होकर उस लाल दीप्ति की ओर देख रही थी। सैनिक चिल्ला रहे थे, ‘‘वह है हमारा संकेत! क्रान्ति! क्रान्ति!’’ चौक के आस-पास के घरों से शोर हो रहा था, ‘‘मारो! मारो! भूखी प्रजा की जय हो!’’

किन्तु प्रजा? निःस्तब्ध खड़ी थी... वह केवल चिन्तित दृष्टि से उस रक्त-संकेत की ओर देख रही थी। उसका पूरा आशय उसके उन्मत्त मस्तिष्क के अन्दर अभी तक नहीं समा पाया था। बादल गरज रहे थे, अग्नि का क्षीण ‘धू-धू’ शब्द सुन पड़ रहा था, वातावरण काँप रहा था, सैनिक क्रान्ति का आह्वान कर रहे थे, पर प्रजा... प्रजा एक बुझी चिता की तरह, एक मूर्च्छित कामना की तरह, फ़ालिज मारे जड़मति मस्तिष्क की तरह एक निराकार, निरीह, संज्ञाहीन, किन्तु अशान्ति से उत्क्षिप्त प्रेत की तरह विमूढ़, निस्तब्ध खड़ी थी।

किन्तु उस निराकार शून्य से कोई भावना जानने को हो रही थी, उस मृत सागर में कोई निश्चय प्रस्फुटित हो रहा था। फौलाद की तरह अभेद्य उस खोपड़ी में व्यथा-ज्योति की किरण धीरे-धीरे प्रविष्ट हो रही थी।

फ़ौलाद की तरह वह तन्द्रा सहसा टूट गयी - अन्तर्दीप्ति सहसा धधक उठी! पुरुष जागे, स्त्रियाँ जागीं, श्रमिक जागे, नागरिक जागे, सोता हुआ एक समूचा राष्ट्र सहसा जाग उठा और गरजा, ‘‘क्रान्ति!’’

वह निरुद्देश्य समुद्र एकाएक किसी अदृष्ट प्रेरणा से एक ओर उमड़ पड़ा - उसी लाल दीप्ति की ओर!

चौक खाली हो गया! केवल एक ओर एक दुकान के आगे, दस-बारह व्यक्ति रह गये। उनके मुख पर चिन्ता थीं और साथ ही किसी महान् उद्देश्य की आभा भी, और वे धीरे-धीरे बातें कर रहे थे।

एक कह रहा था, ‘‘बन्धुओ, क्वोमिङताङ की यह सभा, आज एक महत्त्वपूर्ण कार्य का निर्णय करने को सम्मिलित हुई है। आप जानते ही होंगे कि लियांग चिचाओ - जिनकी विद्वता और सद्बुद्धि पर हमें इतना आशाएँ थीं, आज के कार्य के लिए...’’ यह कहते हुए उसने लाल दीप्ति की ओर इंगित किया - ‘‘संचालक नियुक्त किये गये थे। किन्तु कुछ दिनों से यह प्रतीत हो रहा था कि वह काम समुचित रूप से नहीं करते। पिछली सभा में इसकी आलोचना भी हुई थी...।’’

श्रोता उत्सुक होकर सुन रहे थे। एक बोल उठा, ‘‘उन पर जो आक्षेप किया गया था, वह अनुचित था। वह सर्वथा-’’

पहला ही व्यक्ति अधिकारपूर्ण स्वर से फिर बोला, ‘‘आप ध्यान से सुनें, मुझे रोकें नहीं।’’ दो-तीन और व्यक्ति भी बोले, ‘‘प्रधान की बात सुनो!’’

‘‘उस समय कुछ लोगों के मन में यह भाव था - अब भी है - कि लियांग का कथन ठीक था और इस कार्य का उपयुक्त अवसर नहीं आया था। किन्तु अब जो नयी घटना हुई है, उससे प्रतीत होता है...’’

‘‘क्या? क्या?’’

‘‘कि आक्षेप झूठा नहीं था। लियांग कल सन्ध्या से लापता हैं, उनकी बहिन भी! कहा जाता है कि वे मंचूरिया की ओर भाग गये हैं।’’

जिस व्यक्ति ने आक्षेप किया था, वह बोला, ‘‘सच?’’ - फिर सिर झुकाकर बैठा रहा।

क्षण-भर तक कोई नहीं बोला। फिर प्रधान ने कहा, ‘‘जो कायर सिद्ध होते हैं, विश्वास के अपात्र होते हैं, उनकी विद्वत्ता किस काम की? उनके लिए दुख या संवेदना न होनी चाहिए। वे राष्ट्र के शत्रु हैं, राष्ट्र की आह उन्हें लगेगी, अभिशाप की तरह मृत्यु-पर्यन्त उनका पीछा करेगी...’’

किसी ने कहा, ‘‘हमें अपने बन्धुओं को सूचित कर देना चाहिए।’’

सब बोल उठे, ‘‘हाँ! अवश्य।’’

वर्षा होने लगी। सब लोग उठ खड़े हुए। प्रधान ने कहा, ‘‘मैं सूचना दे दूँगा।’’

लोग चले गये, केवल प्रधान वहाँ खड़ा रह गया। एक बार चारों ओर देख कर विचारपूर्ण स्वर से वह बोला, ‘‘लियांग, लियांग, कितना भीषण कार्य मैं कर रहा हूँ; पर मैं बाध्य हूँ - क्या करूँ? तुम मेरे मित्र थे, पर मैं क्रान्ति का दास हूँ। और शै-वा! शै-वा! तुम एक कायर की बहिन थीं, नहीं तो - नहीं तो अब क्रान्ति के... अभिशाप के आगे मैं...’’

दूर पर एक धड़ाका हुआ। वह लाल दीप्ति एकाएक फटकर आकाश में बिखर गयी, क्षण-भर आकाश धधकते हुए लाल तारों से भर गया; फिर अन्धकार, बादलों की गुर्राहट, प्रजा का कोलाहल...।

क्रान्ति के उपकरण...।

‘‘बहिन, तुमने सुना?’’

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘युवान शिकाई को सम्राट् ने वापस बुला लिया है, और राष्ट्र का सेनापति नियुक्त किया है।’’

प्रातःकाल का समय था। जापान के सुन्दर प्रदेश में, फूजीयामा की छाया में, सारा गाँव मानो सुख-स्वप्न ले रहा था। बाल-रवि की किरणों में फूलों के समुद्र हँस रहे थे। दूर के घरों के प्रांगण में कहीं-कहीं मयूरों के जोड़े धीरे-धीरे आपस में चोंच रगड़ कर अपना स्नेह व्यक्त कर रहे थे।

किन्तु उस घर का रूप और घरों से भिन्न था। वह कच्चा था और उसका प्रांगण बहुत छोटा-सा और पुष्पविहीन था। घर स्वच्छ था; किन्तु उसमें कहीं भी अलंकार का कोई चिह्न न था।

प्रांगण में दो व्यक्ति खड़े थे। दोनों साधारण श्रमिकों के कपड़े पहने थे, और पुरुष के हाथ में एक बेंत-सा था, जिसका सहारा लेकर वह खड़ा था। पास में ही वह स्त्री खड़ी थी, उसके हाथ मिट्टी में सने थे, उसके मुख पर विचारशीलता का भाव था।

कुछ रुककर वह बोला, ‘‘मालूम होता है अब सम्राट् का पतन शीघ्र ही हो जाएगा।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘जब एक व्यक्ति अविश्वसनीय कहकर निकाल दिया जाय, तब उसे अकारण बुलाना कमजोरी है।’’

‘‘हाँ - और भी समाचार है।’’

‘‘क्या?’’

‘‘हांकाउ में घोर संग्राम हो रहा है; किन्तु क्रान्तिकारी पीछे हट रहे हैं। और - और उनके प्रधान वू सुंग लापता हो गये हैं।’’

‘‘वू सुंग लापता? वू सुंग... तब क्या क्रान्तिकारी हार जाएँगे?’’

पुरुष ने मुट्ठियाँ बाँधते हुए कहा, ‘‘यह नहीं होगा! लीना, लीना, हम यहाँ बैठे नहीं रह सकेंगे... चलो चलें, हम भी...’’

‘लेकिन - लेकिन - हम... क्या कर सकते हैं?’’

