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रचनावली

अज्ञेय रचनावली
खंड : 3
संपूर्ण कहानियाँ

अज्ञेय
संपादन - कृष्णदत्त पालीवाल

अनुक्रम नारंगियाँ पीछे     आगे

उस दिन जब मोहल्लेवालों ने देखा कि हरसू ने मोहल्ले के बाहर की नाम को पक्की, पर वास्तव में धूल-भरी सड़क पर पुआल और बोरिये का टुकड़ा बिछाकर उस पर नारंगियाँ सजाकर दुकान कर ली है, तो सब-के-सब विस्मय के ताकते रह गये। हरसू, और दुकान!

जब से हरसू और परसू दोनों भाई अचानक आकर मुहल्ले के सिरे की पुरानी दीवार की एक मेहराब के नीचे घर बनाकर जम गये थे, तब से किसी ने उनको काम करते हुए या काम की तलाश भी करते हुए कभी नहीं देखा था। रिफ़्यूजी दूसरे मोहल्लों की तरह इस मोहल्ले में भी अनेकों आये थे, लेकिन सभी बहुत जल्द इस कोशिश में जुट गये थे कि वे ‘शरणार्थी’ न रहकर ‘पुरुषार्थी’ कहलाने के अधिकारी हो जाएँ। सभी ने कुछ-न-कुछ जुगत कर ली थी या गुज़र-बसर का कोई वसीला निकाल लिया था। लेकिन हरसू और परसू ज्यों-के-त्यों बने हुए थे। किसी ने उन्हें कभी भीख माँगते नहीं देखा, चोरी करते भी कभी नहीं यद्यपि यह सब समझते थे कि दोनों भाई अगर कुछ लेकर नहीं आये हैं और कुछ कमाते भी नहीं हैं तो चोरी के बिना कैसे काम चलता होगा! हाँ, चोर-जैसे वे दीखते भी नहीं थे, किसी के सामने उनकी आँखें नीची नहीं होती थीं और दोनों का बर्ताव कुछ ऐसा शालीनता-भरा होता था कि किसी को कुछ पूछने का साहस भी नहीं होता था।

शालीनता के स्तर में कुछ गिराव कभी दीखता था तो दोनों भाइयों के आपस के व्यवहार में। यही नहीं कि वे आपस में लड़ते-झगड़ते थे - इतना ही कि परसू हमेशा हरसू को ताने देता रहता था या जैसे सम्भव हो कोंचता रहता था। हरसू प्रायः दीन-भाव से सब-कुछ सह लेता था, लेकिन कभी-कभी वह भी बिना अपना स्वर ऊँचा उठाये जला-भुना उत्तर दे देता था। पछांही लोगों में ऐसी बातों पर फ़ौरन तू-तड़ाक और मार-पीट की नौबत आ जाती है, और रिफ़्यूजी तो और भी आसानी से जिस-तिस पर हाथ छोड़ बैठते हैं; इसलिए मोहल्लेवाले इन दोनों भाइयों के इस तनाव-भरे सहअस्तित्व पर और भी अचम्भा किया करते थे।

खैर, अब हरसू ने नारंगियों की दुकान लगायी है, और परसू दुकान से कुछ दूर पर एक पुलिया पर बैठा हुआ बड़ी अवज्ञा से दुकान की और हरसू की ओर देख रहा है।

एक-एक करके मोहल्ले के दो-चार बच्चे नारंगियों की दुकान के आस-पास इकट्टे हो गये हैं। नारंगियों का आकर्षण तो है ही, लेकिन उससे अधिक इस बात का कौतूहल कि दुकान हरसू की है।

एक छोटी लड़की दूसरों से कुछ आगे बढ़कर, एक हाथ से अपने झबले का छोर उठकर मुँह में खोंसती हुई दूसरे हाथ से मानो अतर्कित भाव से नारंगियों की ओर इशारा करती है, और फिर हाथ समेटकर टुकुर-टुकुर हरसू की ओर देखने लगती है।

‘‘लेगी?’’ हरसू पूछता है।

लड़की कुछ उत्तर दे, इससे पहले परसू बड़बड़ाता है, ‘‘हाँ, दे दे, दुकान उठाकर दे दे इसको! क्या ऐसे ही दुकान चलाएगा?’’

