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रचनावली

अज्ञेय रचनावली
खंड : 3
संपूर्ण कहानियाँ

अज्ञेय
संपादन - कृष्णदत्त पालीवाल

अनुक्रम कविता और जीवन : एक कहानी पीछे     आगे

मैं आपको सिर्फ कहानी नहीं, कहानी से कहीं अधिक कुछ सुनाने लगा हूँ। ज़रा कान लगाकर -नहीं कान से अधिक मन लगाकर - सुन लीजिए। जो गाली आप देना चाहते हैं - पढ़कर अपन गाली देंगे, यह तो निश्चित है - उसे ज़रा अन्त तक रोक रखिये। ‘सब्र का फल मीठा होता है’ -क्या पता, आपके सब्र का मुझे मिलनेवाला फल वह गाली भी मीठी हो जाये! इस ‘कहानी’ पर कलम घिसने का पारिश्रिमिक मुझे नहीं मिलेगा, यह तो आप जानते होंगे, इसलिए गाली के बारे में फ़िक्रमन्द होने के लिए आप मुझे क्षमाकर देंगे, यह उम्मीद है।

और जब ‘कहानी से अधिक कुछ’ कहने लगा हूँ, तब प्लॉट-कथानक के झगड़े में क्या पड़ना? ये छोटी बातें कहानी के लिए ठीक होती हैं। यहाँ तो जो सामने आ जाये, वही उपयुक्त है। तो लीजिए, याद आती है हरिद्वार की बात-

शिवसुन्दर को सूझा था कि वह कलकत्ते में रहकर गली-गली की खाक छानकर कविता करना चाहता है, तभी कविता नहीं बनती। बंगाली क्लर्क, सिख ड्राइवर, एंग्लो-इंडियन, लोफर-लफंगे, बिहारी कांस्टेबल और सभी जगहों के भिखमंगे - सब आदमी, आदमी-आदमी - भला यह भी कोई कविता का विषय है! इनसान और कविता-हुँह! कविता के लिए चाहिए प्रकृति-नदी-नाले, पलाश के उपवन, लता-फूल, मलय पवन और दूर कहीं कुछ अस्पष्ट, अदृष्ट-नहीं, दूर कहीं किसी नूपुरवलयित रहस्यमयी की पग-ध्वनि... और इस सूझ के उठते ही वह बोरिया-बिस्तर-बिस्तर कम बोरिया अधिक-लेकर हरिद्वार चला आया था। गुरुकुल की तरफ नहर के किनारे एकान्त में एक मकान में सिरे का कमरा उसे मिल गया था, वहीं रहकर वह कविता के प्रादुर्भाव की प्रतीक्षा कर रहा था।

वह अभी तक प्रकटी नहीं थी। दिन-भर अरहर के खेतों में भटकना उसे अच्छा लगा था, दूर एक पहाड़ी की चोटी पर बने हुए देवी के मन्दिर की आड़ में सूर्य का मुँह छिपा लेना और भी अच्छा लगा था; और शाम को गंगा की ओर से जो तेज़ और शीत हवा आकर बारीक पिसी हुई रेत का परिमल उसके सारे चेहरे पर चिपका गयी थी, वह भी उसे बुरी नहीं लगी थी... लेकिन अच्छे लगकर ही ये सब रह गये थे, जिस दैवी घटना की, उन्मेष की आशा उसने की थी, वह नहीं हुआ था। रात को चारपायी पर लेटा-लेटा वह सोच रहा था कि क्यों नहीं हुआ वह उन्मेष, और कुछ उत्तर नहीं पा रहा था। केवल एक अतृप्ति-सी उसे घेर रही थी। वह कभी ऊँघ लेता, फिर जाग जाता; और जागने पर न जाने क्यों उसे सूना-सूना लगता और झल्लाहट होती। उसे लगता कि जीवन बहुत अधिक नीरस है, उसे जीने के लिए कविता की ज़रूरत है, मुखर सौन्दर्य की ज़रूरत है...