दोनों के सिर सहसा झुक गये। उसी समय घर के भीतर से किसी ने पुकारा, ‘‘आज क्या काम में खाना-पीना भी भूल गये?’’ दोनों व्यक्ति चौंके और अन्दर चले गये।

अन्दर उस कमरे में तीन व्यक्ति और बैठे थे - एक वृद्ध, एक युवक और एक युवती - उनके चहरों के साम्य से प्रतीत होता था कि वे पिता और सन्तान हैं।

काशेई, जो बाहर से आया था, आते ही बोला, ‘‘आज बहुत-से नये समाचार हैं।’’

वृद्ध और दोनों सन्तान उत्सुक होकर बोले, ‘‘क्या?’’

काशेई ने अपना वृत्तान्त सुना दिया। सुनने में सब लोग इतने तन्मय थे कि सामने पड़ी हुई चाय की ओर किसी का भी ध्यान नहीं गया।

वृद्ध ने रहस्यपूर्ण मुद्रा से कहा, ‘‘दरवाजा बन्द कर दो।’’ काशेई किवाड़ बन्द करते हुए बोला, ‘कहो दादा तुंगफू, क्या है?’’

वृद्ध धीरे-धीरे बोला, ‘‘मैंने पता लगा लिया है।’’

‘‘क्या? क्या? कब?’’

‘‘डॉक्टर टोकियो में ही हैं। और उनकी पत्नी...’’

चारों श्रोता व्यग्रता से बोले, ‘‘हाँ-हाँ...’’

‘‘बीमार हैं, इसलिए वापस नहीं जा सकते। वे शीघ्र ही जाने का प्रबन्ध कर रहे हैं।’’

काशेई ने एक बार अपनी बहिन की ओर भेद-भरी दृष्टि से देखा। आँखों में ही कुछ बात हुई, फिर बहिन ने सम्मतिसूचक सिर हिला दिया।

काशेई बोला, ‘‘दादा, मुझे पता बता दो, मैं उनसे मिलूँगा।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘दादा, तुम सब-कुछ जानते हुए भी पूछते हो? मैं चीन जाना चाहता हूँ। वहाँ हमारी ज़रूरत है, वहाँ क्रान्तिकारी...’’

आवेश में आकर काशेई चुप हो गया। फिर उसकी बहिन बोली, ‘‘दादा, हम यहाँ आ गये हैं; किन्तु अब देश से अलग रहना असम्भव है। विशेष कर जब देश संकट में हो... लेकिन हम यहाँ ऐसे फँसे हैं। एकदम अजनबी हैं। कभी शहर में जाना पड़े तो आफत आ जाती है। कभी-कभी सोचती हूँ, अगर आप न होते तो...’’

‘‘वाह लीना! तुम भी कैसी बातें करती हो...’’

युवक बोला, ‘‘पिता! बहिन ठीक कहती है। हम तो यहाँ बस गये हैं, यहाँ रहकर काम चला लेते हैं; किन्तु ये नये आये हैं, क्रान्ति के दिनों में तो यहाँ सरकार इन पर सन्देह करेगी। और ये वापस भी नहीं जा सकेंगे। इनको मिलाकर बात कर लेनी चाहिए। डॉक्टर अनुभवी आदमी हैं, कुछ तो बतायेंगे ही।’’

वृद्ध ने कुछ सोचकर कहा, ‘‘ठीक कहते हो बेटा!’’ फिर अपनी पुत्री की ओर उन्मुख होकर बोला, ‘‘ता, जा, मेरे कागज़ उठा ला।’’ ‘ता’ गयी और कुछ कागज ले आयी। वृद्ध उन्हें देखकर धीरे-धीरे काशेई से बातें करने लगा। लीना और ‘ता’ उठकर वहाँ से चली गयीं।

टोकियो नगर की रंग-बिरंगी रोशनियों में काशेई चुपचाप चला जा रहा था। आज उसके शरीर पर वे श्रमिक के वस्त्र नहीं थे। वह विलायती ढंग का सूट पहने हुए था, और उसके हाथ में एक छोटा-सा बेंत था।

लोग उसके मुख की ओर देखते, फिर उसके वस्त्रों की ओर, फिर मुँह फेर कर मुस्करा देते। वह किसी की ओर देखता नहीं था; किन्तु किसी अज्ञात शंका से उसे इस बात का अनुभव होता और वह लज्जित-सा होकर बढ़ चलता।

वह सड़क ऐसी नहीं थी जिस पर रात के समय कोई भी भद्र पुरुष जाता हो; क्योंकि वहाँ पर पुरुषों की ‘सभ्यता’ रात्रि में नग्न तांडव करती थी। काशेई एक गली में हो लिया। कुछ दूर चलकर वह किवाड़ के आगे रुक गया। उसने ध्यान से किवाड़ पर लिखे हुए नम्बर को देखा, और फिर उसे खटखटाने लगा।

अन्दर से किसी ने कहा, ‘‘आता हूँ।’’

किवाड़ खुला। नाटे-से पुरुष ने आकर पूछा, ‘‘कहिए।’’

‘‘मुझे डॉक्टर सुन वेन से मिलना है।’’

उसने तीव्र दृष्टि से काशेई की ओर देखकर पूछा, ‘‘आपका नाम?’’

‘‘मैं उनके लिए पत्र लेकर आया हूँ। उसे पहुँचा दो!’’ - कहकर काशेई ने पत्र दे दिया।

किवाड़ बन्द हो गया। थोड़ी देर बाद फिर खुला और उसी व्यक्ति ने आकर कहा, ‘‘आइए।’’

काशेई आगे हो लिया। किवाड़ फिर बन्द हो गया। दोनों अँधेरे में धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।

वह कमरा बहुत बड़ा नहीं था। एक कोने में छोटा-सा लैम्प जल रहा था और उस पर रंगीन कागज़ का शेड लगा था। लैम्प के आगे ही चारपाई पर एक स्त्री लेटी थी, और पास ही एक प्रौढ़ पुरुष खड़े थे। काशेई ने उन्हें देखते ही पहचान लिया और बोला, ‘‘डॉक्टर सुन!’’

डॉक्टर ने घूमकर गम्भीर स्वर में पूछा, ‘‘आपको तुंगफू ने भेजा है?’’

‘‘हाँ!’’

‘‘कहिए।’’

‘‘मैं आपके पास आदेश प्राप्त करने आया था। मैं वापस जाकर...’’

‘‘आप कहाँ से आये हैं? पहले आप क्या करते थे?’’

काशेई ने बहुत देर तक कोई उत्तर नहीं दिया, सिर झुकाए खड़ा रहा। फिर बोला, ‘‘खेद है कि मैं आपकी बात का पूरा उत्तर नहीं दे सकता। इतना ही कह सकता हूँ कि मैं चीन का उच्छिष्ट हूँ और मेरा कोई नाम या घर नहीं है।’’

डॉक्टर ने कुछ अचरज से काशेई की ओर देखा और फिर बोले, ‘‘तो आप मुझसे किस सहायता की आशा करते हैं?’’

‘‘मैं चीन लौट जाना चाहता हूँ। अगर आप इस कार्य में मेरी सहायता कर सकें तो।’’

‘‘धन द्वारा?’’

‘‘नहीं, यात्रा का प्रबन्ध। मैं अजनबी हूँ।’’

डॉक्टर गम्भीर होकर कुछ देर सोचते रहे, फिर बोले, ‘‘देखिए, आप मुझे अपने विषय में कोई बात बताने को तैयार नहीं, तुंगफू ने भी इतना ही लिखा है कि आप चीन से आये हैं और विश्वस्त हैं; किन्तु उसे भी आपकी पूर्व-कथा नहीं मालूम है। ऐसी दशा में... मैं आपकी केवल आर्थिक सहायता कर सकता हूँ। आप बुरा न मानें हम सहसा अपने को जोखिम में नहीं डाल सकते।’’

काशेई ने फिर सिर झुका लिया। थोड़ी देर बाद बोला, ‘‘आप ठीक कहते हैं। मैं भी क्रान्तिकारी हूँ। और स्वयं इस बात को जानता हूँ... अच्छा अनुमति दीजिए, मैं जाता हूँ।’’

‘‘आर्थिक सहायता करने को मैं...’’