हरसू भाई की बात को अनसुनी-सी करता हुआ लड़की से कहता है, ‘‘लेगी, तो जा घर से पैसे ले आ। चार-चार पैसे की एक है।’’

‘‘तो ऐसे दुकान चलाएगा। तू! छोटे बच्चों को फुसलाकर घर से पैसे मँगाकर मुनाफ़ा करेगा! बच्चों को बिगाड़ते शर्म नहीं आती?’’ भाइयों में झगड़ा हो रहा है या नहीं, बच्चों की समझ में नहीं आता। क्योंकि ऐसे सम-स्वर से और तटस्थ भाव से झगड़ा होते उन्होंने कभी देखा नहीं है। लेकिन वातावरण में कहीं पर तनाव है, यह वे समझते हैं। लड़की एक बार हरसू और एक बार परसू की ओर देखती है और रुआँसी-सी हो जाती है।

हरसू एक क्षण के लिए उसकी ओर देखता है और फिर दो नारंगियाँ उठाकर लड़की को दे देता है।

‘‘ले, रो मत, ले जा। पैसे जब होंगे तब देना-नहीं तो न सही।’’

परसू असम्पृक्त भाव से आकाश की ओर देख रहा है, मानो उसने यह देखा न हो, न उसे इस सबसे कोई मतलब हो। लेकिन यही सम-स्वर कहता है, ‘‘हाँ-हाँ, बाप का माल है, दे दे। कल देखूँगा, कहाँ से और माल लाएगा और दुकान चलाएगा। बड़ी फैयाज़ी दिखाने चला है। सब साले रिफ्यूजी जैसे घर के नवाब होते हैं।’’

हरसू एक बार भाई की ओर देखता है और फिर चुप बना रहता है। लड़की चली जाती है।

बोरिया झाड़कर फिर बिछा दिया गया है। नारंगियाँ कपड़े से रगड़कर चमका दी गयी हैं। ऊपर नीम की पत्तियों की हल्की सरसराहट सुनते हुए हरसू सोचता है, उसका दिन इसी के सहारे जैसे-तैसे कट जाएगा।

नारंगियों के आस-पास दो-चार बच्चे फिर इकट्ठे हो गये हैं। नारंगियों का चाव तो निरन्तर है, दुकान के नयेपन का कौतूहल भी अभी मिटा नहीं है।

‘‘भीड़ क्यों करते हो बच्चो, नारंगियाँ लेनी हों तो घर जाकर पैसे ले आओ।’’

परसू अपनी पुलिया पर से सुन रहा है। देखने की ज़रूरत उसे नहीं है। वह मानो अतीन्द्रिय चक्षुओं से सब-कुछ देख लेता है। बल्कि सब-कुछ पहले से ही उस का - देखा-दिखाया है। व्यंग्य की एक रेखा उसक ओंठों को तिरछा कर जाती है, बस, इतना हरसू देख लेता है। परसू जानता है कि वह देख लेगा-उसके द्वारा देखी जाने के लिए ही वे वहाँ तक लायी गयी हैं।

बच्चों की टोली में से दो-एक अलग होकर चले जाते हैं। थोड़ी देर बाद एक लौटकर आता है। उसकी चाल ही बता रही है कि उसकी मुट्ठी में इकन्नी है। उसके पीछे-पीछे छह और अधनंगे बच्चे चले आते हैं, और वे भी जानते हैं कि उनके अगुआ की मुट्ठी में पैसे हैं। पैसों से उन्हें कोई सरोकार नहीं है, लेकिन अगुआ की मुट्ठी का पैसा आगे जो काम कर सकता है, उसमें उनकी दिलचस्पी ज़रूर है।

इकन्नी और नारंगी का विनिमय हो जाता है। बच्चा विजय से भरा हृदय और नारंगी से भरी मुट्ठी लिए हुए एक ओर को हटकर नारंगी छीलकर खाने लगता है।

दुकान पर जो करिश्मा होनेवाला था वह हो चुका, और वहाँ अब देखने को कुछ नहीं है। दूसरे बच्चों की आँखें हरसू की साबुत नारंगियों से हटकर अगुओं के हाथ की छिलती हुई नारंगी पर अटक जाती हैं। कैसे उस नारंगी से फाँकें अलग होती हैं और धीरे-धीरे उठाकर अगुआ के मुँह में चली जाती हैं, कभी उधर-इधर नहीं जाती है, यह कितना बड़ा अचरज है!