वह फिर ऊँघ गया और जब चौंककर जागा तब आधी रात थी। उस सन्नाटे में अकस्मात् जाग जाने का कारण उसे नहीं समझ आया, वह कान लगाकर सुनने लगा कि किस स्वर ने उसे जगाया था।

कुछ नहीं। यों ही जाग गया था वह।

लेकिन...

उसे जान पड़ा कि कमरे की खिड़की के बाहर कहीं नुपूरों की ध्वनि हो रही है, रह-रहकर और बदल-बदलकर कर मानो कोई स्त्री सम्भ्रान्त गति से चल रही है, कभी रुककर और कभी तेज़ी से।

इतनी घनी रात में कौन बाहर? और क्यों?

शिवसुन्दर पूरी तरह जाग गया। उसकी अशान्ति केन्द्रित होकर एक तनी हुई-सी प्रतीक्षा बन गयी।

नूपुरों की ध्वरि फिर आयी। उसने कोशिश की, कान लगाकर पहचान सके कि कहाँ से आती है, लेकिन उसे लगा कि कभी वह एक तरफ़ से आती है, कभी दूसरी।

क्या हवा ही उसे धोखा दे रही है? रह-रहकर एक मीठा-सा झोंका आ जाता है, कभी एक तरफ़ से, कभी दूसरी तरफ़ से। क्या इसीलिए तो नहीं वह स्वर भी भागता हुआ जान पड़ता? क्योंकि किसी अभिसारिका का-यदि वह स्त्री अभिसारिका है तो, लेकिन और हो क्या सकती है?-ऐेसे समय इधर-उधर भागना, वह भी जब उसके पायल ज़ोर से हों, कुछ जँचता नहीं। कवि भी कह गये हैं - ‘मुखरम् धीरम् त्यज मंजीरम्’...

तभी पायल बड़े ज़ोर से बज उठे - खनन्-खनन्!

शिवसुन्दर उठ बैठा। यह स्वर मानो उसके सिरहाने के पास से ही आ रहा था... उसका हृदय धक्-धक् करने लगा-इस एकान्त निर्जन स्थल में किसी अपरिचित का इतना साहस...

पायल फिर बजे, और शिवसुन्दर जान गया कि वे कहाँ हैं। उसके सिरहाने के पास की खिड़की के बाहर ही वह स्वर है।

लेकिन कौन है यह स्त्री, और इतनी रात वहाँ क्यों है? और इतना हौसला उसका कैसे है...? शायद कोई पुश्चली स्त्री होगी। लेकिन पुश्चली होती तो क्या इससे अधिक चतुर न होती, चुपचाप न आती?

शिवसुन्दर को प्रतीत हुआ कि बहुत तेज़ गति से बहुत-सा सोच जाने की ज़रूरत है। वह जल्दी-जल्दी दिन-भर में देखते हुए प्रत्येक स्त्री-मुख की याद करने लगा-कौन हो सकती है जो उसके पास आयी है?

...तमोलिन से जब पान लिया था, तब वह पैस लेते हुए मटकाकर मुस्करा दी थी। लेकिन उस मुस्कराहट में तो खास कोई बात नहीं थी। लगी तो वह ऐसी ही थी मानो ग्राहक का दस्तूर हो। जैसे पान के साथ तम्बाकू मुफ्त मिलता है, वैसे ही मुफ्त यह मुस्कान दी गयी जान पड़ती थी। लेकिन कौन जाने, ये आधी रात में बजते हुए पायल भी उसके ‘दस्तूर’; में ही शामिल हों...

शाम को उसने हलवाई से दूध लिया था, तब हलवाई की लड़की भी बैठी थी। शिवसुन्दर एकटक उसकी ओर देख रहा है, सहसा यह जानकर वह शर्म से लाल हो आयी थी और भीतर चली गयी थी। शर्म क्या है? पुरुष को आकर्षित करने का एक साधन - तभी तो मारवाड़िनें पति के सामने घूँघट निकालती हैं। लेकिन मेलों में अधनंगा नहा आती हैं - पति को आकर्षित करना होत और गैर आदमी, आदमी थोड़े ही हैं, सिर्फ गैर हैं।