‘‘नहीं, ऐसा दशा में आपको किसी प्रकार की सहायता नहीं करनी चाहिए। मैं स्वीकार भी नहीं कर सकता।’’

डॉक्टर कुछ देर खड़े उधर ही देखते रहे जिधर काशेई गया था। फिर शय्यारूढ़ स्त्री से बोले, ‘‘यह व्यक्ति चरित्रवान् जान पड़ता था, अवश्य ही कभी सफल होगा। किन्तु अभी नहीं, अभी नहीं...।’’

इसी समय उस नाटे भृत्य ने प्रवेश किया। डॉक्टर ने कहा - ‘‘काओटी! हमें इस स्थान से हट जाना चाहिए। कौन जाने...।’’

शय्यारूढ़ स्त्री की मुख-मुद्रा खिल उठी। उसने कहा - ‘‘...घर... घर’’ - और फिर चुप हो गयी।

3

‘‘लीना? क्या सोच रही हो?’’

लीना ने चौंककर कहा, ‘‘कुछ नहीं!’’ - किन्तु उसके विषादपूर्ण मुख पर एक हल्की-सी लाली दौड़ गयी।

ताकिफ़ू ने बड़े आग्रह से फिर पूछा, ‘‘कुछ तो अवश्य सोच रही थी!’’

लीना फिर क्षण-भर संकोच करके बोली, ‘‘मैं अपने देश की बात सोच रही थी। ...हमारे एक योग्य नेता थे वू सुंग - वह न जाने कहाँ लापता हो गये हैं...।’’ - कहते-कहते लीना रुक गयी।

उसने फिर पूछा, ‘‘लीना, यह वू सुंग कौन हैं?’’

‘‘कौन हैं से तुम्हारा क्या अभिप्राय है, ता? वह हांकाउ में एक कॉलेज के प्रोफेसर थे।’’

‘‘नहीं, लीना! मेरी ओर देखो। जो मैं पूछती हूँ, उसका जवाब दो!’’

‘‘क्या?’’

क्षण-भर ता लीना की आँखों की ओर देखती रही। फिर बोली, ‘‘लीना, जो मैं समझती हूँ, वह ठीक है न?’’

लीना ने फिर धीरे-धीरे सिर झुका लिया। थोड़ी देर बाद बोली, ‘‘नहीं।’’

ता ने हँसकर कहा, ‘‘नहीं तो जाने दो। मैं समझ तो गयी ही।’’

इसी समय प्रांगण के फाटक से आवाज़ आयी, ‘‘लीना! ताकिफ़ू! किवाड़ खोलो!’’

ता ने फाटक खोला तो काशेई अन्दर आ गया। उसका मुख देखकर लीना ने चिन्तित स्वर से पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘कहता हूँ।’’ - कहकर काशेई चुप हो गया और उसकी ओर देखने लगा। ता संकेत समझ गयी और बोली, ‘‘पिताजी अन्दर प्रतीक्षा कर रहे होंगे, मैं जाती हूँ।’’ - यह कहकर वह चली गयी।

‘‘लीना! लीना! वह हुआ जिसका भय था।’’

‘‘क्या?’’

‘‘डॉक्टर साहब ने पूछा, तुम कौन हो? कहाँ से आये हो? मैंने कोई उत्तर नहीं दिया।’’

‘‘फिर?’’

‘‘फिर क्या? उन्होंने वही किया जो ऐसी दशा में हम करते। जवाब दे दिया।’’

‘‘फिर? अब क्या करना होगा?’’

‘‘अब कहीं से सहायता की आशा करना व्यर्थ है। यहाँ भी अधिक देर नहीं रहना चाहिए -तुंगफ़ू ने हमारा इतना सत्कार किया है, पर उसके पास भी तो हमारे पक्ष में कोई प्रमाण नहीं है... हमें अपने पैरों खड़े होना होगा...।’’

‘‘तो फिर कोई उपाय सोचा है?’’

बहुत देर चुप रहकर काशेई बोला, ‘‘एक सोचा तो है; पर...।’’

‘‘पर?’’

‘‘शायद तुम उसे उचित न समझो!’’

‘‘फिर भी कहो तो?’’

काशेई लीना के पास आकर खड़ा हो गया और उसेक दोनों कन्धों पर हाथ रखकर कहने लगा, ‘जब मैं डॉक्टर के यहाँ से चला आ रहा था तब शहर में इश्तिहार बँट रहा था, उसकी एक प्रति मैं भी ले आया हूँ।’’ उसने जेब से एक पत्र निकाला और लीना के हाथ में दे दिया। लीना ने उसे धीरे-धीरे पढ़कर कहा, ‘‘मैं इसका और अपने कार्य का कोई सम्बन्ध नहीं समझती।’’

काशेई बोला, ‘‘लीना! जापान-सरकार को चीन में भेजने के लिए जासूस चाहिए। हम चीन के उच्छिष्ट शायद इस काम के योग्य हो सकेंगे। सरकार हमें चीन पहुँचा देगी। फिर...’’

‘‘लेकिन फिर हम निकल नहीं पाएंगे और फिर निकल भी गये तो कहाँ आश्रय मिलेगा?’’

‘‘क्रान्ति में किसे किसका आश्रय? कहीं लड़ लेंगे, अगर जीत गये तो आश्रय मिल ही जाएगा, अगर हार गये तो फिर आश्रय को करना ही क्या है?’’

लीना एक विषादपूर्ण मुस्कान से बोली, ‘‘यह तो ठीक है; किन्तु अगर कुछ कर लें तो अच्छा ही है।’’

‘‘और क्या कर सकते हैं।?’’

‘‘तुंगफू की सम्मति क्यों न ली जाय?’’

‘‘वह शायद इसका विरोध करेंगे।’’

‘‘निर्णय तो हमारे ही हाथ में है। उनकी बात सुनकर भी हम जो उचित समझें कर सकते हैं।’’

‘‘जैसा कहो।’’

क्षण-भर दोनों चुप रहे। फिर लीना ने बड़े कोमल स्वर में पूछा, ‘‘भैया, सफल होने की कोई आशा भी है?’’

न जाने काशेई ने क्या उत्तर दिया, उत्तर दिया भी या नहीं। सान्ध्यरवि की अन्धकार-मिश्रित लालिमा में काशेई का मुख स्पष्टतया नहीं दीखता था और पक्षी-रव के कारण कुछ सुन भी नहीं पड़ता था। अगर उसने कोई उत्तर दिया भी तो वह प्रकृति की चित्र-विचित्र विशालता में कहीं खो गया, जैसे शून्य के प्रवाह में अनेकों जीवनियाँ खो जाती हैं।

4

क्रान्ति की उपमा प्रलय से देते हैं। किन्तु क्रान्ति की लपट के बीत जाने के बाद जिस प्रकार एक समूचा देश भग्न-जीवनियों से, उत्पाटित सम्बन्धों से, दीन, जीर्ण, भूखे, आहत, निराश मानव-स्तूपों से भर जाता है, उसकी उपमा प्रलय में कहाँ है? उस जीवित व्यथा-सागर के आगे प्रलय की अखंड निस्तब्धता क्या रह जाती है?

