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रचनावली

अज्ञेय रचनावली
खंड : 3
संपूर्ण कहानियाँ

अज्ञेय
संपादन - कृष्णदत्त पालीवाल


लेफ्टिनेंट सागर ने अपना कीचड़ से सना चमड़े का दस्ताना उतारकर, ट्रक के दरवाज़े पर पटकते हुए कहा, ‘‘गुरूंग’ तुम गाड़ी के साथ ठहरो, हम कुछ बन्दो-बस्त करेगा।’’

गुरूंग सड़ाक् से जूतों की एड़ियाँ चटकाकर बोला, ‘‘ठीक ए सा’ ब!’’

साँझ हो रही थी। तीन दिन मूसलाधार बारिश के कारण नवगाँव में रुके रहने के बाद, दोपहर को थोड़ी देर के लिए आकाश खुला तो लेफ्टिनेंट सागर ने और देर करना ठीक न समझा। ठीक क्या न समझा, आगे जाने के लिए वह इतना उतावला हो रहा था कि उसने लोगों की चेतावनी को अनावश्यक सावधानी माना, और यह सोचकर कि वह कम से कम शिवसागर तो जा ही रहेगा रात तक, वह चल पड़ा था। जोरहाट पहुँचने तक शाम हो गयी थी, पर उसे शिवसागर के मन्दिर देखने का इतना चाव था कि वह रुका नहीं, जल्दी से चाय पीकर आगे चल पड़ा। रात जोरहाट में रहे तो सवेरे चलकर सीधे डिबरूगढ़ जाना होगा, रात शिवसागर में रहकर सवेरे वह मन्दिर और ताल को देख सकेगा। शिवसागर, रुद्रसागर, जय सागर-कैसे सुन्दर नाम हैं। सागर कहलाते हैं बड़े-बड़े ताल होंगे-और प्रत्येक के किनारे पर बना मन्दिर कितना सुन्दर दीखता होगा... असमिया लोग हैं भी बड़े, साफ़-सुथरे, उनके गाँव इतने स्वच्छ होते हैं तो मन्दिरों का क्या कहना... शिव-दोल, रुद्र-दोल कहना कैसी सुन्दर कवि-कल्पना है। सचमुच जब ताल के जल में, मन्द-मन्द हवा से सिहरती चाँदनी में, मन्दिर की कुहासे-सी परछाई डोलती होगी, तब मन्दिर सचमुच सुन्दर हिंडोले-सा दीखता होगा... इसी उत्साह को लिये वह बढ़ता जा रहा था -तीस-पैंतीस मील का क्या है - घंटे-भर की बात है...

लेकिन सात-एक मील बाक़ी थे कि गाड़ी कच्ची सड़क के कीचड़ में फँस गयी। पहले तो स्टीयरिंग ऐसा मक्खन-सा नरम चला, मानो गाड़ी नहीं नाव की पतावार हो, और नाव बड़े-से भँवर में हिचकोले खाती झूम रहो हो, फिर लेफ्टिनेंट के सँभालते-सँभालते गाड़ी धीमी होकर रुक गयी, यद्यपि पहियों के घूमते रहकर कीचड़ उछालने की आवाज़ आती रही...

इसके लिए साधारणतया तैयार होकर ही ट्रक चलते थे। परन्तु बेलचा निकाला गया, कीचड़ साफ़ करने की कोशिश हुई लेकिन कीचड़ गहरा और पतला था, बेलचे का नहीं, पम्प का काम था! फिर टायरों को लोहे की ज़ंजीरें चढ़ाई गयीं। पहिये घूमने पर कहीं पकड़ने को कुछ मिले तो गाड़ी आगे ठिले-मगर चलने की कोशिश पर लीक गहरी कटती गयी और ट्रक धँसता गया, यहाँ तक कि नीचे का गीयर-बक्स भी कीचड़ में डूबने को हो गया... मानो इतना काफ़ी न हो; तभी इंजन ने दो-चार बार फट्-फट्-फटर का शब्द किया और चुप हो गया-फिर स्टार्ट ही न हुआ...

अँधेरे में गुरूंग का मुँह नहीं दीखता था और लेफ़्निेन्ट ने मन-ही-मन सन्तोष किया कि गुरूंग को उसका मुँह नहीं दीखता होगा... गुरूंग गोरखा था और फ़ौजी गोरखों की भाषा कम-से-कम भावना की दृष्टि से गूँगी होती है मगर आँखें या चेहरे की झुर्रियाँ सब समय गूँगी नहीं होतीं - और इस समय अगर उनमें लेफ्टिनेंट सा’ब की भावुक उतावली पर विनोद का आभास भी दीख गया, तो दोनों में मूक वैमनस्य की एक दीवार खड़ी हो जाएगी...