और वह माँगनेवाली औरत-ऐसी उसने कभी नहीं देखी थी। जब वह साधारण अपील से आकृष्ट नहीं हुआ, तब बोली, ‘‘तेरा धोबन पी लूँ, बाबू, एक पैसा दे, तेरा थूक चाट लूँ बाबू...’’ जब इससे भी उसे ग्लानि ही हुई, तब, ‘‘तेरे गुलाबी गालों पै मरू बाबू, एक पैसा दे। तेरो दाढ़ी को हाथ लगाऊँ बाबू...’’ और बढ़कर उसकी ठोड़ी ही तो पकड़ ली थी उसने...

शिवसुन्दर उठकर खिड़की पर जा पहुँचा। आँखें फाड़-फाड़कर उसने बाहर देखा, कोई नहीं दीखा। वह फिर आकर चारपायी पर लेट गया।

और तभी पायल फिर बजे। वह फिर उठ बैठा।

अपने हृदय का स्पन्दन उसके लिए असह्य होने लगा। उसने फिर खिड़की पर जाकर देखा-कुछ नहीं। तब उसने एकदम किवाड़ खोल दिया और बाहर निकल आया। घर का चक्कर काटा, लेकिन कोई नहीं दीखा। वह फिर किवाड़ पर आकर रुका - कि दूर कहीं पायल फिर बजे। शायद वह स्त्री हताश होकर लौटी जा रही है, अरहर के खेतों में से वह स्वर आया था। शिवसुन्दर के भीतर उत्कंठा इतनी उमड़ आयी थी कि अब उस रहस्य को खोल डालना बहुत ज़रूरी हो गया था - उस स्त्री को खोज लेना... और रात भी तीव्र गति से बीतती जा रही है, यह भी फ़िक्र उसे हो आयी थी। नींद उसकी आँखों में नहीं थी, कुछ और था जो उसके लिए अभ्यस्त नहीं था और जिसका वह नाम नहीं जानता था...

वह लपककर अरहर के खेत में घुसा। उसके मन में आया, अगर मैं शब्दवेधी बाण चलाने की क्रिया जानता तो उसे बाणों से ऐसा घेर लेता कि एक जगह टिककर खड़ी रहती, लेकिन... लेकिन...

शिवसुन्दर की आतुर आँखों ने अन्धकार को भेद डालना चाहा, पर कुछ दीखा नहीं। उसे शीघ्र ही आनेवाले सवेरे की याद आयी, पर सवेरा हो जाने से सब चौपट हो जाएगा। उसने धीरे से पुकारा, ‘‘कौन हो तुम?’’

जवाब नहीं आया। उसने फिर कहा, ‘‘कौन हो? इधर निकल आओ।’’,

फिर भी उत्तर नहीं मिला। उसे बिहारी का एक दोहा याद आया, ‘अरहर, कपास, ईख, सब कट जाएँगे...’ अभी अरहर कटने के दिन नहीं आये, पर वह तो रात भी नहीं बीतने देना चाहता...’ उसने फिर पुकारा, ‘‘कहाँ हो तुम?’’

उत्तर में कुछ दूर पर पायल बजी। दायीं ओर कहीं पर - लेकिन नहीं, वह फिर बजी तो उसे प्रतीत हुआ कि बायीं ओर है, वह खेत से बाहर निकलकर मेड़ पर आया, हताश-सा बैठ गया।

हवा का झोंका कभी-कभी आता था, तब उसमें बसे हुए शीत से शिवसुन्दर का कुंठित मन और भी सिकुड़ जाता था... और तब दूर कहीं, कभी इधर, कभी उधर, पायल बज उठती थीं...

रात या यों कहें कि भोर-क्योंकि पौ फटने ही वाली थी - अत्यन्त सुन्दर था। लेकिन शिवसुन्दर का ध्यान उधर नहीं था। वह मर्माहत-सा मेड़ पर बैठा था...