पेकिंग में आतंक छाया हुआ था। क्रान्ति की लपट पेकिंग तक नहीं आयी थी। हांकाउ से परास्त होकर नानकिंग की ओर चली गयी थी; किन्तु फिर भी पेकिंगमें आतंक छाया हुआ था। जिस निर्दयता से युवन शिकाई ने उपद्रवों का दमन किया था, जिस प्रकार क्रान्तिकारियों के सिर काट-काटकर नगरों और गाँवों की गलियों में लटका दिये गये थे; उसकी कथाएँ सुनकर ही पेकिंग की आलस्य प्रिय, सुखपालित प्रजा के प्राण सूख गये थे और आज वही युवान शिकाई राष्ट्र-सचित होकर पेकिंग में प्रवेश कर रहा था। चीन की बागडोर एक उच्छृंखल साहसिक के हाथों दी जा रही थी। प्रजा दिन गिन रही थी कि कब सुन यात सेन लौट आएँ। चारों ओर लोग कह रहे थे? ‘‘डॉक्टर सुन वेन आ रहे हैं! डॉक्टर सुन वेन आ रहे हैं! चीन के उद्धारक आ रहे हैं!’’ किन्तु प्रतीक्षा के ज्वर में प्रलाप कर रही प्रजा को कोई विश्वस्त सूचना नहीं मिलती थी।

बिजली गिरने से पहले वातावरण की जैसी दशा होती है, उत्तप्त, कम्पायमान अव्यक्त अशान्ति से पूर्ण पेकिंग का वातावरण वैसा ही हो रहा था। पर बिजली - बिजली अभी गिरी नहीं थी, और आकाश आच्छन्न जी नहीं प्रतीत होता था।

फिर एकाएक ज्वालामुखी के विस्फोट की तरह समाचार आने लगे, ‘‘युवान शिकाई के मुख्य सहायक टैंक शाओ द्रोही हो गये।’’ ‘‘डॉक्टर सुन वेन आ गये!’’ ‘‘युवान शिकाई ने क्रान्तिकारियों से सन्धि कर ली।’’ प्रजा उद्भ्रान्त होकर सोचती ही रह गयी कि किसका विश्वास किया जाय और किसका नहीं।

मध्याह्न का समय था; किन्तु पेकिंग की गलियों में अन्धकार था। एक गली में होकर एक पुरुष चला आ रहा था और उसके पीछे-पीछे एक स्त्री। दोनों के मुख उदास; किन्तु सशंक थे, और वे बड़ी तेज गति से युवान शिकाई के महल की ओर अग्रसर हो रहे थे।

पुरुष ने धीरे से अपनी सहगामिनी से कहा, ‘‘लीना! युवान शिकाई के अधीन होकर न जाने क्या-क्या करना पड़ेगा!’’

लीना बोली, ‘‘सम्भव है... किन्तु अपना स्थान सुदृढ़ करके हम क्रान्ति की रक्षा कर सकेंगे।’’

काशेई ने विचारपूर्ण स्वर में कहा, ‘‘लीना, अगर हमें कोई पुराने मित्र मिल गये तो...’’

‘‘भैया, अब इधर-उधर की सम्भावनाएँ सोचने का समय नहीं है! अपना ध्येय-अपना ध्येय... बस...’’

5

‘‘राष्ट्रपति युवान की जय!’’

युवान शिकाई के महल का विस्तृत प्रांगण प्रजागण की भीड़ से भरा हुआ था। चारों ओर महल की अटारियों पर युवान की सेना के अफ़सर और अन्य सहायक बैठे हुए थे। इन्हीं में एक ओर काशेई और लीना भी बैठे थे। दोनों विलायती कपड़े पहने हुए थे और उनकी टोपी माथे पर खिंची हुई थी, जिससे उनका मुख स्पष्ट नहीं दीख पड़ता था।

प्रांगण के मध्य में एक ऊँचे मंच पर युवान शिकाई बैठा था। उसके चारों ओर अन्य राज्याधिकारी खड़े थे। सब लोगों की आँखें इसी मंच की ओर लगी हुई थीं।

काशेई को अनुभव हुआ, लीना बड़े ज़ोर से उसकी भुजा को दबा रही है। उसने लीना के मुख की ओर देखा। लीना एकाग्र होकर मंच पर खड़े किसी व्यक्ति की ओर देख रही थी। काशेई ने उसकी दृष्टि का अनुसरण किया।

काशेई भी चौंककर बोला, ‘‘लीना! लीना! यह तो वू सुंग हैं।’’

लीना के विस्फारित नेत्रों में आँसू आ गये थे, वह कुछ बोल नहीं सकी, केवल मन्त्र-मुग्धा की तरह उस व्यक्ति की ओर देखती रह गयी।

शायद उनकी दृष्टि की तीक्ष्णता उसके अन्तस्तल में चुभ गयी। उसने भी आँख उठाकर देखा और देखता ही रह गया। उसके मुख से दो-चार अस्फुट शब्द ही निकल पाये - फिर उसने घृणा से मुँह फेर लिया। लीना और काशेई ने भी सिर झुका लिया और जब तक उत्सव होता रहा, इसी प्रकार बैठे रहे। आत्म-विस्मृति की मात्रा इतनी बढ़ गयी थी जब उत्सव समाप्त होने पर राष्ट्रपति युवान का जयघोष हुआ, तब वे उसमें भाग लेना भी भूल गये।

6

‘‘काशेई! मुझे मालूम हुआ है कि युवान शिकाई का मुख्य सहायक यह टैंगशाओ ही है। सुना है कि वह वास्तव में प्रजातन्त्रवादियों से सहानुभूति रखता है, पर जहाँ तक मैं जानती हूँ, वह युवान का आदमी है।’’

‘‘वह है कौन? कुछ मालूम हुआ?’’

‘‘नहीं। जब युवान हांकाउ से लौटा, तब यह व्यक्ति उसके साथ आया। उससे पहले यह कौन था, कहाँ से आया, कोई नहीं जानता।’’

‘‘फिर! वह रहता कहाँ है, जानती हो?’’

‘‘हाँ, मैं पूरा पता लगा लायी हूँ। उसके घर के रास्ते, उसका शयनागार इत्यादि सब...’’

‘‘अच्छी बात है, तो अब...’’

‘‘भइया, मैं यह सोच रही हूँ कि इस प्रकार का काम करने से हानि होगी।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘अगर हम पकड़े गये तो युवान को क्या उत्तर देंगे?’’

‘‘युवान का स्वयं ऐसा सन्देह है कि टैंग की सहानुभूति क्रान्तिकारियों से भी है। हमारे कहने पर...’’

‘‘एक और बात है।’’

‘‘क्या?’’

‘‘यह काम कौन करेगा?’’

‘‘मैं!’’

‘‘नहीं। इसे मेरे हाथ सौंप दो।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘मैं वहाँ का पूरा पता जानती हूँ, तुम वहाँ अनभिज्ञ होगे। और...’’

‘‘और क्या?’’

‘‘कुछ नहीं, इतना ही पर्याप्त है।’’

काशेई ने लीना का हाथ थामकर कहा, ‘‘लीना, तुम मुझसे कुछ छिपा रही हो?’’

लीना ने सिर झुका लिया।

काशेई ने बड़े आग्रह से पूछा, ‘‘लीना बताओगी नहीं?’’

लीना सिर झुकाये ही बोली, ‘‘मुझे तुम्हारे अनिष्ट की कल्पना बार-बार होती है, न जाने क्यों?’’

‘‘नहीं लीना, यह सब नहीं है।’’

लीना बहुत देर तक फिर चुप रही। फिर शीघ्रता से कहने लगी, ‘‘मुझे टैंग के व्यक्तित्व के बारे में कुछ मालूम हुआ है, वह तुम्हारा एक पुराना मित्र है। इसीलिए शायद तुम मोह में पड़कर...।’’

‘‘वह कौन है, लीना?’’

लीना ने क्षण-भर काशेई की ओर देखा, फिर बोली, ‘‘वू सुंग!’’

काशेई ने धीरे-से कहा, ‘‘तभी तो... तभी तो...’’

‘‘क्या?’’

‘‘कुछ नहीं। मैं समझ गया, पर तुमने मुझसे क्यों नहीं कहा?’’

‘‘वू सुंग तुम्हारे मित्र थे...’’

‘‘पर लीना, यहाँ मैत्री का प्रश्न नहीं हो सकता फिर तुम भी तो वू सुंग को...’’

‘‘भइया, उस बात को जाने दो! लेकिन यह काम मैं ही करूँगी।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘मुझे प्रतीत होता है कि इस काम में मैं अधिक दृढ़ हूँगी।’’

‘‘क्यों, लीना, तुम्हें मेरा विश्वास नहीं है।’’

‘‘है! पर...’’

‘‘पर क्या?’’