तभी सागर ने दस्ताने फेंककर कहा, ‘‘हम बन्दोबस्त करेगा,’’ और पिच्च-पिच्च कीचड़ में जमा-जमाकर बूट रखता हुआ आगे चढ़ चला।

कहने को तो उसने कह दिया, पर वह बन्दोबस्त करेगा क्या रात में? बादल फिर घिरने लगे; शिवसागर मील है तो दूसरे सागर भी तीन-चार मील तो होंगे और क्या जाने कोई बस्ती भी होगी कि नहीं; और जयसागर तो बड़े बीहड़ मैदान के बीच में है... उसने पढ़ा था कि उस मैदान के बीच में ही रानी जयमती को यन्त्रणा दी गयी थी कि वह अपने पति का पता बता दे। पाँच लाख आदमी उसे देखने इकट्ठे हुए थे, और कई दिनों तक रानी को सारी जनता के सामने सताया और अपमानित किया गया था।

एक बात हो सकती है कि पैदल ही शिवसागर चला जाये, उस पर कीचड़ में पिच्च-पिच्च सात मील! उसी में भोर हो जाएगी, फिर तुरन्त गाड़ी के लिए वापस जाना पड़ेगा...फिर नहीं, वह बेकार है। दूसरी सूरत... रात गाड़ी में ही सोया जा सकता है। पर गुरूंग? वह भूखा ही होगा... कच्ची रसद तो होगी, पर बनायेगा कैसे? सागर ने तो गहरा नाश्ता किया था, उसके पास बिस्कुट वग़ैरह भी है... पर अफ़सरी का बड़ा क़ायदा है कि अपने मातहत को कम-से-कम खाना तो ठीक खिलाये... शायद आस-पास कोई गाँव हो-

कीचड़ में कुछ पता न लगता था कि सड़क कितनी है और अग़ल-बग़ल का मैदान कितना। पहले तो दो-चार पेड़ किनारे-किनारे थे, पर अब वह भी नहीं... दोनों और सपाट-सूना मैदान था, और दूर के पेड़ भी ऐसे धुँधले हो गये थे कि भ्रम हो, कहीं चश्मे पर नमी की ही करामात तो नहीं है... अब रास्ता जानने का एक ही तरीका था, जहाँ कीचड़ कम गहरा हो वही सड़क; इधर-उधर हटते ही पिंडलियाँ तक पानी में डूब जाती थीं और तब वह फिर धीरे-धीरे पैर से टटोलकर मध्य में आ जाता था...

यह क्या है? हाँ पुल-सा है - यह रेलिंग है। मगर दो पुल हैं समकोण बनाते हुए... क्या दो रास्ते हैं? कौन-सा पकड़ें?

एक कुछ ऊँचा ज़मीन की और जाता जान पड़ता था। ऊँचे पर कीचड़ कम होगा, इस बात का ही आकर्षण काफ़ी था; फिर ऊँचाई पर से शायद कुछ दीख भी जाये। सागर उधर ही चल पड़ा। पुल के पार ही सड़क एक ऊँची उठी हुई पटरी-सी बन गयी, तनिक आगे इसमें कई मोड़ से आये, फिर जैसे धान-खेत में कहीं-कहीं कई-एक छोटे-छोटे खेत एक साथ पड़ने पर उनकी मेड़ मानो एक साथ कई ओर जाती जान पड़ती है, इसी तरह वह पटरी भी कई ओर को जाती-सी जान पड़ी। सागर मानो एक बिन्दु पर खड़ा है, जहाँ से कई रास्ते हैं, प्रत्येक के दोनों ओर जल... मानो अथाह समुद्र में पटरियाँ बिछा दी गयी हों...

सागर ने एक बार चारों ओर नज़र दौड़ायी। शून्य! उसने फिर आँखों की कोरें कसकर झाँककर देखा, बादलों की रेखा में एक कुछ अधिक घनी-सी रेखा उसे दीखी... बादल ऐसा समकोण नहीं हो सकता। नहीं, यह इमारत है... सागर उसी ओर को बढ़ने लगा। रोशनी नहीं दीखती, पर शायद भीतर कोई हो-

पर ज्यों-ज्यों वह निकट जाता गया, उसकी आशा धुँधली पड़ता गयी। यह असमिया घर नहीं हो सकता - इतने बड़े घर अब कहाँ हैं? फिर यहाँ, जहाँ बाँस और फूस के बासे ही हो सकते हैं, र्ईंट के घर नहीं - अरे यह तो कोई बड़ी इमारत है - क्या हो सकती है?