ऊषा की एक लाल किरण आकाश में फिर गयी। मानो देवी के आने के लिए मार्ग को बुहार गयी, किसी मंगल-सूचक लाल चूर्ण से चौक पूर गयी। शिवसुन्दर की थकी आँखों ने देखा, चारों ओर प्रकृति का लास है - नदी है, नहर है पलाश के फूले हुए उपवन हैं, समीरण धीरे-धीरे बहने लगा और फिर न जाने किसके पायलों की ध्वनि उसके पास लिए आ रहा है... लेकिन इस सबकी जैसे उस पर छाप नहीं पड़ी। उसमें सिर्फ एक ही जिज्ञासा थी - जिससे पायल हैं, वह कहाँ है?

पायल उसके हाथ के पास ही बजे। उसके चौंककर देखा, वहाँ एक छोटा-सा, सूखा-सा पौधा था, और कुछ नहीं।

क्षण-भर शिवसुन्दर स्तब्ध रह गया, फिर मानो आकाश से गिरा... फिर उसमें एकाएक निराशा का क्रोध उमड़ आया, उसने एक ही झटके में उस पौघे को जड़ समेत नोच लिया।

और उसके क्रोध-कम्पित हाथों में भी उस पौधे में लगी हुई पकी फलियों ने कहा, खनन्!

और उसके क्रोध कम्पित हाथों में भी पौधे में लगी हुई पकी फलियों ने कहा, खनन्!

शिवसुन्दर ने उस हताशा में मानो सत्य को देख लिया, लेकिन समझने से पहले ही वह सत्य बुझ भी गया। उसने जाना कि वह सिर्फ कविता ही नहीं चाहता है, सिर्फ सौन्दर्य ही नहीं चाहता है, इससे अधिक कुछ चाहता है... लेकिन क्या चाहता है? वह नहीं जानता। इतना जानता है कि वह अतृप्त रह गया है, भूखा रह गया है, चौंककर ऐसे जाग गया है, उन्निद्र हो गया है, उसे...

शिवसुन्दर धीरे-धीरे घर लौटा। रात-भर की घटनाएँ मानो एक पहले कभी सुने हुए ग्राम्यगीत की एक पंक्ति में सिमटकर उसके मन में गूँजने लगी, ‘तेरी पैंजणिया न्यू बाजे ज्यूं बाजे बीज सणी दा।’ बेवकूफ़ कहीं का-उल्टी बात कहता है। आखिर गँवार रहा होगा। ‘बीज सणी दा न्यू बाजे ज्यू बाजे तेरी पैंजणिया’ होना चाहिए था।

पर घर पहुँचते-पहुँचते वे घटनाएँ इससे भी छोटे एक सूत्र में सिमट आयीं - वह जीवन माँगता है।

कविता माँगना, सौन्दर्य माँगना बेवकूफ़ी है।

जहाँ जीवन नहीं है, वहाँ कविता क्या और सौन्दर्य क्या? वे होंगे वैसे ही खोखले, जैसा यह बजता हुआ सनी का बीज।

तब फिर कलकत्ता? लेकिन कलकत्ता जीवन कहाँ है, वह तो निरा सत्य-ही-सत्य है, कड़वाहट-ही-कड़वाहट है। ‘वाक्यम् रसात्मकम् काव्यम्’-और कड़वा अधिक-से-अधिक छः रसों में से एक है, तब सत्य भी जीवन का अधिक-से-अधिक एक छठा हिस्सा है... बाकी पाँच? और कहा है, ‘मधुरेण समापयेत्।’ मधुर नहीं तो कुछ नहीं-वही रसों में रस है...

शिवसुन्दर को समझ आ गया कि उसने गुरुकुल की तरफ़ आकर ग़लती की। वह सामान लेकर हर की पौड़ी पहुँचा, वहाँ मेले की भीड़ को चीरता हुआ भीतर घुसा और अन्त में ठीक-ठाक करके उसने एक कमरा ले लिया और जिससे गंगा और उसके पार की पहाड़ियाँ भी दीखती थीं, और उस पार घाट की सीढ़ियाँ, उन पर आने-जानेवाली भक्त-भक्तिनियों की भीड़ें और ऊपर का रास्ता भी दीखता था।