परसू गरदन ज़रा एक ओर को मोड़कर कहता है, ‘‘अबे, इन सबको भी कह दे, घर जाकर पैसे ले आएँ। गाड़कर रखे होंगे पैसे इन्होंने, सब लाकर तुझे दे देंगें।’’

हरसू तिलमिलाकर बच्चों से कुछ कहने को होता है, लेकिन फिर रुक जाता है। एक बार बच्चों को सिर से पैर तक देखता है और आँखें झुका लेता है। बच्चे अधनंगे हैं, इसका ठीक अर्थ अब उसके मन में बैठता है-इस मोहल्ले में बच्चों को निचले आधे शरीर में तों यों भी कुछ पहनाने का रिवाज नहीं है, इसलिए अधनंगे का मतलब यही हो सकता है कि ऊपर का आधा शरीर भी ढका नहीं है। हरसू आँखें झुकाये गट् से थूक का एक घूँट निगलता है। थूक का स्वाद कुछ नहीं होना चाहिए, पर हरसू के लिए वह घूँट कितना कड़वा है यह उसके दबे ओंठों से दीख जाता है।

हरसू ओर परसू की खींचातानी की ओर बच्चों का ध्यान नहीं है। वे एकटक फाँक-फाँक गायब होनेवाली नारंगी के अचरज को देख रहे हैं।

परसू कानी आँख से हरसू को देखता है, मानो उसे तौल रहा हो। फिर मुँह बच्चों की ओर फेर लेता है।

‘‘लड़के, अपने साथियों को भी एक-एक फाँक दे दे।’’ अगुआ की ओर उन्मुख होकर परसू का स्वर कुछ कम रूखा हो गया है, ‘‘साथियों के साथ बाँटकर खाना चाहिए।’’

अगुआ अगुआ है, ओर इस वक्त नारंगी का मालिक भी है। परसू की ओर देखकर उद्धत स्वर से कहता है, ‘‘क्यों दे दूँ? मैंने पैसे देकर नहीं खरीदी?’’

परसू वहीं पुलिया पर लेटे-लेटे मुँह दूसरी ओर करके थूकता है। ‘‘अबे हरसू, सुनीं नवाबज़ादे की बातें! पैसे देकर खरीदी है! पैसा तेरे बाप ने कहाँ से कमाया है भला?’’ लेकिन फिर परसू का स्वर कुछ धीमा होकर मानो भीतर को मुड़ जाता है। ‘‘लेकिन बच्चे का क्या डाँटना! बाप मिलता तो पूछता, कहाँ से ब्लैक करके कमाया है पैसा, और क्यों लड़के को अभी से ऐसा कमीनापन सिखाया है।’’ फिर कुछ रुककर, बदले हुए स्वर में, ‘‘अबे हरसू, तू ही दे दे न सबको एक-एक नारंगी-देख, बेचारे कैसे मुँह ताक रहे हैं! बच्चों को बेबसी सिखाना अच्छा नहीं होता।’’

हरसू अचकचाकर भाई की ओर देखता है। बात निस्सन्देह उसी से कही गयी है, लेकिन उसमें एक ऐसा अलगाव है कि उसका जवाब कोई भी दे दे - या न भी दे - परसू को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। हरसू ज़रा साहस बटोरकर कहता है, ‘‘कहाँ से दे दूँ सबको? फिर तू ही कहता है कि दुकान कैसे चलेगी और कल को माल कहाँ से खरीदकर लाऊँगा।’’

‘‘अबे, बस, यही है तेरी रिफ्यूजी का जिगरा? अबे, जानता नहीं, हम सब लोग पीछे बड़ी-बड़ी जायदादें छोड़कर आये हैं। और देखता नहीं, यहाँ भी कितनों ने फिर जायदादें खड़ी कर ली हैं? तू ही बता, पहली बार नारंगी खरीदने को पैसा कहाँ से आया था - या कि नारंगियाँ तेरे साथ माँ की कोख से जनमी थीं?’’