मानो उसके प्रश्न के उत्तर में ही सहसा आकाश में कुछ फीका पड़ा और सहसा धुँधला-सा चाँद भी झलक गया। उसके अधूरे प्रकाश में सागर ने देखा - एक बड़ी-सी, ऊपर से चपटी सी इमारत। यानी-यानी दुमंज़िली बारादरी... बरामदे से, जिसमें कई-एक बार महराबें; एक के बीच से मानो आकाश झाँक दिया...

सागर ठिठककर क्षण-भर उसे देखता रहा। सहसा उसके भीतर कुछ जागा जिसने इमारत को पहचान लिया - यह तो अहोम राजाओं का क्रीड़ा-भवन-क्या नाम है? रंग-महल, नहीं हवा-महल-नहीं, ठीक याद नहीं आता, पर यह बड़े पठार के किनारे पर है जिसमें जयमती-

एकाएक हवा सनसना उठी। आस-पास के पानी में जहाँ-तहाँ नरसल के झोंप थे, झुककर, फुसफुसा उठे, जैसे राजा के आने पर भृत्यों-सेवकों में एक सिरहन दौड़ जाये... एकाएक यह लक्ष्य करके कि चाँद फिर छिपा जा रहा है, सागर ने घूमकर चीन्ह लेना चाहा कि ट्रक किधर कितनी दूर है, पर वह अभी यह भी तय नहीं कर सकता था कि कहाँ क्षितिज है, जिसके नीचे पठार है और ऊपर आकाश या मेघाली कि चाँद छिप गया, और अगर उसने खूब अच्छी तरह पहचान न रखा होता, तो रंग-महल या हवा-महल भी खो जाता...

महल में छत होगी। वहाँ सूखा होगा। वहाँ आग भी जल सकती है। शायद बिस्तर लाकर सोया भी जा सकता है। ट्रक से तो यही अच्छा रहेगा-गाड़ी को तो कोई खतरा नहीं-

सागर जल्दी-जल्दी आगे बढ़ने लगा।

रंगमहल बहुत बड़ा हो गया था। उसकी कुर्सी ही उतनी ऊँची थी कि असमिया घर उसकी ओट में छिप जाये। पक्के फ़र्श पर पैर पड़ते ही सागर ने अनुमान किया, तीस-पैंतीस सीढ़ियाँ होंगी... सीढ़ियाँ चढ़कर वह असली ड्योढ़ी तक पहुँचेगा।

ऊपर चढ़ते-चढ़ते हवा चीख उठी। कई मेहराबों से मानो उसने गुर्रा कर कहा, ‘‘कौन हो तुम, इतनी रात गये मेरा एकान्त भंग करने वाले?’’ विरोध के फूत्कार का यह थपेड़ा इतना सच्चा था कि सागर मानो फुसफुसा ही उठा, ‘‘मैं... सागर, आसरा ढूँढ़ता हूँ - रैनबसेरा-’’

पोपले मुँह का बूढ़ा जैसे खिखिया कर हँसे, वैसे ही हवा हँस उठी। ‘‘ही-ही-ही-खी-खी-खीः। यह हवा महल - अहोम राजा का लीलासागर - अहोम राजा का - व्यसनी, विलासी छहों इन्द्रियों से जीवन की लिसड़ी बोटी से छहों रसों को चूसकर उसे झँझोड़कर फेंक देने वाले नृशंस लीलापिशाचों का - यहाँ आसरा - यहाँ बसेरा - ही-ही-ही-खी-खी-खीः।’’

सीढ़ियों की चोटी से मेहराबों के तले खड़े सागर ने नीचे और बाहर की ओर देखा। शून्य महाशून्य : बादलों से, बादलों में बसी नमी और श्वाला से प्लवन, वज्र और बिजली से भरा हुआ शून्य। क्या उसी की गुर्राहट हवा में है, या कि नीचे फैले नंगे पठार की, जिसके नितम्बों पर दिन-भर सड़-सड़ पानी के कोड़ों की बौछार पड़ती रही है? उसी पठार का आक्रोश, सिसकन, रिरियाहट?