सामान एक ओर रखकर वह झरोखे पर बैठ गया और नीचे झाँकने लगा।

जीवन पाने का यही एक ढंग है। कलकत्ता में तो आदमी पिस जाता है-और वह भी किन में? गन्दे, मैले-कुचले लोगों में, जिनसे छू जाने पर दिन-भर अपने शरीर से बू आती है। यहाँ और बात है, - सौन्दर्य भी है, लोग भी हैं, गति भी है, और फिर भी वह अलग है, इस भीड़-भड़क्के के अधीन नहीं, उससे ऊपर है, दर्शक है। दर्शक होकर ही जीवन से काव्य-रस खींचा जा सकता है-जो स्वयं उसमें पड़ गया वह तो तिल हो गया जिसे पेर कर तेल खींचा जाएगा।

शिवसुन्दर की दृष्टि नीचे घाट की सीढ़ियाँ चढ़ती हुई दो स्त्रियों पर टिक गयी। तभी न जाने क्यों उन्होंने भी आपस में बात करते-करते ही ऊपर देखा, शिवसुन्दर से आँख मिलने पर वे मुस्करा दीं और आगे बढ़ गयीं।

हाँ, ठीक तो है, जिस चीज़ की ओर यह इशारा है, वह प्रेम ही तो है। जीवन ही तो है, क्योंकि जीवन का मधुरतम रस है।

लेकिन मन शिवसुन्दर का चाहे जितना भागे, दृष्टि उसकी नीचे ही लगी हुई थी। दो और स्त्रियाँ उसके दृष्टि-पथ पर गुज़र रही थी। शिवसुन्दर एकटक उनकी ओर देख रहा था। एक ने तिरछी चितवन से उसे देखा। वह दृष्टि मानो कौंधकर कुछ कह गयी, पर दूसरी ने एक तीखी, सशंक और कुछ-कुछ भीत दृष्टि अपनी संगिनी पर और शिवसुन्दर पर डाली, और अधिक तीव्र गति से आगे चल पड़ी।

शिवसुन्दर थोड़ा-सा मुस्करा दिया। फूल के साथ काँटे तो होने ही चाहिए, नहीं तो जीवन का मज़ा क्या। एक ओर आकर्षण, दूसरी ओर विघ्न, यही तो है जीवन!

न जाने क्यों, स्त्रियाँ जोड़ों में ही जा रही थीं, अकेली नहीं, एक और जोड़ा सामने से गुज़रा। इन्होंने भी न जाने क्यों झरोखे के पास आकर ऊपर देखा। उनकी दृष्टि में सन्देह पहले से था, जब उन्होंने शिवसुन्दर को एकटक देखते हुए पाया तब उससे क्रोध भी आ मिला। अवज्ञा से सिर हिलाकर वे आगे निकल गयीं।

शिवसुन्दर ने सोचा, विरोध में एक आकर्षण होता है, एक ललकार होती है। वह आह्वान करता है कि आओ, मुझसे दो-दो हाथ खेल लो। आचार्य भी कह गये हैं कि बिना संघर्ष के बिना कानफ्लिक्ट के कला का विकास नहीं होता। हो कैसे सकता है?

ज्यों-ज्यों दिन चढ़ता आता था, स्नानार्थी अधिकाधिक संख्या में आते-जाते थे। अब औरतें भी झुंड बाँध-बाँधकर आ रही थीं, और झुंड ही लौटने लगे थे।

एक टोली शिवसुन्दर के झरोखे के नीचे से निकली। उन कई-एक औरतों में से एक ने भी आँख उठाकर नहीं देखा, उनके लिए मानो शिवसुन्दर था ही नहीं।

शिवसुन्दर ने तड़पकर कहा, ‘‘नहीं, नहीं, यह नहीं है जीवन! यह झूठ है, यह असत् है, अशिव है, असुन्दर है, यह हो ही नहीं सकता, यह जीवन नहीं है।’’