‘‘यह सब तर्क मैं नहीं जानती; मेरा मन कहता है और मैंने निश्चय कर लिया है... मेरा आग्रह रहने दो।’’

काशेई चुपचाप लीना की ओर देखता रहा, उसने ‘हाँ’ या ‘न’ कुछ भी नहीं कहा। किन्तु लीना ने समझ लिया कि काशेई उसका आग्रह नहीं तोड़ सकेगा।

7

दिन-भर की उड़ी हुई धूल से आकाश भर गया था और अपराह्न की धूप में पीला प्रतीत हो रहा था। नदी का चौड़ा, पाट, मन्थर-गति पीले जल के कारण ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पृथ्वी माता के शरीर पर किसी विराट फोड़े से पीप बही जा रही हो।

संसार में बसन्त का राज्य था; किन्तु चीन में अभी तक शिशिर की जड़ता छायी हुई थी। और स्थानों में रंगों की विचित्र छटा छा रही थी; किन्तु चीन मानो क्रान्ति-ज्वर के एक ही आक्रमण की भीषणता से पीला पड़ गया था।

पेकिंग के एक पीले-से घर में दस-बारह व्यक्ति सम्मिलित थे। कुछ ने युवान शिकाई की सेना की वर्दी पहनी हुई थी। सभी की मुख-मुद्रा रहस्य से भरी हुई थी, मानो वे किसी अत्यन्त गोपनीय विषय पर विचार कर रहे हों।

एक, जो कि अपनी मुद्रा से सम्मिलित व्यक्तियों का नेता जान पड़ता था, कह रहा था -‘‘बन्धुओ! उसके विषय में हमें शीघ्र ही निर्णय कर लेना चाहिए। वह विद्वान् है और उसमें प्रतिभा है, उसे हम भुला नहीं सकते...’’

एक सदस्य बोला, ‘‘टैंगशाओ, आप कोई क्रियात्मक मत भी तो दीजिए!’’

‘‘देश-द्रोह के प्रति हमारा क्या भाव हो सकता है?’’

‘‘लेकिन, उसके पास उसके द्रोही होने का क्या सबूत है?’’

‘‘मैं उसे बहुत देर से जानता हूँ। पहले उसके मेरे साथ काम किया था। और उसकी बहिन भी... उसकी बहिन...’’

‘‘उसकी बहिन क्या, वू सुंग?’’

किवाड़ धड़ाके से खुला। लोगों ने घूमकर देखा-एक चीनी गाउन पहने हुए एक सुन्दरी हाथ में पिस्तौल लिये खड़ी थी। उसके धधकते हुए अचल अनिमेष नेत्र टैंगशाओ की ओर घूर रहे थे।

उसने बिना टैंगशाओ के मुख से आँख हटाये फिर कहा - और उसकी वाणी में असि-धार-सा तीक्ष्ण तिरस्कार था।

‘‘उसकी बहिन क्या, वू सुंग?’’

वू सुंग हिला नहीं। धीरे-धीरे बोला, ‘‘उसकी बहिन भी विश्वासघातिनी थी।’’

‘‘वू सुंग, तुम झूठे हो! तुम्हें शर्म आनी चाहिए! तुम-एक क्रान्तिकारी दल का नेतृत्व छोड़कर एक क्रान्ति के शत्रु की दासता करनेवाले, एक वीर की प्रतिष्ठा पर झूठा लांछन लगानेवाले, उसकी हत्या का आयोजन करनेवाले, तुम किसी को विश्वासघाती कह सकते हो - तुम, जो कि स्वयं मित्रघाती, प्रणयघाती, देशघाती हो!’’

टैंगशाओ उसी प्रकार शान्त भाव से बोला, ‘‘मैं एक स्त्री की बोलियों का उत्तर नहीं देना चाहता। मैं जिस उद्देश्य से युवान की सेना में भरती हुआ था, उसे मैं नहीं जानता हूँ...’’

‘‘क्या उद्देश्य था, ज़रा मैं भी तो सुनूँ!’’

‘‘मैं तुम्हारे आगे जवाब देने को बाध्य नहीं हूँ। किन्तु इधर आओ, मैं तुम्हें दिखा देता हूँ... देखकर फिर अगर तुम लज्जा से डूब मरो, तो...’’

किसी ने पूछा, ‘‘यह वू सुंग कौन है?’’

किन्तु उस हलचल में मानो यह प्रश्न सुना ही नहीं गया।

वह स्त्री बेधकड़क आगे चली आयी। टैंगशाओ ने उसे एक दरवाज़े के पास ले जाकर दरवाजा खोल दिया। खोलते-खोलते बोला, ‘‘हम सब सशस्त्र हैं, तुम कहीं भाग नहीं सकतीं।’’

स्त्री ने दरवाजे पर पैर रखते ही देखा - सामने लगभग चालीस वर्ष का एक व्यक्ति खड़ा था। दरवाजे में टैंगशाओ को देखते ही वह बोला, ‘‘क्या है, टैंग?’’

स्त्री ने एक बार सिर से पैर तक उस व्यक्ति को देखा।

उसके अंग शिथिल पड़ गये, पिस्तौल उसके हाथ से गिर गया। उसने टूटे हुए स्वर में कहा, ‘‘डॉक्टर सुन...यात..सेन!’’ - और बैठ गयी।

टैंग ने पूछा, ‘‘अब क्या कहती हो?’’

कोई उत्तर नहीं मिला! टैंग ने कहा, ‘‘देश-द्रोही लियांग चिचाओ की बहिन - उर्फ लीना शेई, मैं तुम्हें प्रजातन्त्र के नाम पर बन्दी करता हूँ।’’

वह स्त्री हिली भी नहीं, सिर झुकाए बैठी गुनगुनाती रही - ‘‘वू सुंग, वू सुंग! मैं कुछ नहीं समझ पाती।’’

8

महल के एक बड़े कमरे में युवान शिकाई और काशेई बैठे हुए थे। उनके आगे मेज़ पर कुछ कागज़ पड़े थे। बात करते-करते युवान बार-बार उन्हें उठाकर पढ़ लेता था।

काशेई ने पूछा, ‘‘कहिए, और क्या आज्ञा है?’’

‘‘हाँ, अभी टैंगशाओ की बात बाक़ी रह गयी। मुझे उसके बारे में बहुत-से समाचार मिले हैं।’’

काशेई उत्सुकता से बोला, ‘‘क्या?’’

‘‘परसों जब वह लापता हो गया, तभी मैंने उसके पीछे चर भेजे थे। अब मालूम हुआ कि वह शंघाई में पहुँच गया है।’’

‘‘और कुछ?’’

‘‘हाँ! यह भी मालूम हुआ है कि वास्तव में हांकाउ में क्वोमिङताङ दल का प्रधान था - वू सुंग-जो वहाँ के बलवे के बाद लापता हो गया था। और...’’ काशेई प्रतीक्षा में चुप बैठा रहा। उसकी ओर देखकर युवान फिर बोला, ‘‘और यह भी मालूम हुआ कि उस दिन डॉक्टर सुन यात सेन छिपकर उसके घर में ठहरे थे।’’

‘‘सुन यात सेन! टैंगशाओ के घर में!’’

थोड़ी देर तक दोनों चुप रहे। फिर काशेई धीरे से बोला, ‘‘मुझसे गलती हुई...’’

‘‘क्या कहा?’’

‘‘कुछ नहीं, मैं अभी तक टैंगशाओ को आपका विश्वस्त व्यक्ति समझता था।’’

‘‘ग़लतियाँ सबसे होती हैं, लेकिन अब तुम्हारी क्या राय है?’’

काशेई चुप रहा। युवान फिर बोला, ‘‘मैंने शंघाई में अपने चरों को सूचना दी है। मालूम हुआ है कि उसने वहाँ पर सुंगचाओ जेन के नाम से घर लिया है और वहीं रहता है।’’

‘‘तो आप क्या करना चाहते हैं?’’

‘‘मैंने उन्हें लिख भेजा है कि उसका पता लगते ही उसे...’’

युवान ने एक कुटिल हँसी-हँसकर एक अँगुली धीरे से अपनी गर्दन पर फेर दी। काशेई चुपचाप देखता रहा।

युवान फिर बोला, ‘‘पहले मैंने एक और चाल सोची थी; पर शायद उसमें दे लगती, इसलिए...’’

‘‘वह क्या चाल थी?’’

‘‘मैंने सोचा था,’’ - युवान कुछ हिचकिचाते हुए बोला - ‘‘मैंने सोचा था कि तुम्हारी बहिन लीना वहाँ जाए और - और टैंग-यानी वू सुंग-को ...लीना बहुत सुन्दरी है। ...पर वह है कहाँ?’’

काशेई दूसरी ओर देखते हुए बोला, ‘‘वह बाहर गयी हुई है... नानकिंग में कुछ पता लगाने। वहाँ मालूम हुआ कि क्वोमिङताङ का एक बड़ा दल बन रहा है। पर यह तो बताइए, सू सुंग का निर्णय कब तक हो जाएगा?’’