इसी जगह, इसी मेहराब के नीचे खड़े कभी अधनंगे अहोम राजा ने अपने गठीले शरीर को दर्प से अकड़ाकर सितार की खूँटी की तरह उमेठकर, बायें हाथ के अँगूठे को कमरबन्द में अटकाकर, सीढ़ियों पर खड़े क्षत-शरीर राजकुमारों को देखा होगा, जैसे कोई साँड़ खसिया बैलों के झुंड को देखे, फिर दाहिने हाथ की तर्जनी को उठाकर दाहिने भ्रू को तनिक-सा कुंचित करके संकेत से आदेश किया होगा कि यन्त्रणा को और कड़ी होने दो।

लेफ्टिनेंट सागर की टाँगें मानो शिथिल हो गयीं। वह सीढ़ी पर बैठ गया, पैर उसने नीचे को लटका दिये, पीठ मेहराब के निचले हिस्से से टेक दी। उसका शरीर थक गया था दिन-भर स्टीयरिंग पर बैठे-बैठे, और पौने दो सौ मील तक कीचड़ की सड़क से बनी लीकों पर आँखें जमाए रहने से आँखें भी ऐसे चुन-चुना रही थीं मानो उनमें बहुत बारीक पिसी हुई रेत डाल दी गयी हो - आँखें बन्द भी वह करना चाहे और बन्द करने में क्लेश भी हो-वह आँख खुली रखकर ही किसी तरह पीठ को समेट ले, या बन्द करके देखता रह सके।

अहोम राजा चूलिक-फा... राजा में ईश्वर का अंश होता है, ऐसे अन्धविश्वास पालनेवाले अहोम जाति के लिए यह मानना स्वाभाविक ही था कि राजकुल का अक्षत-शरीर व्यक्ति ही राजा हो सकता है, जिसके शरीर में कोई क्षत है, उसमें देवत्व का अंश कैसे रह सकता है? देवत्व -और क्षुण्ण? नहीं ईश्वरत्व अक्षुण्ण ही होता है, और राजा-शरीर अक्षत...

अहोम-परम्परा के अनुसार कुल-घात के सेतु से पार होकर चूलिका-फा भी राजसिंहासन पर पहुँचा। लेकिन वह सेतु सदा के लिए खुला रहे, इसके लिए उसने एक अत्यन्त नृशंस उपाय सोचा। अक्षत-शरीर राजकुमार ही राजा हो सकते हैं, अतः सारे अक्षत-शरीर राजकुमार उसके प्रतिस्पर्धी और सम्भाव्य घातक हो सकते हैं। उनके निराकरण का उपाय यह है कि सबका एक-एक कान या छिगुनी कटवा ली जाये - हत्या भी न करनी पड़े, मार्ग के रोड़े भी हट जाएँ। लाठी न टूटे, साँप भी मरे नहीं पर उसके विषदन्त उखड़ जाएँ। क्षत्र-शरीर, कनकटे या छिगुनी-कटे राजकुमार राजा हो ही नहीं सकेंगे, तब उन्हें राज-घात का लोभ भी न सताएगा!

चूलिक-फा ने सेनापति को बुलाकर गुप्त आज्ञा दी कि रात में चुपचाप राजकुल के प्रत्येक व्यक्ति के कान (या छिगुनी) काटकर प्रातःकाल दरबार में राज-चरणों में अर्पित किये जाएँ।

और प्रातःकाल, वहीं, रंगमहल की सीढ़ियों पर उसके चरणों में यह वीभत्स उपहार चढ़ाया गया होगा - और उसने उसी दर्प-भरी अवज्ञा में होंठो की तार-सी तनी पतली रेखा को तनिक मींड़-सी देकर, शब्द किया होगा, ‘हूँ’ और रक्त-सने थाल को पैर से तनिक-सा ठुकरा दिया होगा!

चूलिक-फा - निष्टकंटक राजा। लेकिन नहीं, यह तीर-सा कैसा साल गया? एक राजकुमार भाग गया - अक्षत!

लेफ्टिनेंट सागर मानो चूलिक-फा के चीत्कार को स्पष्ट सुन सका। अक्षत! भाग गया?

वहाँ सामने लेफ्टिनेंट ने फिर आँखों को कसकर बादलों की दरार को भेदने की कोशिश की - वहाँ सामने कहीं नगा पर्वत-श्रेणी है। वनवासी वीर नगा जातियों से अहोम राजाओं की कभी नहीं बनी - वे अपने पर्वतों के नंगे राजा थे, ये अपनी समतल भूमि के कौशेय पहनकर भी अधनंगे रहनेवाले महाराजा, पीढ़ियों के युद्ध के बाद दोनों ने अपनी-अपनी सीमाएँ बाँध ली थीं और कोई किसी से छेड़-छाड़ नहीं करता था - केवल सीमा-प्रदेश पर पड़ने वाली नमक की झीलों के लिए युद्ध होता था, क्योंकि नमक दोनों को ही चाहिए था। पर अहोम राजद्रोही नगा जातियों के सरदार के पास आश्रय पाये - असह्य है! असह्य!