लेकिन वह समूह निकल गया। उसके बाद और भी कई टोलियाँ स्त्रियों की आयीं और निकल गयीं, पर किसी ने नहीं देखा कि जीवन का भिक्षु शिवसुन्दर झरोखे में खड़ा है, वह प्रवाह उसकी आँखों के आगे से वैसे ही निकल गया जैसे नदी के बीच में अथाह पानी बहता हुआ चला जाता है पर किनारे से सटे हुए और सड़ते हुए तृण को वहीं पड़ा रहने देता है, हिलाता भी नहीं... उसे लगा, वह समुद्र की लहरों द्वारा उच्छिष्ट रेत पर पड़े एक घोंघे के भीतर सड़ते हुए जीव की तरह, कि वह इस प्रभाव के आगे जूठन की तरह अत्यन्त नगण्य, क्षुद्र हो गया है...

और उसने फिर तड़प कर कहा, ‘‘नहीं यह झूठ है, यह नहीं है जीवन। मैं नहीं माँगता यह!’’

वह झरोखे से हट गया और सोचने लगा, क्या मैं कलकत्ता लौट जाऊँ ? लेकिन इस विचार से वह सहम गया। कलकत्ता में तो कविता नहीं बनेगी, यहाँ शायद-इस अतृप्त और अपदस्थता में शायद...

विधि हँसती है। विधि है या नहीं, कौन जाने; पर वह हँसती ज़रूर है। मुहावरे ने उसे हँसने का हक़ दिया है...

लेकिन शिवसुन्दर की माँगें? उसकी तृप्ति? उसकी वासनाएँ?

विज्ञान की कुछ पुस्तकें उसकी समस्याओं का उत्तर देने की कोशिश करती हैं। लेकिन वे विदेशी हैं। विदेशी ज्ञान शिवसुन्दर क्यों चाहे? वह हिन्दी लेखक है। हिन्दी राष्ट्रभाषा है। वह राष्ट्रभाषा का लेखक है। क्या इतना ही इसलिए पर्याप्त नहीं है कि वह आँखें बन्द करके गाया करे, गाया करे अपनी माँग के गान, अपनी अनुभूति के गीत, नहीं अनुभूति के अपने अनुभव का आलाप! चाहे वह गाना उस खिखाए हुए मँगते की पुकार की तरह क्यों न हो जो एक दमड़ी की उपलब्धि के लिए पहले स्वर में दीनता लाता है, फिर उस दीन स्वर को सुनकर स्वयं मान लेता है कि वह आर्त है! शिवसुन्दर भी तो आकाश के तारे तोड़ने का दम नहीं भरता, सामर्थ्य की डींग नहीं हाँकता, अभिमान के तिक्त और कर्म के कषाय रसों से उसे क्या, वह तो ‘मधुरेण समापन’ चाहता है; वह तो माँगता है, सिर्फ़ माँगता है एक छदाम!

अब आपको मौक़ा है कि आप गाली दे लें। मेरी कहानी खत्म हो गयी है। लेकिन जो आपको कहना है, जल्दी कह डालिए, क्योंकि मुझे अभी कुछ और निवेदन करना है। मैंने कहा था न, ‘‘कहानी से अधिक कुछ’’ कहूँगा।

शायद आपको लगे कि मैंने कहानी भी नहीं कही, अधिक की क्या बात! लेकिन अगर आपको यह लगा है तो आप तक दिल के गुबार निकाल चुके होंगे। अन्त में ‘अधिक कुछ’ मुझे यह कहना है कि अगर मेरी रचना में आपको ‘छोटे मुँह बड़ी बात’ जान पड़ी हो, तो यह सोचकर क्षमा कर दीजिए कि आखिर मैं भी दुर्भाग्य का मारा एक हिन्दी-लेखक हूँ; उस हैसियत से मैं भी आकाश के तारे तोड़ने या सामर्थ्य की डींग मारनेवाला, अभिमान का तिक्त और कर्म का कषाय रस पीने-वाला, कौन होता हूँ, मैं भी तो ‘मधुरेण समापयेत्’ के लिए माँगता हूँ सिखाये हुए आर्त स्वर में आपकी दया की छदाम!

(कलकत्ता, नवम्बर 1937)


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