‘‘तीन दिन में, या चौथे दिन अवश्य...।’’

काशेई बोला, ‘‘अच्छा, अब अनुमति दें, मैं जाकर काम देखूँगा।’’

‘‘अच्छा, पर लीना कब वापस आएगी?’’

काशेई बोला, ‘‘पता नहीं।’’ और जल्दी से बाहर चला गया।

बाहर आते काशेई ने एक लबी साँस ली और धीरे से बोला, ‘‘उफ़! कितना अन्तर है, कितना! लीना, तुम कहाँ हो? और मैं... मेरा सिर कैसा घूमता है...’

फिर वह धीरे-धीरे प्रांगण के द्वार की ओर चल दिया।

प्रांगण में शान्ति थी। भृत्यगण अपना-अपना काम करते चले जा रहे थे, किसी ने काशेई की ओर नहीं देखा। समृद्धि के कुछ ही दिनों में वे देशव्यापी क्रान्ति को भूल गये थे, फिर किसी एकाकी व्यक्ति के अन्तस्तल की क्रान्ति की ओर उनका ध्यान कैसे पहुँचता?

9

रात्रि...

गगन की नीलिमा धूल के सम्मिश्रण से मैली हो गयी थी। तारागण कहीं नहीं दीख पड़ते थे, केवल इधर-उधर कहीं-कहीं धुएँ के स्तम्भ खड़े हो रहे थे। वे इतने अचल खड़े थे कि भावना होती थी मानो धूसर आकाश को गिरने से उन्हीं ने थाम रखा हो।

आकाश के मध्य में एक बड़ा-सा पीला अस्फुट बिम्ब दीख पड़ता था; शायद यह धूल से आवृत चन्द्रमा का मुख था।

काशेई अपने घर के कमरे में तीव्र गति से चक्कर लगा रहा था - अंगीठी से मेज तक, मेज से किवाड़ तक, किवाड़ से फिर वापस अँगीठी की ओर। उसके हाथ अनियन्त्रित-से होकर खुलते और बन्द हो जाते थे। कभी-कभी वह चलते-चलते रुक जाता और एक हाथ की हथेली को दूसरे के घूँसे से पीटकर फिर और द्रुत गति से चलने लगता। कभी-कभी घड़ी की ओर देख लेता।

उसके शरीर पर कोट इत्यादि नहीं था। वह रेशमी कमीज़ पर ब्रिचिस पहने था, और उसके सिर पर एक बड़ा-सा रंगदार रूमाल बँधा था।

एकाएक वह रुक गया और क्षण-भर एकाग्र होकर कमरे के लैम्प की ओर देखता रहा। इतने समय में मानो उसके मुख पर से बादल हट गये हों, उसकी चिन्तन मुद्रा अब दृढ़ निश्चय में परिणत हो गयी थी।

उसने मानो लैम्प से कहा, ‘‘अपनी मूर्खता के प्रतिकार का और कोई उपाय नहीं है उसे बचाना है!’’ फिर शीघ्रता से मेज पर कुछ कागज़ उठाकर जेब में रखे। फिर मेज पर के दराज़ में से चमड़े के बटुओं में बन्द दो पिस्तौलें लेकर पेटी में खोंस ली। फिर उससने एक बार खिड़की से बाहर नगर की बत्तियों की ओर देखा और धीरे-धीरे बोला, ‘‘पेकिंग! मैं लीना को यहाँ खो चला हूँ, अब शंघाई में शायद स्वयं खो जाऊँगा; पर एक नामहीन पुरुष और उसकी बहिन की तुम्हें क्या परवाह है, तुम जो चवालीस करोड़ व्यक्तियों के प्राण हो।’’

फिर वह घूमा और खटाखट सीढ़ियों से नीचे उतर गया।

10

उस अस्पष्ट ज्योत्स्ना में पृथ्वी पीली-सी प्रतीत हो रही थी; आकाश भी पीला-पीला जान पड़ता था। दोनों के रंगों में इतनी समता थी कि क्षितिज का पता नहीं लगता था; यह भी नहीं जान पड़ता था कि कहाँ पृथ्वी की सीमा का अन्त और आकाश का प्रारम्भ होता है।

और उस विश्वव्यापी पांडुता में, स्वयं पीला-सा प्रतीत हो रहा है, किन्तु एक भीमकाय काले घोड़े पर सवार, काशेई शंघाई की ओर बढ़ा चला जा रहा था - उसकी आँखें पथ की ओर नहीं, अपने सामने शून्य में किसी स्थिर ध्रुव पर लगी हुई थीं।

नियति का प्रतिद्वन्द्वी, निराश न होते हुए भी निरीह, कामना-रहित होते हुए भी दुर्जेय...

शंघाई...

एक चौड़ी सड़क के दोनों और बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ थीं। सड़क पर ट्रामगाड़ियाँ दौड़ रही थीं और उनमें प्रत्येक देश और राष्ट्र के लोग चढ़-उतर रहे थे। किन्तु उस सड़क और उसके दोनों ओर की गलियों में शराबखानों और जुआ घरों की भरमार थी, और उनमें गन्दे, विकृत, रुग्ण व्यक्ति बैठे हुए थे। इन्हीं के ऊपरी मंज़िलों के छोटे-छोटे झरोखों में रंगे हुए चेहरोंवाली अनेकों स्त्रियाँ, उनके मुखों पर एक स्थिर, अचल मुस्कान चिपकी हुई थी और उनकी आँखों में कुम्भीपाक की बीभत्सता एक लालसापूर्ण आह्वान की ओट में नाच रही थी।

कवियों ने सन्ध्या का जो भी वर्णन किया है, शंघाई की सन्ध्या पर कोई भी लागू नहीं होता। पक्षियों का कूजन, आकाश की लालिमा, शान्ति और लवलीनता की अनुभूति-शंघाई में कुछ भी नहीं था। शंघाई की कृत्रिम और कर्कश रव से, कृत्रिम और कठोर प्रकाश से, कृत्रिम सुख और विषय-लिप्सा से भरी हुई थी। मनुष्य-रचित सभ्यता की विराट् चक्की में नैसर्गिकता पिस चुकी थी और उसकी धूल से अस्वाभाविक और बीभत्स लालसाओं की तृप्ति के लिए उपकरण तैयार किए जा रहे थे।

नैसर्गिकता के प्रेत के उस नृत्य-प्रांगण में रात्रि की प्रगति की ओर किसी का भी ध्यान नहीं था। ज्यों-ज्यों रात बीतती जाती थी, त्यों-त्यों बड़ी सड़क सूनी होती जाती थी, और उसका प्रकाश बुझता जाता था; किन्तु उन गलियों में प्रकाश बढ़ता जा रहा था, उनकी आकीर्णता भी बढ़ती जाती थी। उस प्रेत का नर्त्तन अधिक अनियिन्त्रत, उन्मत्त होता जा रहा था।

एकाएक उस बड़ी पक्की सड़क पर घोड़े की टाप सुनाई पड़ी-टप-टप! टप-टप! टप-टप!