हवा ने साँय-साँय करके दाद दी... असह्य। मानो चूलिक-फा के विवश क्रोध की लम्बी साँस सागर की देह को छू गयी - यहीं खड़े होकर उसने वह साँस खींची होगी - उसे मेहराब ही की र्ईंट-र्ईंट में तो उसके सुलगते वायु-कण बसे होंगे?

लेकिन जाएगा कहाँ! उसकी वधू तो? वह जानेगी उसका पति कहाँ है, उसे जानना होगा! जयमती अहोम राज्य की अद्वितीय सुन्दरी - जनता की लाड़ली - होने दो! चूलिक-फा राजा है, वह शत्रु-विहीन निष्कंटक राज्य करना चाहता है। जयमती को पति का पता देना होगा - उसे पकड़वाना होगा - चूलिक-फा उसका प्राण नहीं चाहता, केवल एक कान चाहता है, या एक छिगुनी - चाहें बाएँ हाथ की भी छिगुनी! क्यों नहीं बताएगी जयमती? वह प्रजा है; प्रजा की हड्डी-बोटी पर भी राजा का अधिकार है!

बहुत ही छोटे एक क्षण के लिए चाँद झलक गया। सागर ने देखा, सामने खुला आकारहीन, दिशाहीन, मानातीत निरा विस्तार; जिसमें नरसलों की साँय-साँय, हवा का असंख्य कराहटों के साथ रोना, उसे घेरे हुए मेहराबों की क्रुद्ध साँसों-की-सी फुँफकार... चाँद फिर छिप गया और पानी की नयी बौछार के साथ सागर ने आँखें बन्द कर लीं... असंख्य सहमी हुई कराहें; और पानी की मार ऐसे जैसे नंगे चूतड़ों पर से-दिया प्रान्त के लचीलें बेंतो की सड़ाक्-सड़ाक्। स-दिया अर्थात्! शव दिया; कब किसका शव वहाँ मिलता था याद नहीं आता, पर था शव ज़रूर - किसका शव...

नहीं, जयमती का नहीं। वह तो-वह तो उन पाँच लाख बेबस देखनेवालों के सामने एक लकड़ी के मंच पर खड़ी है, अपनी ही अस्पृश्य लज्जा में, अभेद्य मौन में, अटूट संकल्प और दुर्दमनीय स्पर्द्धा में लिपटी हुई; सात दिन की भूखी-प्यासी, घास और रक्त की कीच से लथपथ लेकिन शेषनाग के माथे में ठुकी हुई कीलों की भाँति अडिग, आकाश को छूनेवाली प्रतिःशिखा-सी निष्कम्प...

लेकिन यह क्या? सागर तिलमिलाकर उठ बैठा। मानो अँधेरे में भुतही-सी दीख पड़नेवाली वह लाखों की भीड़ भी काँपकर फिर जड़ हो गयी - जयमती के गले से एक बड़ी तीखी करुण चीख निकलकर भारी वायुमंडल को भेद गयी - जैसे किसी थुलथुल कछुए के पेट को मछेरे की बर्छी... सागर ने बड़े ज़ोर से मुट्ठियाँ भींच ली... क्या जयमती टूट गयी? नहीं, यह नहीं हो सकता; नरसलों की तरह बिना रीढ़ के गिरती-पड़ती इस लाख जनता के बीच वही तो देवदारु-सी तनी खड़ी है, मानवता की ज्योति-श्लाका...

सहसा उसके पीछे से एक दृप्त, रूखी, अवज्ञा-भरी हँसी से पीतल की तरह झनझनाते स्वर ने कहा, ‘‘मैं राजा हूँ!’’

सागर ने चौंककर मुड़कर देखा - सुनहला रेशमी वस्त्र, रेशमी उत्तरीय, सोने की कंठी और बड़े-बड़े अनगढ़ पन्नों की माला पहने अधनंगा एक व्यक्ति उसकी ओर ऐसी दया-भरी अवज्ञा से देख रहा था, जैसे कोई राह-किनारे के कृमि-कीट को देखे। उसका सुगठित शरीर, छेनी से तराशी हुई चिकनी मांसपेशियाँ, दर्पस्फीत नासाएँ तेल सी चमक रही थी; आँखों की कोर में लाली थी जो अपनी अलग बात कहती थी - मैं मद भी हो सकती हूँ, गर्व भी, विलास-लोलुपता भी, और निरी नृशंस नर-रक्त-पिपासा भी...