हरसू चुप है। चुप में सौ विरोध समा जाते हैं। बोलते हुए कुछ बनता नहीं है।

‘‘अबे, दे दे न नारंगी - उन्हें ऐसे देखते देख तुझे तरस नहीं आता - शर्म नहीं आती? तू इनसान का बेटा है...’’

‘‘तरस तो आता है, परसू... पर पैसा कहाँ से आएगा?’’

‘‘चल, पैसा मैं देता हूँ - खिला सबको नारंगियाँ।’’ परसू लेटे से आधा-बैठा होकर अपनी फटी जेब टटोलता है और एक अठन्नी निकालकर हरसू की ओर फेंकता है।

हरसू चुपचाप छह नारंगियाँ उठाकर एक-एक बच्चों को बाँट देता है। बच्चे झिझकते हुए हाथ बढ़ाकर ले लेते हैं। क्षण-भर अँजुली भरे-भरे अचकचाये-से कभी हरसू की ओर और कभी नारंगी की ओर देखते हैं, और फिर धीरे-धीरे खाने लगते हैं। हरसू टाट के नीचे से टटोलकर एक दुअन्नी निकालता है और परसू की ओर बढ़ाता है, ‘‘यह ले अपनी बाक़ी।’’

‘‘क्या?’’ परसू अजनबी-सा कहता है! ‘‘मेरी बाक़ी? बाकी कैसी?’’

‘‘तूने अठन्नी दी थी, दो आने तेरे बाक़ी बचे कि नहीं?’’

‘‘मेरे दो आने! हुँह! मेरे दो आने! मेरे बाप के हैं! जा, ये भी उस छोकरे को दे दे जो अपने पैसे से नारंगी खरीदता है; कह दे उसे, जाकर यह भी अपने बाप को दे दे!’’

हरसू दबे स्वर से कहता है, ‘‘उसने क्या बिगाड़ा है, वह तो बच्चा है; बाप जैसा हो...’’

‘‘हाँ, बे, ठीक कहता है तू। अच्छा तो रख सिगरेट-पानी कर लेना। या नहीं, आगे भी तो ऐसे बच्चे आएँगे-उन्हें दे देना। नहीं तो दुकान तेरी कैसे चलेगी? लोग भी क्या कहेंगे कि रिफ़्यूजी बच्चा दुकान करने लगा तो दिल-आत्मा भी बेचकर खा गया।’’

हरसू बोला, ‘तो तेरे दो आनों से सदावर्त चल जाएगा? और दो नारंगियाँ खिला दूँगा, फिर...’’

‘‘अरे, तो हम मर तो नहीं गये हैं। साले, रिफ्यूजी बनकर आया है तो हौसला रखना सीख। दिल बढ़ने से कोई नहीं मरता, उसके सिकुड़ने से ही मरते हैं सब - डॉक्टर साले चाहे जो बकवास करते रहें।’’

हरसू दुकान करता है, आज उसने सात नारंगियाँ बेची हैं और माल के सात आने के अलावा दो आने घेलुए में पाये हैं। उसकी आँखें नारंगियों की तरह गूँगी और घुटी हुई हो गयी हैं और उसके कान नीम की सरसराहट पर अनसुनते टिक गये हैं।

और परसू के पहले कई बार ऐसे भी दिन आये हैं, जब उसकी दोनों जेबों में दो-दो अठन्नियाँ हुई हैं और उसने नहीं जाना कि क्यों, और ऐसे भी, जब किसी जेब में कुछ नहीं है और वह नहीं सोचता कि तो फिर क्या! वह वहीं पुलिया पर फिर लेटकर नीम के ऊपर आसमान की ओर देखने लगता है। आसमान-जैसी ही खाली, गहरी और अन्तहीन हैं उसकी आँखें।

(दिल्ली, जनवरी 1957)


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