एक भीमकाय घोड़े पर एक सवार... उसकी आँखों में उग्र तपस्या की और घोर संशय की छाया साथ-ही-साथ नाच रही थी। घोड़ा अवरुद्ध गति से चला जा रहा था, उसका और सवार का शरीर कीच में सना हुआ था, घोड़े के मुँह से फेन गिर रहा था, और कभी-कभी उसकी गर्दन एकाएक नीचे झुक जाती थी; किन्तु सवार लगाम को झटका देता और घोड़ा फिर सिर उठाकर दौड़ चलता। मालूम होता था उस सवार की अन्तर्दीप्ति उसे और उसके घोड़े को किसी बृहत् उद्देश्य से प्रेरित कर रही थी और वे बाध्य होकर बढ़े जा रहे थे। सवार के वक्ष पर जो पीतल का चिह्न था, वह कभी-कभी जगमगा उठता था, मानो आन्तरिक दीप्ति के प्रकोप की छाया उसमें झलक उठी हो।

वह सड़क इतनी सूनी थी कि किसी का ध्यान भी घुड़सवार की ओर आकृष्ट नहीं हुआ। जब वह उन प्रकाशमय गलियों को पार करके एक अँधेरी गली में घुसा, तब उसने देखा-एक कोने में छिपे हुए चार-पाँच व्यक्ति चौंके और फिर शीघ्र ही अन्तर्धान हो गये।

पर वह उनका अनुसन्धान करने के लिए नहीं रुका। कुछ आगे जाकर उसने एकाएक घोड़े की लगाम खींची और घोड़े के खड़ा होने से पहले ही कूदकर अलग हो गया। घोड़े ने दीनता से एक बार सवार की ओर देखा और फिर सिर उठाकर एक बार एक हिचकी ली और लड़खड़ाकर गिर गया।

सवार ने उसकी ओर भी नहीं देखा। वह एक ओर सीढ़ियाँ चढ़ गया और एक खुले किवाड़ पर पहुँचा। उसने धीरे से कहा, ‘‘शायद देर हो गयी है!’’ - और फिर दौड़कर अन्दर जा पहुँचा।

एक छोटे कमरे में एक दीया टिमटिमा रहा था। उसके अस्पष्ट प्रकाश में भूमि पर पड़ा हुआ खून से लथपथ एक शरीर और उसके सिरहाने खड़ी हुई एक श्वेत-वसना स्त्री दीख पड़ती थी - उसके हाथ शायद बँधे हुए थे।

काशेई दौड़ा हुआ आ रहा था, दरवाजे पर एकाएक रुक गया। बिजली से विक्षिप्त व्यक्ति की तरह एक बार उसने चारों ओर देखा, फिर भर्रायी हुई आवाज़ में बोला, ‘‘वू सुंग, मुझे देर हो गयी, और लीना! लीना! तुम...’’

उसका शरीर एकाएक ढीला पड़ गया, मुख पर से वह दीप्ति बुझ गयी - वह काँप कर आगे की ओर गिर पड़ा।

11

जब काशेई की आँखों खुलीं, तब प्रकाश हो रहा था। घर में बहुत भीड़ लग रही थी, और आलोचना का हुल्लड़ मचा हुआ था।

काशेई ने सिर कुछ एक ओर घुमाकर कहा, ‘‘लीना!’’

‘‘क्या है भैया?’’

‘‘कुछ नहीं, यह भीड़ क्या है?’’

लीना ने एक हाथ काशेई के मस्तक पर रख दिया, कुछ बोल नहीं सकी।

काशेई ने आँखें बन्द कर लीं।

किन्तु आलोचना बन्द नहीं हुई। कोई कह रहा था, ‘‘इसी ने खून किया है! इसी ने!’’

‘‘पर इसके तो सेना का बैज लगा हुआ है?’’

‘‘वह औरत कौन है?’’

‘‘तो क्या सैनिक खून नहीं करते?’’

‘‘यह युवान शिकाई का आदमी होगा।’’

‘‘वह ज़रूर इसकी प्रेमिका है।’’

लीना का हाथ काँप गया। काशेई चौंका और विकृत मुद्रा से बोला, ‘‘लीना, ये सब क्या बक रहे हैं?’’

उसने उठने का प्रयत्न किया; किन्तु एक आह भरकर रह गया, ‘‘कितना थक गया हूँ!’’

दर्शकों में से फिर एक कहा, ‘‘यह देखो, क्या है?’’

मेज पर से एक कागज उठाकर वह पढ़ने लगा - ‘‘लियांग चिचाओ, उर्फ़ काशेई, देशद्रोही...’’

काशेई का शरीर फिर हिला, वह उछलकर खड़ा हो गया और लीना का हाथ थामकर बोला, ‘‘चलो!’’

लीना चुपचाप उसके साथ हो ली। उसकी आकृति देखकर किसी को उन्हें रोकने का साहस नहीं हुआ। वे बाहर चले गये।

जब पुलिस वहाँ पहुँची तब उन दोनों की खोज आरम्भ हुई; किन्तु उनका कोई पता नहीं मिल सका।

12

‘‘शंघाई, मार्च, 1912

‘‘आज सवेरे छः बजे नगर की मुख्य सड़क के पास एक गली में एक सनसनी फैला देनेवाली घटना का पता चला है। कहा जाता है कि सुंगचाओ जेन नामक व्यक्ति के घर के बाहर एक मरा हुआ घोड़ा पाया गया, जिसे देखकर लोगों को कौतूहल हुआ और वे घर के भीतर चले गये। वहाँ सुंगचाओ का मृत शरीर पड़ा हुआ था और उसके पास एक स्त्री की गोद में एक और व्यक्ति बेहोश पड़ा था। लोगों के पहुँचने पर वे दोनों भाग गये। बहुत खोज करने पर भी इनका कोई पता नहीं चल सका। सुंगचाओ की हत्या तलवार से या कटार से की गयी मालूम होती है। उसके शरीर पर दस-बारह घाव हैं। मृत्यु का कारण उसके सिर का घाव बताया जाता है।

‘‘बाद की खबर :

‘‘सवेरे की घटना के विषय में बहुत-सी और बातों का पता चला है कि जिससे हत्या का निमित्त कुछ स्पष्ट होने लगा है। घर की तलाशी में जो काग़ज़ मिले, उनसे विदित होता है कि सुंगचाओ वास्तव में हांकाउ के क्रान्तिकारी दल क्वामिङ ताङ का नेता वू सुंग था, जो कि हांकाउ के उपद्रव के बाद से ही लापता हो गया था। यह भी मालूम हुआ है कि उसके बाद यह व्यक्ति टैंगशाओ के नाम से युवान शिकाई की सेना में भी रहा; किन्तु भेद खुल जाने पर भागकर शंघाई में आया और सुंगचाओ जेन के नाम से रहने लगा।

‘‘यह भी पता चला है कि जो स्त्री और पुरुष लापता हो गये, वे भी हांकाउ के ही हैं। पुरुष का असली नाम लियांग चिचाओ है जो कि हांकाउ की क्योमिङ ताङ से, वू सुंग के कहने पर निकाल दिया गया था। स्त्री इसकी बहिन थी। ये दोनों व्यक्ति भी युवान शिकाई की सेना में चर का काम करते थे। अनुमान किया जाता है कि पेकिंग में इस स्त्री ने वू सुंग की हत्या का प्रयत्न किया था, किन्तु सफल नहीं हुई और बन्दी करके यहाँ लायी गयी थी। यहाँ शायद क्रान्तिकारी उसके अभियोग का निर्णय करनेवाले थे। सुंगचाओ के घर से जो कागज मिले हैं, उनसे इस अनुमान की पुष्टि होती है।

‘‘अगर यह अनुमान सत्य है तो यह सम्भव है कि लियांग चिचाओ अपनी बहिन को छुड़ाने के लिए अथवा युवान की आज्ञा से शंघाई आया हो और सुंगचाओ की हत्या करके अपनी बहिन को ले गया हो। यह व्यक्ति पेकिंग से आया था, इसका सबूत घोड़े की गर्दन पर लगा हुआ पेकिंग-सेना का चिह्न है।

‘‘पुलिस अनुसन्धान कर रही है; किन्तु यहाँ यह भावना है कि युवान के कार्य में कोई अनुचित हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, क्योंकि विदेशी राष्ट्र उससे मित्र-भाव रखना चाहते हैं।’’...

13

सीक्यांग नदी में पानी बढ़ रहा था। वर्षा की बड़ी-बड़ी बूँदें जब नदी की सतह पर पड़तीं, तब नदी का पानी उछल पड़ता था, मानो उन बूँदों का स्वागत कर रहा हो।

नदी के किनारे, पतली कीच में, दो सवार सरपट चले जा रहे थे-एक पुरुष और एक स्त्री। दोनों के चेहरों पर व्यथा के भाव थे और उनके कपड़े अस्त-व्यस्त थे। स्त्री के केश खुले थे; किन्तु गीले और कीच में सने होने के कारण वे भारी हो गये थे और उस आँधी में इधर-उधर उड़ते नहीं थे, केवल कन्धे पर पड़े थे और घोड़े की गति के साथ उठते और गिरते रहते थे।

वे दोनों थे लियांग और शै-वा, किन्तु उनकी मुख-मुद्रा में कितना परिवर्तन आ गया था! इन छः मास के अनुभवों ने उनकी आकृति में अँधेर मचा दिया था, और वे एक-दूसरे का सम्बोधन भी किसी नये नाम से कर रहे थे।

‘‘साइसुन! हम नानकिंग कब पहुँचेंगे?’’