सागर टुकुर-टुकुर देखता रह गया। न उठ सका, न हिल सका। वह व्यक्ति फिर बोला, ‘‘जयमती? हूँ; जयमती!’’ अँगूठे और तर्जनी की चुटकी बनाकर उसने झटक दी, मानो हाथ का मैल कोई मसलकर फेंक दे। बिना क्रिया के भी वाक्य सार्थक होता है, कम से कम राजा का वाक्य...

सागर ने कहना चाहा, ‘‘नृशंस! राक्षस!’’ लेकिन उसकी आँखों की लाली में एक बाध्य करनेवाली प्रेरणा थी, सागर ने उसकी दृष्टि का अनुसारण करते हुए देखा, जयमती सचमुच लड़खड़ा गयी थी। चीखने के बाद उसका शरीर ढीला होकर लटक गया था, कोड़ों की मार रुक गयी थी, जनता साँस रोके सुन रही थी...

सागर ने भी साँस रोक ली। तब मानो स्तब्धता में उसे अधिक स्पष्ट दीखने लगा, जयमती के सामने एक नया बांका खड़ा था, सिर पर कलगी, गले में लकड़ी के मुंडों की माला, मुँह पर रंग की व्याघ्रोपम रेखाएँ कमर में घास की चटाई की कौपीन, हाथ में बर्छी। और वह जयमती से कुछ कह रहा था।

सागर के पीछे एक दर्प-स्फीत स्वर फिर बोला, ‘‘चुलिक-फा के विधान में हस्तक्षेप करनेवाला वह ढीठ नगा कौन है? पर सहना उस नगे व्यक्ति का स्वर सुनाई पड़ने लगा और सब चुप हो गये...

‘‘जयमती, तुम्हारा साहस धन्य है। जनता तुम्हें देवी मानती है। पर और अपमान क्यों सहो? राजा का बल अपार है - कुमार का पता बता दो और मुक्ति पाओ!’’

अब की बार रानी चीखी नहीं। शिथिल-शरीर, फिर एक बार कराह कर रह गयी।

नगा वीर फिर बोला, ‘‘चूलिक-फा केवल अपनी रक्षा चाहते हैं, कुमार के प्राण नहीं। एक कान दे देने में क्या है? या छिगुनी? उतना तो कभी खेल में या मल्ल-युद्ध में भी जा सकता है।’’

रानी ने कोई उत्तर नहीं दिया।

‘‘चूलिक-फा डरपोक है, डर नृशंस होता है। पर तुम कुमार का पता बताकर अपनी मान-रक्षा और पति की प्राण-रक्षा कर सकती हो।’’

सागर ने पीछे सुना है, ‘‘हूँ’’, और मुड़कर देखा, उस व्यक्ति के चेहरे पर एक क्रूर-कुटिल मुस्कान खेल रही है।

सागर ने उद्धत होकर कहा, ‘‘हूँ! क्या?’’

वह व्यक्ति तनकर खड़ा हो गया, थोड़ी देर सागर की ओर देखता रहा, मानो सोच रहा हो, इसे क्या उत्तर दे? फिर और भी कुटिल ओंठों के बीच से बोला, ‘‘मैं चूलिक-फा, डरपोक! अभी जानेगा। पर अभी तो मेरे काम की कह रहा है-’’

नगा वीर जयमती के और निकट जाकर धीरे-धीरे कुछ कहने लगा। चूलिक-फा ने भौं सिकोड़कर कहा, ‘‘क्या फुसफुसा रहा है?’’

सागर ने आगे झुककर सुन लिया।

‘‘जयमती, कुमार तो अपने मित्र नगा सरदार के पास सुरक्षित है। चूलिक-फा तो उसे पकड़ ही नहीं सकता, तुम पता बताकर अपनी रक्षा क्यों न करो? देखो, तुम्हारी कोमल देह-’’

आवेश में सागर खड़ा हो गया, क्योंकि उसके कोमल देह में एक बिजली-सी दौड़ गयी और उसने तनकर, सहसा नगा वीर की ओर उन्मुख होकर कहा, ‘‘कायर नपुंसक! - तुम नगा कैसे हुए? कुमार तो अमर है, कीड़ा चूलिक-फा उन्हें कैसे छुएगा? मगर लोग क्या कहेंगे, कुमार की रानी जयमती ने देह की यन्त्रणा से घबड़ाकर उनका पता बता दिया? हट जाओ, अपना कलंकी मुँह मेरे सामने से दूर करो!’’

जनता में तीव्र सिहरन दौड़ गयी। नरसल बड़ी ज़ोर से काँप गये, गंदले पानी में एक हलचल उठी, जिससे लहराते गोल वृत्त फैले कि फैलते ही गये, हवा फुंफकार उठी, बड़े जोर की गड़गड़ाहट हुई। मेघ और काले हो गये-यह निरी रात है कि महानिशा, कि यन्त्रणा की रात-सातवीं रात, कि नवीं रात? और जयमती क्या अब बोल भी सकती है, क्या यह उसके दृढ़ संकल्प का मौन है, कि अशक्तता का? और यह वही भीड़ है, नयी भीड़ वही नगा वीर, कि दूसरा कोई भीड़ में कई नगे बिखरे हैं...

चूलिक-फा ने कटु स्वर में कहा, ‘‘फिर आया वह नगा?’’

नगा वीर ने पुकारकर कहा, ‘‘जयमती! रानी जयमती!’’

रानी हिली-डुली नहीं।

वीर फिर बोला, ‘‘रानी! मैं उसी नगा सरदार का दूत हूँ, जिसके यहाँ कुमार ने शरण ली है। मेरी बात सुनो!’’

रानी का शरीर काँप गया। वह एकटक आँखों से उसे देखने लगी, कुछ बोली नहीं। बोल सकी नहीं।

चूलिक-फा ने वहीं से आदेश दिया, ‘‘पानी दो इसे - बोलने दो!’’

किसी ने रानी के ओठों की ओर पानी बढ़ाया। वह थोड़ी देर मिट्टी के कसोरे की ओर वितृष्ण दृष्टि से देखती रही, फिर उसने आँख भरकर नगा युवक की ओर देखा, फिर एक घूँट पी लिया। तभी चूलिका-फा ने कहा, ‘‘बस, एक-एक घूँट, अधिक नहीं!’’

रानी ने एक बार दृष्टि चारों ओर लाख-लाख जनता की ओर दौड़ायी।

फिर आँखें नगा युवक पर गड़कार बोली, ‘‘कुमार सुरक्षित हैं। और कुमार की यह लाख-लाख प्रजा - जो उनके लिए आँखें बिछाएँ - एक नेता के लिए, जिसके पीछे चलकर आततायी का राज्य उलट दे - जो एक आदर्श माँगती है - मैं उसकी आशा तोड़ दूँ - उसे हरा दूँ - कुमार को हरा दूँ?’’

वह क्षण-भर चुप हुई। चूलिक-फा ने एक बार आँख दौड़ाकर सारी भीड़ को देख लिया। उसकी आँख कहीं टिकी नहीं... मानो उस भीड़ में उसे टिकने लायक कुछ नहीं मिला, जैसे रेंगते कीड़ों पर दीठ नहीं जमती...

नगा से कहा, ‘‘प्रजा तो राज़ा चूलिक-फा की है न?’’

रानी ने फिर उसे स्थिर दृष्टि से देखा। फिर धीरे-धीरे कहा, ‘‘चूलिक-’’ और फिर कुछ ऐसे भाव से अधूरा छोड़ दिया कि उसके उच्चारण में मुँह दूषित हो जाएगा। फिर कहा, ‘‘यह प्रजा कुमार की है’’ - ‘‘पर तू-तू तो नगा नहीं, तू तो उस गिद्ध की प्रजा है - जा, उसेक गन्दे पंजे को चाट!’’

रानी की आँखें चूलिक-फा की ओर मुड़ीं, पर उसकी दीठ ने उसे छुआ नहीं, जैसे किसी गिलगिली चीज़ की ओर आँखें चढ़ाने में भी घिन आती है...

नगा ने मुस्कराकर कहा, ‘‘कहाँ है मेरा राजा!’’

चूलिक-फा ने वहीं से पुकारकर कहा, ‘‘मैं, यह हूँ - अहोम राज्य का एकछत्र शासक!’’

नगा युवक सहसा उसके पास चला आया।

सागर ने देखा, भीड़ का रंग बदल गया है। वैसा ही अन्धकार, वैसा ही अथाह प्रसार, पर उसमें जैसे कहीं व्यवस्था, भीड़ में जगह-जगह नया दर्शक बिखरे, पर बिखरेपन में भी एक माप...

नगा ने पास से कहा, ‘‘मेरे राजा!’’