‘‘शायद दो दिन में; पर तुम पेकिंग जाना अधिक उचित समझती हो या नानकिंग?’’

‘‘मैं क्या बताऊँ? हम लोग अब क्या करेंगे, इसी पर सब-कुछ निर्भर करता है।’’

थोड़ी देर तक दोनों चुप रहे। फिर स्त्री ने पूछा, ‘‘क्या सोच रहे हो?’’

‘‘कुछ नहीं! एक दिन की याद आ रही है।’’ फिर थोड़ी देर रुककर - ‘‘उस दिन की, जब हांकाउ से...’’

‘‘भैया, यह सब क्यों सोचते हो? अब भविष्य में क्या करना है, सही सोचना है।’’

‘‘अब हम शायद कुछ नहीं कर सकते। सिवाय...’’

‘‘सिवाय क्या?’’

फिर कुछ रुककर - ‘‘मैं पेकिंग जाऊँगा और वहाँ युवान को...’’

‘‘क्यों?’’

‘‘और हम कुछ नहीं कर सकते। उस अभिशाप से छूटने का हमारे पास कोई उपाय नहीं है।’’

‘‘भैया! भैया! निराश न होओ! अब भी हम विश्वास प्राप्त कर सकेंगे, अपने नाम से यह दाग़ हटा सकेंगे...’’

साइसुन एक विद्रूप हँसी हँसकर बोला, ‘‘शायद! पर दाग़ हटाने से पहले हम ही हट जाएँगे।’’

दोनों बिलकुल चुप हो गये। रात्रि की प्रलयान्वित अशान्ति में उनके हृदयों की प्रज्वलनमय अशान्ति छिप गयी।

रात्रि पानी बरसा रही थी, उनके हृदय आँसू बरसा रहे थे। रात्रि के पानी से नदी का प्रवाह बढ़ता जा रहा था; किन्तु आँसू बह-बहकर उसके आशा-निर्झर को सुखाए जा रहे थे।

अभिशाप की छाया... नियति का प्रवाह...

14

युवान ने अपनी शक्ति पुष्ट कर ली। ‘प्रजातन्त्र’ के आदर्श को वह भुला चुका था, पार्लियामेंट तोड़ दी गयी थी और राज-कार्य का भार युवान ने अपने हाथों में ले लिया।

अब महल में अनेक परिवर्तन हो गये थे। कोई व्यक्ति सहसा भीतर नहीं जा पाता था, न कोई बिना आज्ञा के युवान के आगे प्रार्थना कर सकता था। अब युवान प्रजातन्त्र के संचालक मात्र नहीं रह गये थे, वे अब सम्राट् पद के अभिलाषी थे।

उस दिन भी, जब दस बजे युवान की अन्तरंग कमेटी की सभा आरम्भ हुई, तब महल के बाहर सैनिक पहरा था। जिस समय वह व्यक्ति दौड़कर पहरे के पार निकलकर महल के अन्दर घुस गया, तब सैनिक स्तब्ध रह गये और उसे रोक नहीं सके; किन्तु फिर भी उसका पीछा करने और लोगों को सावधान करने में उन्हें देर नहीं लगी।

जब तक वह व्यक्ति सभा-भवन में पहुँचता, तब तक वह सैनिकों से घिर चुका था। एक बार उसने चारों ओर देखा, फिर जेब से पिस्तौल निकालकर मध्य में बैठे हुए युवान शिकाई की ओर चार-पाँच फ़ायर किये। एक गोली युवान के कान के पास होकर चली गयी; किन्तु उसके लगी कोई भी नहीं।

फिर किसी ने उस व्यक्ति का हाथ पकड़ लिया। उसने शीघ्रता से हाथ छुड़ाया और अन्तिम फायर अपने मस्तिष्क पर कर लिया।

सभा में शोर मच गया था। उस व्यक्ति के पास आकर युवान शिकाई बोला, ‘‘अरे काशेई!’’

काशेई ने तिरस्कारपूर्वक कहा, ‘‘नहीं, काशेई नहीं, द्रोही, घातक, अभिशापित-अभिशापित-अभि...’’

फिर एकाएक उसका शरीर निःस्पन्द हो गया।

वे उसे उठाकर बाहर ले गये।

15

शव उठाये आठ सैनिक दौड़े जा रहे थे, लोग उत्सुक होकर निकट आते; किन्तु सैनिकों के - युवान शिकाई के सैनिकों के डर से पीछे हट जाते थे।

जब वह वीभत्स जुलूस चौक से कुछ आगे निकला, तो उसे रुक जाना पड़ा। सड़क पर भीड़ लगी हुई थी, उसके मध्य में खड़ी एक स्त्री परचे बाँट रही थी और साथ-साथ कहती जाती थी, ‘‘युवान शिकाई का नाश होनेवाला है! युवान शिकाई का नाश हो! उठो, वीरो, क्रान्ति की रक्षा करो!’’

सैनिकों ने शव को नीचे रख दिया और भीड़ में जा घुसे। एक ने भीड़ में किसी से परचा छीनकर पढ़ा, उसके नीचे लियांग चिचाओ के हस्ताक्षर थे। उसने अपने साथियों से कहा - ‘‘बन्दी कर लो!’’

सैनिकों ने स्त्री को बन्दी कर लिया और उसे लेकर वापस चल पड़े। लियांग का शव सड़क पर पड़ा रह गया लोगों की भीड़ भूखे कौओं की तरह उसको घेरकर खड़ी हो गयी।

स्त्री के विषादपूर्ण किन्तु उद्धत चेहरे को देखकर कुछ व्यक्ति हँस रहे थे। एक कह रहा था, ‘‘यह अवश्य ही युवान शिकाई की गुप्तचर है, हमें फँसाने आयी थी!’’ दूसरे ने उत्तर दिया, ‘‘हाँ, नहीं तो ऐसा हो सकता है कि कोई सड़कों पर परचे बाँटे?’’ तीसरा बोला, ‘‘इसका दंड केवल मृत्युदंड है। बन्दूक से उड़ा दी जाएगी!’’

स्त्री उपेक्षा से उनकी ओर देख रही थी। उसके लिए मानो वे थे ही नहीं। किन्तु वह शव के पास पहुँची, तब मुँह से एक चीख निकल गयी - ‘‘लियांग! लियांग! हमारा प्रायश्चित्त पूरा हो गया! और वू सुंग का अभिशाप! अब...।’’

उसने यत्न से अपने को वश में किया और धीरे-धीरे कदम रखती हुई आगे बढ़ गयी।

एक सैनिक ने पूछा, ‘‘यह कौन था, तुम जानती हो?’’

स्त्री ने विमनस्कता से उत्तर दिया, ‘‘हाँ, वह मेरा भाई लियांग’’ - फिर एकाएक चौंककर -‘‘नहीं-नहीं, वह कुछ नहीं... केवल अभिशापित...।’’

वह चली गयी, लोग देखते रह गये... एक ने कहा, ‘‘ऊँह, कोई पगली होगी...।’’

उसी वर्ष के दिसम्बर मास में युन्नान प्रान्त में विद्रोह हुआ। जनवरी में दो और प्रान्त भी युवान के विरुद्ध खड़े हुए। अन्य प्रान्त भी युवान से विमुख हो गये। मार्च में युवान की स्थिति इतनी बुरी हो गयी कि उसके मित्रों ने उसे राज्य छोड़कर भाग जाने का परामर्श दिया। अप्रैल में उसके मित्रों ने द्रोही कहकर उसका तिरस्कार किया। इसी मास कैंटन में... स्वतन्त्र प्रजातन्त्र स्थापित हुआ। जून के आरम्भ में युवान की मृत्यु हो गयी।

इस प्रकार शै-वा की भविष्यवाणी पूर्ण हुई; किन्तु उस समय तक चीन लियांग चिचाओ और उसकी बहिन को भुला चुका था। अविश्वास के अभिशाप का एक भाग यह भी है कि लोग अभिशापित व्यक्ति को शीघ्र भूल जाते हैं।

(मुल्तान जेल, 1932)


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