एकाएक बड़े ज़ोर की गड़गड़ाहट हुई। सागर खड़ा हो गया उसने आँखें फाड़कर देखा नगा युवक सहसा बर्छी के सहारे कई-एक सीढ़ियाँ फाँदकर चूलिक-फा के पास पहुँच गया है, बर्छी सीढ़ी की र्ईंटों की दरार में फँसी रह गयी है, पर नगा चूलिक-फा को धक्के से गिराकर उसकी छाती पर चढ़ गया है; उधर जनता में एक बिजली कड़क गयी है, ‘‘कुमार की जय!’’ किसी ने फाँदकर मंच पर चढ़कर कोड़ा लिये जल्लादों को गिरा दिया है, किसी ने अपन अंग-वस्त्र जयमती पर डाला है और कोई उसके बन्धन की रस्सी टटोल रहा है...

पर चूलिक-फा और नगा... सागर मन्त्र-मुग्ध खड़ा था, उसकी दीठ चूलिक-फा पर जमी थी... सहसा उसने देखा, नगा तो निहत्था है, पर नीचे पड़े चूलिक-फा के हाथ में एक चन्द्राकार डाओ है जो वह नगा के कान के पीछे साध रहा है - नगा को ध्यान नहीं है, मगर चूलिक-फा की आँखों में पहचान है कि नगा और कोई नहीं, स्वयं कुमार है; और वह डाओ साध रहा है...

कुमार छाती पर है, पर मर जाएगा... या क्षत भी हो गया तो... चूलिक-फा ही मर गया तो भी, अगर कुमार क्षत हो गया तो - सागर उछला। वह चूलिक-फा का हाथ पकड़ लेगा - डाओ छीन लेगा।

पर वह असावधानी से उछला था, उसका कीचड़-सना बूट सीढ़ी पर फिसल गया और वह लुढ़कता-पुढ़कता नीचे जा गिरा।

अब? चूलिक-फा का हाथ सध गया है, डाओ पर उसकी पकड़ कड़ी हो गयी है, अब-

लेफ्टिनेंट सागर ने वहीं पड़े-पड़े कमर से रिवाल्वर खींचा और शिस्त लेकर दाग दिया... धाँय!

धुआँ हो गया। हटेगा तो दीखेगा - पर धुआँ हटता क्यों नहीं? आग लग गयी-रंग-महल जल रहा है, लपटें इधर-उधर दौड़ रही हैं। क्या चूलिक-फा जल गया? - और कुमार - क्या यह कुमार की जयध्वनि है? कि जयमती की-यह अद्भुत, रोमांचकारी गूँज, जिसमें मानो वह डूबा जा रहा है, डूबा जा रहा है - नहीं, उसे सँभलना होगा।

लेफ्टिनेंट सागर सहसा जागकर उठ बैठा। एक बार हक्क-बक्का होकर चारों ओर देखा, फिर उसकी बिखरी चेतना केन्द्रित हो गयीं। दूर से दो ट्रकों की दो जोड़ी बत्तियाँ पूरे प्रकाश से जगमगा रही थीं और एक से सर्च-लाइट इधर-उधर भटकती हुई रंग-महल की सीढ़ियों को क्षण-क्षण ऐसे चमका देती थी मानो बादलों से पृथ्वी तक किसी वज्र-देवता के उतरने का मार्ग खुल जाता है। दोनों ट्रकों के हॉर्न पर पूरे ज़ोर से बजाए जा रहे थे।

बौछार से भीगा हुआ बदन झाड़कर लेफ्टिनेंट सागर उठ खड़ा हुआ। क्या वह रंगमहल की सीढ़ियों पर सो गया था? एक बार आँखें दौड़ाकर उसने मेहराब को देखा, चाँद निकल आया था, मेहराब की र्ईंटें दीख रही थीं। फिर धीरे-धीरे उतरने लगा।

नीचे से आवाज़ आयी, ‘‘सा’ब, दूसरा गाड़ी आ गया, टो करके ले जाएगा!’’

सागर ने मुँह उठाकर सामने देखा, और देखता रह गया। दूर चौरस ताल चमक रहा था, जिसके किनारे पर मन्दिर भागते बादलों के बीच में काँपता हुआ, मानो शुभ्र चाँदनी से ढका हुआ हिंडोला-क्या एक रानी के अभिमान का प्रतीक, जिसने राजा को बचाया, या एक नारी के साहस का, जिसने पुरुष का पथ-प्रदर्शन किया; या कि मानव-मात्र को अदम्य स्वातन्त्र्य-प्रेरणा का अभीत, अजय-जय-दोल?

(दिल्ली, सितम्बर 1950)


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